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आर्ट की पढ़ाई, मिल‍िट्री ट्रेन‍िंग से पद्मश्री तक, जानिए एक पोस्टर पेंटर कैसे बना महान एक्टर 'नाना पाटेकर'?

रौबदार आवाज, संवाद अदायगी और बेबाक तेवरों से भारतीय सिनेमा पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले नाना पाटेकर को सब जानते हैं. मगर इस सक्सेस स्टोरी के पीछे उनका बेहद गरीबी में बीता बचपन और कड़े संघर्षों के शोले भी हैं जिसने पोस्ट पेंट करने वाले लड़के नाना को दिनरात तपाकर कुंदन सा चमकाया और वो पद्मश्री नाना पाटेकर बने. आइए जानते हैं उनकी ये स्टोरी. 

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नाना पाटेकर कैसे बने महान एक्टर, संघर्षों में बीता था बचपन
नाना पाटेकर कैसे बने महान एक्टर, संघर्षों में बीता था बचपन

75 बरस के नाना पाटेकर ने आज गोवा स्थित अपने घर में आख‍िरी सांस ली. उनके जाने की खबर पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैल गई. हर किसी की याद में उनका कोई डायलॉग या उनका कोई रोल इस कदर बसा है कि वो बरसों उसे भुला नहीं पाएंगे. मुंबई की सड़कों पर महज 35 रुपये महीने के लिए पोस्टर पेंट करने वाले 13 साल के उस साधारण से लड़के ने कैसे बॉलीवुड से लेकर भारतीय सेना तक अपना लोहा मनवाया? जानिए नाना पाटेकर के जीवन की वो अनसुनी और प्रेरणादायक कहानी!

13 साल की उम्र में संभाली परिवार की बागडोर

नाना पाटेकर जब महज 13 साल के थे, तब उनके पिता का बिजनेस पूरी तरह डूब गया. परिवार अचानक आर्थिक तंगी के भयानक दौर में चला गया. परिवार को सहारा देने के लिए टीनेज में ही नाना ने मुंबई में फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम शुरू किया. ये करके उन्हें 35 रुपये महीने की कमाई होती थी. सिद्धार्थ कनन को दिए एक इंटरव्यू में नाना ने खुद खुलासा किया था कि वे रोज 8 किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाते थे. उस दौर में इस नौकरी से उन्हें महीने के करीब 35 रुपये और दिन में सिर्फ एक वक्त का भोजन मिलता था. लेकिन इसी संघर्ष ने उन्हें वक्त से पहले जिम्मेदार और मजबूत बना दिया.

सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से थिएटर और फिर 'गगमन' का ऐतिहासिक सफर

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पढ़ाई के प्रति अपने जुनून को नाना ने कभी नहीं घटने दिया. उन्होंने मुंबई के समर्थ विद्यालय से पढ़ाई की और इसके बाद प्रतिष्ठित सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से एप्लाइड आर्ट में डिप्लोमा पूरा किया. पेंटिंग के बाद उन्होंने थिएटर की दुनिया में कदम रखा, जहां उनके अभिनय का हुनर निखर कर सामने आया.

नेशनल अवॉर्ड का सफर 

1978 में आई फिल्म 'गगमन' से बॉलीवुड में कदम रखने वाले नाना को 'परिंदा', 'क्रांतिवीर' और 'अग्नि साक्षी' में उनके यादगार अभिनय के लिए 'राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार' से नवाजा गया. वहीं 'वेलकम' के उदय शेट्टी जैसे कॉमिक किरदार ने साबित किया कि वे हर शैली के उस्ताद हैं.

'प्रहार' की ट्रेनिंग, 1999 कारगिल युद्ध और सेना से अटूट रिश्ता

नाना पाटेकर का सेना से लगाव सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था. 1991 में उन्होंने बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' बनाई, जो भारतीय जवानों के कठिन प्रशिक्षण पर आधारित थी. इस फिल्म के लिए उन्होंने खुद मिलिट्री ट्रेनिंग ली थी. इतना ही नहीं, 1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ा, तब नाना पाटेकर खुद सीमा पर पहुंचे और जवानों के साथ समय बिताया. वे क्विक रिएक्शन टीम (QRT) का हिस्सा बनकर मोर्चे पर डटे रहे.

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 'नटसम्राट', पद्म श्री और किसानों के लिए जमीनी काम

हिंदी सिनेमा में तहलका मचाने के बाद भी नाना मराठी सिनेमा और रंगमंच से हमेशा जुड़े रहे. फिल्म 'नटसम्राट' में उनके भावुक अभिनय को आज भी भारतीय सिनेमा की बेहतरीन परफॉर्मेंस में गिना जाता है.

कला और समाज सेवा के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें साल 2013 में पद्म श्री से सम्मानित किया था. अभिनय के साथ-साथ उन्होंने 'नाम फाउंडेशन' के जरिए महाराष्ट्र के सूखा पीड़ित किसानों की मदद के लिए जमीनी स्तर पर करोड़ों रुपये का फंड जुटाया. 35 रुपये की दिहाड़ी से लेकर नेशनल अवॉर्ड जीतने वाले इस महान कलाकार का जीवन दिखाता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो गरीबी और हालात कभी आपके कदम नहीं रोक सकते.

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