सालों तक प्रोग्रामरों ने अपने काम के मशीनी हिस्सों को तेज करने के लिए ऑटोमेशन का इस्तेमाल किया. लेकिन अब ऑटोमेशन का अगला और बेहद क्रांतिकारी चरण हमारे सामने आ चुका है. एआई एजेंट अब सिर्फ कोड लिखना ही नहीं, बल्कि ग्राहकों की शिकायतें सुलझाना, नेटवर्क की निगरानी करना और जटिल लेन-देन की प्रक्रियाओं को संभालना शुरू कर चुके हैं.
विरोधाभास देखिए, आईटी सेवा कंपनियों में इंसानी कोडर दिन-रात एक करके एआई एजेंटों को इंसानी क्षमताओं के बराबर लाने के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं, और वही एजेंट अब इतने काबिल हो चुके हैं कि उन्हें बनाने और ट्रेनिंग देने वाले इंजीनियरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं.
टेक महिंद्रा के चीफ एआई एंड इनोवेशन ऑफिसर निखिल मल्होत्रा का कहना है, 'एआई एजेंट अब शुरुआती स्तर की आईटी समस्याओं को दूर करने, सॉफ्टवेयर कोड जनरेट करने, सॉफ्टवेयर टेस्टिंग, सवालों के जवाब देने, इनवॉइस प्रोसेसिंग, फाइनेंशियल रिकॉन्सिलिएशन और टेलीकॉम नेटवर्क की निगरानी जैसे तमाम काम संभाल रहे हैं.'
यह ईमेल का ड्राफ्ट तैयार करने, स्पेलिंग की गलतियां सुधारने या दस्तावेज का सार बनाने वाले साधारण एआई चैटबॉट की तुलना में एक बहुत बड़ा अपग्रेड है. जैसे-जैसे एआई ज्यादा से ज्यादा भारी काम संभाल रहा है, उसे वर्कफोर्स के नए सदस्य के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब टीम का नया सदस्य इंसान न होकर एक डिजिटल एजेंट हो, तो भारत के 315 अरब डॉलर के आईटी सेवा क्षेत्र पर इसका क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका सबसे तात्कालिक असर आईटी कंपनियों के मार्जिन में गिरावट के रूप में दिख सकता है. बेंगलुरु की कंसल्टेंसी फर्म 'अनअर्थइनसाइट' का अनुमान है कि टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएलटेक और विप्रो जैसी दिग्गज आईटी कंपनियां वित्त वर्ष 2030 तक अपने मार्जिन में 2 से 3 प्रतिशत की कमी देखेंगी. इसकी वजह यह है कि मौजूदा आईटी कॉन्ट्रैक्ट्स में एआई और एजेंट आधारित प्लेटफॉर्म्स को बड़े पैमाने पर लागू किया जा रहा है और ग्राहक यह मांग कर रहे हैं कि उत्पादकता में हुई इस बढ़त का फायदा उन्हें डिस्काउंट के रूप में दिया जाए.
अनअर्थइनसाइट के सीईओ गौरव वासु कहते हैं, 'हम पिछले 12 से 24 महीनों में यह बदलाव देख रहे हैं. कोफोर्ज, हेक्सावेयर और एमफैसिस जैसी मिड-टियर या टियर-2 कंपनियों का औसत मार्जिन बड़े पैमाने पर एआई के इस्तेमाल और निवेश के कारण 16-18% से घटकर 14-16% पर आ सकता है.'
आइए, इस विशेष रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि एआई एजेंटों का यह दौर भारतीय आईटी सेक्टर और आपकी नौकरियों को किस तरह नया रूप दे रहा है...
सहायक से 'डिजिटल एम्प्लॉई' बनने तक का सफर
कंपनियां एआई के इस आगमन को अलग-अलग नजरिए से देख रही हैं. कुछ इन्हें 'असिस्टेंट' कहती हैं, तो कुछ 'डिजिटल टीममेट्स'. लेकिन अब एक तीसरी श्रेणी भी तेजी से उभर रही है, वो 'डिजिटल वर्कर', जो न तो पारंपरिक मायने में केवल एक सॉफ्टवेयर है और न ही एक मानव कर्मचारी.
आईटी सेवा कंपनी एमफैसिस के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर नितिन राकेश कहते हैं, 'हम एआई एजेंटों को ऐसे डिजिटल साथियों के रूप में देखते हैं जो उत्पादकता बढ़ाते हैं, काम पूरा होने का समय घटाते हैं, जानकारी खोजने की क्षमता बेहतर करते हैं और कंपनियों को बदलाव की रफ्तार तेज करने में मदद करते हैं.'
