रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन -DRDO ने गुरुवार को बेंगलुरु के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (CABS) में स्वदेशी नेत्र एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम को अंतिम ऑपरेशनल क्लियरेंस (FOC) दे दिया है. यह भारतीय वायु सेना (IAF) के लिए एक बड़ी उपलब्धि है. नेत्र को आकाश की आंख कहा जाता है क्योंकि यह दुश्मन के विमानों, जहाजों और मिसाइलों का बहुत पहले पता लगाकर वायुसेना को सतर्क कर देता है.
यह मंजूरी नेत्र प्रोग्राम के विकास, परीक्षण और ऑपरेशनल जांच-पड़ताल के पूरा प्रोसेस होने के बाद दी गई है. नेत्र भारत का पहला स्वदेशी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग प्लेटफॉर्म है. अब इसे पूरी तरह से ऑपरेशनल तैनाती के लिए तैयार है.
नेत्र AEW&C सिस्टम ब्राजील के एम्ब्रेयर EMB-145 विमान पर लगा हुआ है. इसमें उन्नत सेंसर लगे हैं जो हवा में उड़ते दुश्मन विमानों, समुद्र की सतह पर चल रहे जहाजों और दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को दूर से ही पहचान लेते हैं. यह सिर्फ पता नहीं लगाता, बल्कि युद्ध के दौरान कमांडरों को रीयल-टाइम जानकारी देता है. लड़ाकू विमानों को नियंत्रित करने में भी मदद करता है.
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यह प्रणाली नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर की क्षमता बढ़ाती है. मतलब, एक जगह से मिली जानकारी को पूरी वायु सेना के साथ तुरंत साझा किया जा सकता है. नेत्र को तीन EMB-145 विमानों पर विकसित किया गया है. इनमें स्वदेशी मिशन एवियोनिक्स और सर्विलांस सिस्टम को पूरी तरह जोड़ा गया है.
ऑपरेशन सिंदूर में नेत्र की भूमिका
नेत्र AEW&C ने पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायु सेना के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसे युद्ध क्षेत्र में ‘आकाश की आंख’ के रूप में इस्तेमाल किया गया. इसने दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी, शुरुआती चेतावनी दी. वायु सेना के कमांडरों को लड़ाई का सटीक नक्शा दिया. इस सफलता ने नेत्र की विश्वसनीयता को और मजबूत किया है.

1983 से अब तक का डेवलपमेंट
CABS की डायरेक्टर के. राजलक्ष्मी मेनन ने बताया कि भारतीय वायु सेना की स्वदेशी AEW&C क्षमता की तलाश 1983 में शुरू हुई थी. सरकार ने DRDO के तहत एक प्रोजेक्ट ऑफिस बनाया था. शुरुआती अध्ययन प्रोजेक्ट गार्जियन के तहत किए गए.
1991 में इटली से खरीदे गए नेवल रडार को HS-748 अवरो विमान पर लगाकर परीक्षण किया गया. यह देश में पहली बार ऐसा रडार उड़ान भरने का मौका था. इसके बाद लंबी मेहनत के बाद नेत्र तैयार हुआ.
पहले तीन नेत्र विमानों को IAF को Initial Operational Clearance (IOC) के साथ सौंपा गया था. अब FOC मिलने के बाद ये पूरी तरह ऑपरेशनल जरुरतों को पूरा कर चुके हैं. वर्तमान में भारतीय वायु सेना के पास कुल छह AEW&C प्लेटफॉर्म हैं. इनमें तीन रूसी IL-76 विमानों पर इजरायली फाल्कन सिस्टम लगे हैं. तीन स्वदेशी नेत्र हैं. नेत्र के FOC मिलने से स्वदेशी हिस्से की संख्या बढ़ गई है.
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महत्व क्यों है FOC का?
FOC मिलने का मतलब है कि सिस्टम अब सभी परीक्षण पास कर चुका है. वास्तविक युद्ध स्थितियों में पूरी क्षमता के साथ काम कर सकता है. इससे पहले IOC में यह सीमित रूप से इस्तेमाल होता था. अब वायुसेना इसे पूरी तरह से तैनात कर सकेगी.
नेत्र का विकास और एकीकरण DRDO, भारतीय वायु सेना और उद्योग भागीदारों के संयुक्त प्रयास से हुआ है. इसमें स्वदेशी तकनीक का भारी इस्तेमाल किया गया है, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी और रखरखाव की लागत भी घटेगी.
नेत्र AEW&C भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है. यह सिर्फ एक विमान नहीं, बल्कि पूरे युद्ध क्षेत्र की निगरानी और नियंत्रण की क्षमता बढ़ाता है. आने वाले समय में और ज्यादा नेत्र जैसे प्लेटफॉर्म विकसित किए जाएंगे, जिससे भारतीय वायुसेना की पहुंच और निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी.