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एक्सप्लेनर: कलकत्ता एयरपोर्ट के बीच में मस्जिद कहां से आई? जानें 136 साल पुराना इतिहास

कोलकाता के दमदम एयरपोर्ट में मौजूद बांकरा मस्जिद को लेकर सुरक्षा और विस्तार को लेकर विवाद जारी है. ये मस्जिद एयरपोर्ट के सेकेंडरी रनवे के पास स्थित है और 19वीं सदी से यहां मौजूद है. एयरपोर्ट के विस्तार में मस्जिद को हटाने की कई कोशिशें की गईं, लेकिन सब नाकाम रहीं. अब सवाल ये है कि ये मस्जिद पहले बनी थी या एयरपोर्ट?

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ये मस्जिद 19वीं सदी से एयरपोर्ट पर मौजूद है. (Photo- ITGD)
ये मस्जिद 19वीं सदी से एयरपोर्ट पर मौजूद है. (Photo- ITGD)

कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट (दमदम एयरपोर्ट) में मौजूद मस्जिद में नमाज पढ़ने पर लगे सस्पेंश को लेकर विवाद जारी है. ये मस्जिद एयरपोर्ट के सेकेंडरी रनवे से महज 300 मीटर से भी कम दूरी पर है. इसे 'बांकरा मस्जिद' के नाम से जाना जाता है.

सुरक्षा और विमानों के सुरक्षित संचालन को लेकर ये मस्जिद सालों से विवादों में रही है. लेकिन पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य के मस्जिद को लेकर किए गए सवालों पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय के एक जवाब के बाद ये विवाद गरमा गया है.

बता दें कि इससे पहले बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहते हुए कोलकाता एयरपोर्ट में मस्जिद होने और वहां नमाज पढ़ने को लेकर सवाल उठाए थे. उन्होंने एयरपोर्ट के विस्तार में हो रही देरी का कारण भी बांकरा मस्जिद को बताया था.

शुभेंदु अधिकारी ने कहा था, 'सुरक्षा के नजरिए से कोलकाता एयरपोर्ट पर जो हो रहा है, वो बेहद चिंताजनक है. एयरपोर्ट के भीतर नमाज अदा की जा रही है और एयरपोर्ट की बाउंड्री को सील नहीं किया जा रहा है.'

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मस्जिद या एयरपोर्ट, पहले क्या बना?

इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर एक इंटरनेशनल एयरपोर्ट के सुरक्षित दायरे के भीतर ये मस्जिद आई कैसे? क्या मस्जिद पहले बनी थी या दमदम में एयरपोर्ट पहले बना था?

इतिहास और आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि ये छोटी सी बांकरा मस्जिद इस एयरपोर्ट से भी कई दशक पुरानी है. स्थानीय लोगों और एयरपोर्ट अथॉरिटी के मुताबिक, ये मस्जिद 19वीं सदी के अंत से यानी 1890 के दशक से यहां मौजूद है. ये वो दौर था जब ब्रिटिश सरकार ने कलकत्ता के उत्तरी छोर पर एयरोड्रोम बनाने के बारे में सोचा भी नहीं था.

(Photo- ITGD)

जिस जगह आज एयरपोर्ट का सेकेंडरी रनवे है, वहां 1890 के दशक में एक पूरा गांव बसा हुआ था और ये मस्जिद उसी गांव का हिस्सा थी. साल 1924 में अंग्रेजों ने पुरानी रॉयल आर्टिलरी आर्मरी (अब दमदम कैंटोनमेंट) के पास एयरोड्रोम का निर्माण कराया, जो आज के कोलकाता एयरपोर्ट का शुरुआती रूप था. उस समय भी इस एयरपोर्ट के पश्चिम में इंसानी आबादी और ये मस्जिद मौजूद थी.

एयरपोर्ट का विस्तार के लिए खाली कराया गया था गांव

इसके बाद 1950 और 1960 के दशक में हवाई यातायात तेजी से बढ़ा. तब एयरपोर्ट का विस्तार पश्चिम दिशा की ओर करने और एक नया सेकेंडरी रनवे बनाने का फैसला हुआ. इस विस्तार के लिए गांव को खाली कराया गया और वहां के निवासियों को जेसोर रोड के पार 'मध्यमग्राम' में बसा दिया गया.

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साल 1962 में जब राज्य सरकार ने इस जमीन का अधिग्रहण करके इसे भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) को सौंपा, तब शायद ये आपसी सहमति बनी थी कि इस सदी पुरानी मस्जिद को उसके मूल स्थान पर ही सुरक्षित रखा जाएगा. तब से लेकर आज तक इंसानी बस्तियां तो हट गईं, लेकिन मस्जिद रनवे के ठीक बगल में टिकी रही. एयरपोर्ट के जमीन के दस्तावेजों में भी इस मस्जिद का ब्योरा दर्ज है.