वहीं, पर्सिस्टेंट सिस्टम्स के सीओओ (टेक्नोलॉजी) जयदीप विजय ढोक एआई एजेंटों की क्षमता के तीन स्तर बताते हैं. जो यहां नीचे दिए गए हैं...
असिस्टिव: जो सिर्फ बुनियादी काम संभालता है, जैसे ईमेल का सार तैयार करना.
ऑटोमेशन: जहां एजेंट आने वाले ईमेल पढ़कर खुद उनके जवाब ड्राफ्ट करता है.
इंटेलिजेंट डिसिजन: जहां एजेंट ज्यादा समझदार हो जाता है. उदाहरण के लिए, किसी बैंक ऐप में आउटेज या गड़बड़ी का पता लगाकर साइबर सुरक्षा टीम को अलर्ट भेजना, खराबी पहचानना और उसे खुद ठीक करना.
एशिया-प्रशांत और जापान के लिए ओक्टा (Okta) की वाइस प्रेसिडेंट (प्री-सेल्स इंजीनियरिंग) स्टेफनी बार्नेट के अनुसार, संगठन एक ही समय में औसतन पांच अलग-अलग एआई-एजेंट केस चला रहे हैं. इनमें आईटी सपोर्ट, कस्टमर सर्विस, कोडिंग और बैक-ऑफिस काम शामिल हैं.
पुराने कोड से लेकर कॉल सेंटर तक: सब जगह एआई का कब्जा
पुराने बैंकिंग या हेल्थकेयर डेटाबेस (लीगेसी सिस्टम्स) को आधुनिक बनाना पहले बहुत मुश्किल काम माना जाता था. जिस काम के लिए पहले इंसानी टीमों को लाखों लाइनों वाले पुराने कोड को खुद जांचना पड़ता था, अब एआई एजेंट पलक झपकते ही सॉफ्टवेयर का विश्लेषण करके उसके नियम और काम करने का तरीका निकाल लेते हैं.
हेल्थकेयर और फाइनेंस में कमाल: पर्सिस्टेंट सिस्टम्स ने अमेरिका के एक किडनी-केयर संस्थान में मरीजों के डेटा, इंश्योरेंस क्लेम और क्लिनिकल जानकारी को जोड़ने के लिए एआई एजेंटों का इस्तेमाल किया है. पहले लोगों को एक सिस्टम से दूसरे सिस्टम में डेटा भेजना पड़ता था, अब एआई एजेंट यह काम खुद कर रहे हैं.
कस्टमर सपोर्ट का कायाकल्प: एक्सोटेल के ग्लोबल मार्केटिंग हेड और वीपी उदित अग्रवाल के मुताबिक, एआई एजेंट अब तीन मुख्य भूमिकाएं निभा रहे हैं...
ऑटोनॉमस फ्रंट-लाइन रिजॉल्वर: जो ऑर्डर स्टेटस, बैलेंस चेक और डिलीवरी ट्रैकिंग जैसे सामान्य काम खुद निपटाता है.
रियल-टाइम कोपायलट: जो कॉल के दौरान मानव एग्जीक्यूटिव को जवाब सुझाता है और समरी तैयार करता है.
क्वालिटी एनालिस्ट: इंसानी टीमें जहां सिर्फ 2 से 5 फीसदी कॉल की समीक्षा कर पाती थीं, वहीं एआई सिस्टम 100% कॉल्स की जांच कर उनकी परफॉर्मेंस स्कोरिंग कर सकता है.
वॉयस एआई कंपनी 'क्रिस्प' के सह-संस्थापक और सीईओ डेविट बगदासारयान कहते हैं, 'एआई एजेंट वे काम संभाल रहे हैं जो दोहराव वाले और नियमों पर आधारित हैं. जैसे-जैसे काम का दायरा बढ़ रहा है, इंसान 'काम करने वाले' (एग्जीक्यूटर) की भूमिका से ऊपर उठकर 'निर्देश देने वाले' (डायरेक्टर) की भूमिका में आ रहा है.'
इंसान और AI का नया रिश्ता समझिए
दफ्तरों में इंसान और एआई के बीच एक नया रिश्ता बन रहा है, मशीनें अनुमान लगाए जा सकने वाले काम करती हैं, जबकि इंसान अनिश्चित और जटिल परिस्थितियों को संभालते हैं.
कैपजेमिनी इंडिया की एग्जीक्यूटिव वीपी पद्मश्री शाग्रिथाया कहती हैं, 'हम कोड-सेंट्रिक विकास से 'स्पेसिफिकेशन-केंद्रित' विकास की ओर बढ़ रहे हैं.' यानी अब इंजीनियरों को एआई एजेंट को यह बताना होगा कि उनका बिजनेस गोल क्या है, क्या सीमाएं हैं और सफलता को कैसे मापा जाएगा.
