दुनियाभर में इन दिनों 'गिग इकोनॉमी' यानी फिक्स सैलरी के बजाय स्वतंत्र या ऐप आधारित काम करने वाले 'गिग वर्कर्स' को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है. कॉर्पोरेट की बंदिशों और बंधे-बंधाए वर्किंग ऑवर्स के बीच क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स वाकई किसी की जिंदगी बदल सकते हैं? इसका सबसे सटीक और जीता-जागता उदाहरण हैं नोएडा की किरन.
विज्ञान और मैथ्स जैसे कठिन विषयों से 12वीं तक पढ़ीं किरन ने अपने जीवन में ट्यूशन पढ़ाने से लेकर स्कूल की लाइब्रेरी और कंपनियों में 12-12 घंटे की नौकरियां कीं. लेकिन आज वह किसी दफ्तर में नहीं, बल्कि ऑनलाइन डिजिटल ऐप्स के जरिए घरों में झाड़ू-पोछा, डस्टिंग और कुकिंग जैसे 'गिग वर्क' करके अपनी पुरानी सैलरी से दोगुना से भी ज्यादा कमा रही हैं. समय के साथ आए इस डिजिटल बदलाव ने कैसे एक महिला के बड़े संघर्ष को सफलता में बदला, आइए जानते हैं उनकी सक्सेस स्टाेरी.
जब पिता की मौत से टूटा 'टीचर' बनने का सपना
किरन अपने छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं. साल 2006 में जब वह 12वीं के फाइनल एग्जाम दे रही थीं, तभी अचानक उनके पिता का निधन हो गया. पूरे परिवार की जिम्मेदारी किरन पर आ गई और उनका बस एक और लास्ट पेपर छूट गया. वह बताती हैं, 'मैं पढ़ने में ठीक थी, इंग्लिश-हिंदी अच्छे थे, स्पोर्ट्स पसंद था और सपना टीचर बनने का था.'
घर के बदतर हालात के कारण साल 2008 में महज 14 साल की उम्र में वो एक एजेंट के भरोसे अनजान शहर दिल्ली आ गईं. दुनियादारी से अनजान किरन को जब एजेंट का व्यवहार ठीक नहीं लगा, तो वह वहां से भी भाग निकलीं और गाजियाबाद-फरीदाबाद के चक्कर काटते हुए जैसे-तैसे जिंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाया.
ट्यूशन, पैकिंग और ₹15,000 की 'लाइब्रेरी जॉब' का लंबा संघर्ष
किरन ने हार नहीं मानी. अपनी मैथ्स और साइंस की समझ के दम पर उन्होंने नोएडा में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. इसके बाद नोएडा सेक्टर-63 की एक कंपनी में 8 से 12 घंटे तक चार्जर पैकिंग का कठिन काम किया, जहां उन्हें सिर्फ 12 से 13 हजार रुपये मिलते थे.
साल 2017 में उन्हें नोएडा के एक स्कूल की लाइब्रेरी में नौकरी मिली. सुबह 7:00 बजे से शाम के 4:30 बजे तक, यानी करीब साढ़े नौ घंटे की इस फिक्स नौकरी में उन्हें ₹15,000 महीना मिलता था. किरन को लगा कि जिंदगी अब पटरी पर है, लेकिन साल 2019 के अंत में आए कोरोना लॉकडाउन ने स्कूल बंद कर दिए और उनकी यह बंधी-बंधाई नौकरी भी छिन गई.
कैसे 'गिग वर्कर' बनकर बदली किस्मत?
लॉकडाउन के बाद किरन ने सोसायटियों में पारंपरिक (ऑफलाइन) तरीके से झाड़ू-पोछा और कुकिंग का काम शुरू किया. 4-5 घरों में कमरतोड़ मेहनत करने के बाद भी वह महीने के ₹12,000-₹13,000 ही जुटा पाती थीं.
लेकिन असली क्रांतिकारी बदलाव तब आया, जब किरन ने समय की मांग को समझा और खुद को पारंपरिक डोमेस्टिक हेल्प से बदलकर एक 'डिजिटल गिग वर्कर' के रूप में ढाला. उन्होंने 'इंस्टा हेल्प' जैसे ऑनलाइन डोमेस्टिक हेल्प प्रोवाइड कराने वाले ऐप्स पर खुद को रजिस्टर किया.
नतीजा ये हुआ कि जो किरन कभी स्कूल लाइब्रेरी में दिनभर खटने के बाद ₹15,000 कमाती थीं, आज वह इन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए अपनी मर्जी के घंटों में काम करके हर महीने ₹30,000 से ₹36,000 तक कमा रही हैं.
आत्मनिर्भरता और बच्चों का बेहतर भविष्य
ग्लोबल मार्केट में जहां गिग वर्कर्स के शोषण और अनिश्चितता पर चिंता जताई जाती है, वहीं किरन जैसी महिलाओं के लिए ये डिजिटल प्लेटफॉर्म्स एक नई आजादी और आर्थिक सुरक्षा लेकर आए हैं.
किरन गर्व से कहती हैं, 'पहले से हमारी लाइफ बहुत ज्यादा बेटर हो गई है. आज मैं अपने दोनों बच्चों (14 साल का बेटा और 11 साल की बेटी) को एक अच्छे स्कूल में पढ़ा पा रही हूं.'
किरन की यह कहानी साबित करती है कि अगर आपके भीतर विपरीत हालातों से लड़ने का जज्बा हो और आप समय के साथ खुद को बदलने के लिए तैयार हों, तो डिजिटल युग का हर बदलाव आपके लिए सफलता का एक नया रास्ता खोल सकता है.