भारतीय थल सेना अपनी मारक क्षमता और मैकेनाइज्ड फायरपावर को एक ऐसे अभूतपूर्व स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रही है, जो पिछले कई दशकों में नहीं देखा गया है. सीमा पर चीन और पाकिस्तान से मिल रही दोहरी चुनौतियों के बीच भारतीय सेना ने देश के सैन्य इतिहास के सबसे बड़े तोपखाना खरीद कार्यक्रमों में से हरी झंडी देने वाली है.
सेना जल्द ही 300 से अधिक के-9 वज्र (K9 Vajra) सेल्फ-प्रोपेल हॉवित्जर तोपों की खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय से मंजूरी मांगने जा रही है. इस मेगा डिफेंस डील की अनुमानित लागत लगभग ₹23,000 करोड़ आंकी जा रही है. इस बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव को इसी हफ्ते रक्षा खरीद बोर्ड के सामने समीक्षा और मंजूरी के लिए रखे जाने की पूरी संभावना है. यदि इस सौदे को रक्षा मंत्रालय से हरी झंडी मिल जाती है, तो इसका सीधा ठेका भारतीय निजी क्षेत्र की दिग्गज इंफ्रास्ट्रक्चर और डिफेंस कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को मिलेगा.
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एलएंडटी इन तोपों का निर्माण भारत में दक्षिण कोरिया की रक्षा कंपनी 'हनव्हा एयरोस्पेस' साथ तकनीकी साझेदारी के तहत कर रही है. यह कदम न केवल सेना की ताकत बढ़ाएगा, बल्कि भारत के 'मेक इन इंडिया' और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के संकल्प को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा.

500 के पार पहुंचेगी 'के9 वज्र' की कुल संख्या
भारतीय सेना द्वारा यह अधिग्रहण हाल के दशकों में देश का सबसे बड़ा आर्टिलरी प्रोक्योरमेंट प्रोग्राम बनने जा रहा है. इस नए और भारी-भरकम ऑर्डर के बाद भारतीय सेना के पास मौजूद और ऑर्डर पर रखे गए के9 वज्र तोपों की संख्या 500 के जादुई आंकड़े को पार कर जाएगी. इतनी बड़ी संख्या में आधुनिक ट्रैक-माउंटेड तोपों की मौजूदगी से भारतीय आर्टिलरी की ताकत में कई गुना इजाफा होना तय है.
साल 2017 में भारत सरकार ने एलएंडटी के साथ लगभग ₹4,500 करोड़ की लागत से पहले 100 के9 वज्र तोपों के लिए पहला ऐतिहासिक अनुबंध किया था. एलएंडटी ने इन तोपों की डिलीवरी तय समय सीमा से पहले ही साल 2021 में पूरी कर दी थी, जिन्हें शुरुआत में मुख्य रूप से पश्चिमी सीमा पर राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी क्षेत्रों में तैनात किया गया था.
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इसके बाद, सेना की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए दिसंबर 2023 में रक्षा मंत्रालय ने लगभग ₹7,600 करोड़ की लागत से और 100 तोपों के लिए एक फॉलो-ऑन डील पर हस्ताक्षर किए थे. अब, 300 अतिरिक्त तोपों का यह तीसरा प्रस्ताव सेना के तोपखाने की पूरी रूपरेखा को बदलकर रख देगा.

रेगिस्तान से लद्दाख की बर्फीली चोटियों तक: क्यों खास है के9 वज्र?
के9 वज्र एक 155mm/52-कैलिबर की सेल्फ-प्रोपेल (स्वयं चलने वाली) हॉवित्जर है, जो दुश्मन के ठिकानों पर 40 किलोमीटर से अधिक की दूरी तक सटीक और विनाशकारी हमला करने में सक्षम है. शुरुआत में इस बख्तरबंद तोप को केवल मैकेनाइज्ड फोर्स के साथ रेगिस्तानी इलाकों में तेजी से आगे बढ़ने के लिए तैयार माना जाता था.
लेकिन साल 2020 में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शुरू हुए गतिरोध के बाद सेना ने इसके इस्तेमाल का दायरा पूरी तरह बदल दिया. भारतीय थल सेना ने अत्यधिक कम तापमान और ऑक्सीजन की कमी वाले लद्दाख के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में के9 वज्र के विशेष 'कोल्ड-वेदर' वेरिएंट के कड़े परीक्षण किए.
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इन ट्रायल्स में इस भारी-भरकम तोप ने शून्य से नीचे के तापमान में भी बेहतरीन और संतोषजनक प्रदर्शन करके सेना के शीर्ष कमांडरों का दिल जीत लिया. पहाड़ों की दुर्गम चोटियों पर इस तोप की सफल तैनाती ने यह साबित कर दिया कि यह केवल रेगिस्तान का राजा नहीं, बल्कि बर्फीले पहाड़ों पर भी दुश्मन को नेस्तनाबूद करने का अचूक हथियार है.

'शूट-एंड-स्कूट' क्षमता और बख्तरबंद सुरक्षा: आधुनिक युद्ध की जरूरत
आधुनिक युद्ध के मैदान में केवल दूर तक गोला दागना ही काफी नहीं होता, बल्कि खुद को दुश्मन के जवाबी हमले से बचाना भी उतना ही जरूरी होता है. के9 वज्र तोप इस मामले में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सिस्टम्स में से एक है क्योंकि इसमें 'शूट-एंड-स्कूट' की गजब की क्षमता है. इसका मतलब यह है कि यह तोप एक जगह खड़े होकर तेजी से गोले बरसाने के तुरंत बाद अपनी लोकेशन बदलकर दूसरी जगह भाग सकती है, जिससे दुश्मन चाहकर भी इसके सही ठिकाने का पता नहीं लगा पाता.
यह तोप पूरी तरह से बख्तरबंद है, जो इसके भीतर बैठे सैन्य क्रू को दुश्मन के छोटे हथियारों के हमले और तोपों के छर्रों से पूरी सुरक्षा प्रदान करती है. इसकी बेहतरीन मोबिलिटी के कारण इसे टैंकों के साथ आसानी से युद्ध क्षेत्र में आगे बढ़ाया जा सकता है. सेना इस नई खरीद के जरिए चीन और पाकिस्तान दोनों ही मोर्चों पर मौजूद रणनीतिक और ऑपरेशनल गैप्स को पूरी तरह से पाटना चाहती है, ताकि भविष्य की किसी भी सैन्य चुनौती का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके.