बंगाल, केरल, तमिलनाड़ु और असम समेत पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आज आने वाले हैं. इसके लिए मतगणना शुरू हो गई है. बंगाल के रुझानों में जहां बीजेपी ने जीत का आंकड़ा पार कर लिया है, टीएमसी पर बढ़त बना ली है तो वहीं असम में बीजेपी ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है. लेकिन चुनावों में हार हो या जीत लेकिन हर साल एक हॉट टॉपिक जिसपर हर राजनितिक पार्टी सवाल उठाती है वह EVM है.
कैसे हुई शुरुआत?
बात है 80 के दशक की, जब हम कागज के मतपत्रों पर ठप्पा लगाते थे, तब IIT बॉम्बे के इंडस्ट्रियल डिजाइन सेंटर (IDC) में प्रोफेसर ए.जी. राव और प्रोफेसर रवि पूवैया की अगुवाई में एक छोटी सी टीम को एक बड़ा काम सौंपा गया. उन्हें एक ऐसी मशीन बनाने के लिए कहा गया कि जिसे कोई भी आम आदमी (चाहे वो पढ़ा-लिखा हो या नहीं) आसानी से चला सके.
डिजाइन टीम ने कई रातें जागकर बिताईं. उन्होंने इस मशीन को इतना देसी और सरल बनाने की कोशिश की कि वोट डालने वाला बटन अंगूठे के निशान जैसा अंडाकार बनाया गया. मशीन का रंग ऐसा रखा गया जिस पर किसी पार्टी का रंग हावी न हो. इस प्रोजेक्ट के पीछे दो सरकारी कंपनियां थीं जिसका नाम है भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL). जहां, BEL ने इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन संभाला वहीं, IDC की टीम को इसकी रूपरेखा और प्रोटोटाइप तैयार करना था. प्रोफेसर एजी राव के नेतृत्व में टीम ने डेढ़ साल तक दिन-रात एक कर दिए. उन्होंने डिजाइन के लिए कुछ बहुत ही सरल और मानवीय पहलुओं को चुना.
अंगूठे का निशान: ईवीएम पर जो नीला बटन आप दबाते हैं, उसका शेप अंडाकार आकार जानबूझकर मतदाता के अंगूठे के निशान जैसा बनाया गया ताकि लोग सहज महसूस करें.
मजबूती: इस दौरान उन्होंने इंजीनियरिंग प्लास्टिक का इस्तेमाल किया ताकि मशीन को आसानी से कही भी हैंडल किया जा सके. इसे चलाने वाले ज्यादातर शिक्षक और सरकारी अधिकारी होते हैं, जो तकनीकी एक्सपर्ट नहीं होते इसलिए मशीन को सिंपल, ज्यादा टेक्निकल और रफ-एंड-टफ बनाया गया.
दूसरी मंजिल से फेंकने की चुनौती
EVM बनाने के इस सफर में सबसे बड़ी समस्या टेक्नोलॉजी की नहीं बल्कि सरकारी अधिकारी की थी. इसका काम पूरा होने के बाद जब चुनाव आयोग के सामने इसे पेश किया गया तो, वित्त विभाग के एक अधिकारी ने इसकी मजबूती और कीमत पर सवाल उठाए. इसका जवाब देने के लिए प्रोफेसर राव ने मशीन को आठ फीट की ऊंचाई से नीचे फेंक दिया. लेकिन इसके बाद भी उनके प्रोडक्ट पर सवाल उठे. जब अधिकारी ने कहा कि आपने इसे कालीन पर गिराया है, तो राव ने कहा कि इसे दूसरी मंजिल से कंक्रीट पर फेंकने को तैयार हूं, आप नीचे जाकर देख लीजिए यह सही सलामत मिलेगी. इस आत्मविश्वास ने सबको खामोश कर दिया. अधिकारियों को समझाना पड़ा कि यह कोई साधारण सूटकेस नहीं बल्कि एक चलता-फिरता कंप्यूटर है.
हैकिंग से कैसे बची मशीन?
डिजाइनर रवि पूवैया और एजी राव ने सुरक्षा के लिए कुछ कड़े नियम भी बनाए. मशीन का किसी केंद्रीय कंप्यूटर, वाई-फाई या नेटवर्क से कोई रिलेशन नहीं है. यह पूरी तरह से एक स्वतंत्र इकाई है. इसके ऊपर उन्होंने पुरानी लाख की सीलिंग वैक्स का प्रावधान रखा ताकि जनता और पार्टियों को आंखों के सामने सुरक्षा दिखाई दे. इस मशीन में हेरफेर संभव नहीं है क्योंकि हर क्षेत्र में उम्मीदवारों के नाम अल्फाबेटिकल के हिसाब से होते हैं, न कि पार्टी के हिसाब से.
10 साल का लंबा इंतजार
मार्च 1989: डिजाइन को मंजूरी मिली.
जुलाई 1989: जापानी सहयोग से 10 करोड़ की लागत वाला रोबोटिक प्लांट लगा.
कीमत: उस समय एक ईवीएम की कीमत करीब 5,000 रुपये थी.
नहीं बन पा रहा था भरोसा
राजीव गांधी सरकार ने मार्च 1989 में इसके लिए कानून बदल दिया था. हालांकि, 1982 में केरल के कुछ बूथों पर इसका छोटा ट्रायल हुआ था, लेकिन राजनीतिक सहमति न होने के कारण 1989 के लोकसभा चुनाव में इसे इस्तेमाल नहीं किया जा सका.
ईवीएम को सालों तक ठंडे बस्ते में रहना पड़ा. आखिरकार 1998 में कुछ विधानसभा चुनावों से इसकी वापसी हुई और फिर यह कभी नहीं रुकी. आज प्रोफेसर पूवैया गर्व से कहते हैं कि जिसे हम असफल मान रहे थे, वह देश की सबसे कामयाब मशीन बन गई.