रात के अंधेरे में अचानक गोलीबारी, आईईडी ब्लास्ट, फिर सन्नाटा... हमलावर गायब. सुबह पाकिस्तान हवाई हमले करता है. यही सिलसिला पिछले एक हफ्ते से चल रहा है. तालिबान और पाकिस्तान के बीच अब खुली जंग है, लेकिन यह कोई साधारण जंग नहीं – यह गुरिल्ला युद्ध है. तालिबान की सबसे बड़ी ताकत.
गुरिल्ला युद्ध क्या है?
गुरिल्ला युद्ध को छापामार युद्ध भी कहते हैं. इसमें बड़ी फौज के खिलाफ छोटे-छोटे समूह काम करते हैं. अचानक हमला करते हैं. फिर जंगल, पहाड़ या गांव में गायब हो जाते हैं. दुश्मन को ढूंढना मुश्किल हो जाता है. स्थानीय लोगों का समर्थन मिलता है. यह युद्ध लंबा चलता है और बड़ी सेना को थका देता है.
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तालिबान ने रूस और अमेरिका को कैसे सबक सिखाया?
1980 के दशक में सोवियत रूस की विशाल सेना अफगानिस्तान आई थी. तालिबान के पूर्वज मुजाहिदीन ने गुरिल्ला युद्ध से उन्हें 10 साल में भागने पर मजबूर कर दिया. 2001 में अमेरिका आया. सबसे ताकतवर फौज, सबसे महंगे हथियार. तालिबान ने 20 साल तक छापामार हमले किए. आखिरकार 2021 में अमेरिका को बिना जीते वापस जाना पड़ा. अब वही तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ अपना पुराना हथियार इस्तेमाल कर रहा है.

सीमा पर गुरिल्ला हमले कब शुरू हुए?
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तालिबान की गुरिल्ला ताकत क्यों इतनी मजबूत?
पाकिस्तानी सेना कहां फंस गई?
पाकिस्तान की फौज दुनिया की 7वीं सबसे बड़ी है. टैंक, ड्रोन, जेट सब हैं. लेकिन गुरिल्ला युद्ध में ये सब कम पड़ रहे हैं. पहाड़ों में बड़ी फौज नहीं घूम सकती. हमला छोटा और अचानक होता है. तालिबान गायब हो जाता है. हर दिन 24 घंटे अलर्ट रहना पड़ रहा है.

2021 से अब तक 1000 से ज्यादा पाक सैनिक मारे जा चुके हैं. पाकिस्तान ने ओपन वॉर का ऐलान कर दिया है. हवाई हमले तेज कर दिए हैं, लेकिन तालिबान का गुरिल्ला हमला रुक नहीं रहा.
इतिहास दोहरा रहा है?
तालिबान की असली ताकत हथियार नहीं, बल्कि गुरिल्ला युद्ध की रणनीति है. इसी ने पहले रूस और अमेरिका को सबक सिखाया. अब पाकिस्तान उसी सबक को भुगत रहा है. जंग लंबी चली तो पाकिस्तान को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.