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क्या एआई के कारण बदलती नौकरी की दुनिया Gen Z संभाल पाएगी? ये है एलन मस्क की राय

एआई अब भविष्य का खतरा नहीं रहा. ये पहले से तय कर रहा है कि किसे नौकरी मिलेगी, किसे ट्रेनिंग मिलेगी और किसे प्रमोशन. 2026 में जब ऑटोमेशन एंट्री-लेवल नौकरियों को बदल रहा है, तब यह सवाल सामने है कि Gen Z के लिए आशावादी रहना कितना मुश्किल और कितना जरूरी हो गया है.

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स्किल बनाम डर: AI शिफ्ट में युवाओं का असली इम्तिहान
स्किल बनाम डर: AI शिफ्ट में युवाओं का असली इम्तिहान

साल 2026 में नौकरी की दुनिया में कदम रखने का मतलब है ऐसे माहौल में जाना, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब कोई खास टूल नहीं, बल्कि काम का बुनियादी हिस्सा बन चुका है.

ड्राफ्टिंग, डेटा एनालिसिस से लेकर कस्टमर एंगेजमेंट तक एआई सिस्टम लगभग हर काम में शामिल हैं. इससे सिर्फ काम करने का तरीका नहीं बदला, बल्कि करियर की शुरुआत का ढांचा भी बदल गया है. अब सवाल ये नहीं है कि टेक्नोलॉजी करियर बदलेगी या नहीं, बल्कि यह है कि लगातार ऑटोमेशन के दौर में क्या आशावाद काम की रणनीति बन सकता है.

बदलाव अब धीरे-धीरे नहीं हो रहा

Randstad के 2026 वर्कमॉनिटर सर्वे के मुताबिक, दुनिया भर के अधिकतर कर्मचारियों को लगता है कि एआई उनके रोजमर्रा के काम को प्रभावित करेगा. एआई से जुड़ी स्किल्स वाली नौकरियों की मांग तेज़ी से बढ़ी है, जबकि कम जटिल और बार-बार दोहराए जाने वाले काम तेजी से मशीनों को दिए जा रहे हैं.

पीढ़ियों के बीच फर्क साफ दिखता है. Gen Z को नौकरी की सुरक्षा पर एआई के असर की सबसे ज्यादा चिंता है, जबकि उम्रदराज़ कर्मचारियों को खुद को ढाल लेने पर ज्यादा भरोसा है. इसका एक कारण समय है. युवा ऐसे सिस्टम में एंट्री ले रहे हैं जो पहले से ऑटोमेशन के हिसाब से बदल चुका है, जबकि बड़ी पीढ़ी ने बदलाव के साथ खुद को ढाला है.

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एलन मस्क की युवाओं को सलाह

टेक उद्यमी एलन मस्क ने युवाओं से कहा, 'मैं यही कहूंगा कि आशावादी रहो. भविष्य को लेकर सकारात्मक रहना बेहतर है. आशावादी होकर गलत होना, निराशावादी होकर सही होने से बेहतर है, आपकी जिंदगी की गुणवत्ता बेहतर रहेगी.

मैं लोगों से कहूंगा कि भविष्य को लेकर उत्साहित रहें. मैं खुद भविष्य को लेकर उत्साहित हूं. मुझे भरोसा है कि भविष्य उबाऊ नहीं होगा. ज्यादा किताबें पढ़ो, अलग-अलग चीजें आजमाओ. जिंदगी का आनंद लो, लेकिन काम करना भी जिंदगी का हिस्सा है.' यह सलाह ज्यादा दार्शनिक है, व्यावहारिक कम. लेकिन आज के युवाओं के लिए आशावाद पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम करेगा.

युवाओं के लिए कम हो रहे हैं एंट्री प्वाइंट  

एआई अपनाने का एक कम दिखाई देने वाला असर शुरुआती करियर पर पड़ा है. पहले जो काम जूनियर कर्मचारियों को सीखने का मौका देते थे जैसे बेसिक रिपोर्टिंग, कस्टमर हैंडलिंग, रूटीन एनालिसिस, अब वे मशीनें करने लगी हैं. इससे पढ़ाई से नौकरी तक का सफर ज्यादा अनिश्चित हो गया है. मौके मौजूद हैं, लेकिन कम हैं, ज्यादा स्किल की मांग करते हैं और सीखने के लिए पहले जैसी ढील नहीं देते.

आशावाद अब विकल्प नहीं, शर्त है

एआई को लेकर चिंता सिर्फ नौकरी जाने की नहीं बल्कि बदलाव की रफ्तार की है. नौकरी की जरूरतें इतनी तेजी से बदल रही हैं कि ट्रेनिंग सिस्टम पीछे छूट रहे हैं. अब एआई की समझ को सिखाया नहीं जाता, मान लिया जाता है कि आपको आती है. यानी खुद को बदलने की जिम्मेदारी व्यक्ति पर आ गई है.

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2026 में आशावादी रहने का मतलब है यह भरोसा रखना कि आप नई स्किल्स उतनी ही तेजी से सीख सकते हैं, जितनी तेजी से काम बदल रहे हैं. यह भी मानना पड़ेगा कि करियर अब सीधी रेखा में नहीं चलेगा और पारंपरिक पड़ाव कम होंगे.

चिंता ज्यादा है, लेकिन दूसरी तरफ Gen Z एआई टूल्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल भी कर रही है. कई युवा पहले से ड्राफ्टिंग, रिसर्च, कोडिंग और रोज़मर्रा के काम में जनरेटिव एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये परिचय जोखिम खत्म नहीं करता, लेकिन अनजान होने का डर जरूर कम करता है. Randstad के डेटा से यह भी पता चलता है कि चिंता के बावजूद लोग पीछे नहीं हटे हैं. बल्कि उन्हें समझ है कि तकनीकी बदलाव अस्थायी नहीं, संरचनात्मक है.

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