बगदासारयान का मानना है कि एआई से संगठन ज्यादा लीन और फ्लैटर होंगे. यानी टीमों का आकार छोटा होगा, जिम्मेदारियां बढ़ेंगी और फैसले लेने वालों तथा उसे लागू करने वाले एआई एजेंटों के बीच मैनेजमेंट लेयर्स कम होंगे.
नौकरियों पर संकट: L0 और L1 पद हुए 'ह्यूमनलेस'
एआई एजेंटों को लेकर सबसे बड़ी चिंता छंटनी और नौकरियों के खत्म होने की है.
लेयरों का खात्मा: मिड-टियर आईटी कंपनी कोफोर्ज (Coforge) ने अपने 13-स्तरीय मैनेजमेंट ढांचे को घटाकर सिर्फ 4 बैंड में समेट दिया है.
जूनियर रोल पर असर: एमफैसिस जैसी कंपनियों में जूनियर इंजीनियरिंग रोल (L0 और L1, जैसे हेल्पडेस्क सपोर्ट) अब पूरी तरह 'ह्यूमनलेस' (बिना इंसानों के) हो चुके हैं. एडवांस्ड टेक्निकल सपोर्ट वाली L2 कैटेगरी में भी एजेंट इंसानों की मदद कर रहे हैं.
वैश्विक छंटनी का आंकड़ा
ओरेकल, पेपाल, अमेजन, एडिडास और मेटा जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनियों ने इस साल भारत में करीब 12,000 से 15,000 नौकरियां कम की हैं. ओरेकल ने आधिकारिक तौर पर माना है कि एआई तकनीक अपनाने से उसके कर्मचारियों की संख्या घटी है. ग्लोबल लेऑफ ट्रैकर (layoffs.fyi) के मुताबिक, 2025 में 1.22 लाख और 2026 में अब तक करीब 1.30 लाख कर्मचारियों की छंटनी हो चुकी है, जिसका सबसे बड़ा झटका बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और चेन्नई जैसे भारतीय आईटी हब्स को लगा है.
'बागी' (Rogue) एआई एजेंटों का नया खतरा
पूरी तरह से अपने आप काम करने वाले (Autonomous) एआई एजेंटों के साथ सुरक्षा के गंभीर खतरे भी जुड़े हैं. अगर कोई एजेंट अपनी तय सीमा से बाहर चला जाए (Rogue Agent), तो वह क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को डिलीट कर सकता है या संवेदनशील डेटा लीक कर सकता है.
जुलाई 2026 की घटना: ओपनएआई के सैकड़ों इवैल्यूएशन एजेंट अपने सुरक्षित दायरे (Sandbox) से बाहर निकल गए और ओपन-सोर्स एआई कंपनी 'हगिंग फेस' के प्रोडक्शन सिस्टम में सेंध लगाकर डेटा चुरा लिया.
जून 2026 की घटना: ओपनएआई का एक एजेंट एन्क्रिप्शन चाबियां तलाशते समय ऑस्ट्रेलिया सरकार की एक आधिकारिक वेबसाइट में अनधिकृत रूप से घुस गया था. ये घटनाएं दिखाती हैं कि स्वायत्त एजेंटों का खतरा कितना वास्तविक है.
भविष्य में किसे मिलेगी बढ़त?
जब हर कंपनी के पास एआई एजेंट होंगे, तो असली मुकाबला किस बात का होगा? विशेषज्ञों के मुताबिक, बढ़त तीन बातों से मिलेगी:
डेटा और संदर्भ: मॉडल एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन उस एजेंट के पास आपकी कंपनी के ग्राहकों और प्रक्रिया की कितनी गहरी जानकारी है, यह मायने रखेगा.
भरोसा और विश्वसनीयता: एआई एजेंट कितनी नियमितता से सही काम करता है और कंपनी उसकी गलतियों को कितनी जल्दी पकड़ती है.
इंसानी दखल का सही समय: जटिल, संवेदनशील और बड़े जोखिम वाले मामलों में इंसान का सही इस्तेमाल ही ग्राहक अनुभव को सबसे बेहतर बनाएगा.
सच पूछिए तो भविष्य के दफ्तरों में रुटीन काम करने वाले लोग कम और उनकी तरफ से काम करने वाले डिजिटल कर्मचारी ज्यादा होंगे. सबसे मूल्यवान कर्मचारी वह नहीं होगा जो सबसे ज्यादा काम कर सकता है, बल्कि वह होगा जो यह जानता है कि कौन सा काम एआई एजेंट को सौंपना है और उसकी निगरानी कैसे करनी है.