मस्जिद को हटाने की तमाम कोशिशें रहीं नाकाम

जैसे-जैसे समय बदला, विमानों का आकार बड़ा हुआ और विमानन सुरक्षा के नियम कड़े होते गए, वैसे-वैसे रनवे के पास इस मस्जिद की मौजूदगी एक बड़ी रुकावट बनती गई. पिछले दो दशकों से केंद्र और राज्य सरकारों ने कई बार इस मस्जिद को एयरपोर्ट परिसर से बाहर किसी नजदीकी जगह पर शिफ्ट करने का प्रस्ताव दिया. लेकिन मुस्लिम समुदाय और मस्जिद कमेटी ने हर बार इसे ठुकरा दिया.

(Photo- ITGD)

साल 2003 में तत्कालीन केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री शाहनवाज हुसैन और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के बीच एक अहम बैठक हुई थी. तब इस विवाद को सुलझाने के लिए मस्जिद को हटाने के बजाय रनवे का रास्ता ही मोड़ने का फैसला करना पड़ा था.

रिपोर्ट के मुताबिक, इस मस्जिद की वजह से न तो रनवे का विस्तार हो पा रहा था और न ही विमानों के लिए टैक्सीयवे बन पा रहा था. उस दौरान इस मस्जिद में रोजाना 50-60 लोग और जुमे के दिन 200 से 250 लोग नमाज पढ़ने आते थे, जबकि रमजान में ये संख्या और बढ़ जाती थी.

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AAI ने दिया था सुरंग बनाने का प्रस्ताव

साल 2019 में AAI ने प्रस्ताव दिया था कि जेसोर रोड से मस्जिद तक एक भूमिगत सुरंग बना दी जाए, ताकि नमाजियों का रास्ता अलग हो सके और ऊपर की जमीन का इस्तेमाल विमानों के टैक्सी ट्रैक के लिए किया जा सके. लेकिन सिक्योरिटी क्लियरेंस न मिलने की वजह से ये योजना भी लटक गई.

साल 2023 में एयरपोर्ट अथॉरिटी ने एक अनोखा तरीका निकाला. अब नमाजियों को रनवे के भीतर लाने-ले जाने के लिए एक विशेष बस सेवा शुरू की गई, जो 225 मीटर लंबे एक ऐसे रास्ते से गुजरती है जो विमानों के मेन रनवे तक जाने वाले टैक्सीवे को काटता है. लेकिन बिजी समय में इसकी वजह से विमानों के संचालन में भारी दिक्कतें आती हैं.

सुरक्षा और विस्तार पर बड़ा सवाल

1940 से 1960 के दशक के बीच कलकत्ता एयरपोर्ट दुनिया के सबसे व्यस्त एयरपोर्ट में से एक था, जहां यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को जोड़ने वाली इंटरनेशनल फ्लाइट्स रुकती थीं. दिल्ली और मुंबई के बाद ये देश का तीसरा सबसे बड़ा एयरपोर्ट था, जो अब घटकर छठे स्थान पर आ गया है.

इस मुद्दे पर जानी-मानी लेखिका तसलीमा नसरीन ने 2018 में 'द प्रिंट' में लिखा था, 'मस्जिद की वजह से किसी भी बाहरी व्यक्ति के लिए इस सुरक्षित और सिक्योर्ड जोन में प्रवेश करना काफी आसान हो जाता है.' 

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उन्होंने आगे लिखा था कि अगर प्रशासन सांप्रदायिक तनाव या मौलवियों की नाराजगी के डर से मस्जिद को हाथ नहीं लगाना चाहता, तो ये मुस्लिम नेताओं की जिम्मेदारी है कि वो खुद आगे आएं और मस्जिद को दूसरी जगह शिफ्ट करने के मामले को सुलझाएं. इससे समाज में एक पॉजीटिव मैसेज जाएगा.

यह भी पढ़ें: कोलकाता एयरपोर्ट की 136 साल पुरानी मस्जिद पर रार: मौलाना का दावा- यह ब्रिटिश राज से पहले की है, BJP बोली- सुरक्षा जरूरी

कुल मिलाकर सच यही है कि मस्जिद ऐतिहासिक है और वो वहां पहले से थी. लेकिन आज जब लाखों यात्रियों की सुरक्षा, नए टर्मिनल के निर्माण और एयरपोर्ट के आधुनिक विस्तार की बात आती है, तो रनवे के बगल में स्थित ये मस्जिद विकल्पों को बेहद सीमित कर देती है.

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