दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने करीब 29 साल पुराने एक ब्लाइंड मर्डर केस का खुलासा करते हुए बड़ी सफलता हासिल की है. साल 1997 में पश्चिमी दिल्ली के राजौरी गार्डन इलाके में हुई हत्या के मामले में फरार चल रहे आरोपी फहीम उर्फ अली भाई को लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया गया है. आरोपी लगभग तीन दशक तक पुलिस की पकड़ से दूर रहा और लगातार अपनी पहचान बदलकर अलग-अलग शहरों में छिपता रहा.
साल 1997 में पश्चिमी दिल्ली के राजौरी गार्डन इलाके में हुए एक सनसनीखेज हत्या के मामले का खुलासा करीब 29 साल बाद हुआ है. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इस मामले के मुख्य आरोपी फहीम उर्फ अली भाई को गिरफ्तार कर लिया है. पुलिस के मुताबिक आरोपी हत्या के बाद लगातार फरार चल रहा था और अपनी पहचान छिपाकर अलग-अलग राज्यों में रह रहा था. यह मामला दिल्ली पुलिस के सबसे पुराने लंबित हत्या के मामलों में शामिल था.
यह मामला 14 मार्च 1997 का है, जब रघुबीर नगर स्थित टीसी कैंप के एक कमरे से एक अज्ञात व्यक्ति का शव बरामद हुआ था. पुलिस जांच के दौरान मृतक की पहचान उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के रहने वाले 58 वर्षीय शरीफ हसन खान के रूप में हुई थी. शरीफ हसन खान राजौरी गार्डन की एक कपड़ों की दुकान में काम करते थे. मामले की जांच शुरू हुई, लेकिन आरोपी लंबे समय तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहा.
पुलिस जांच में सामने आया कि मोहम्मद फहीम रोजगार की तलाश में दिल्ली आया था और इसी दौरान उसकी पहचान शरीफ हसन खान से हुई थी. दोनों के बीच कामकाज के दौरान संपर्क बढ़ा था. पुलिस के अनुसार, 13 मार्च 1997 को फहीम ने कथित तौर पर शरीफ हसन खान के पैसे चुरा लिए थे. इसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ, जिसने बाद में एक खौफनाक हत्याकांड का रूप ले लिया.
जांच के मुताबिक विवाद के दौरान मोहम्मद फहीम ने लोहे की रॉड से शरीफ हसन खान पर कई बार हमला किया. इसके बाद उसने यह सुनिश्चित करने के लिए कि पीड़ित जीवित न बचे, रस्सी से उसका गला घोंट दिया. हत्या करने के बाद आरोपी ने शव को एक लकड़ी के बेड बॉक्स में छिपा दिया था और मौके से फरार हो गया था. घटना के बाद पुलिस ने आरोपी को बहुत तलाश किया, लेकिन उसे पकड़ा नहीं जा सका.
लगातार फरार रहने के कारण वर्ष 1997 में ही अदालत ने मोहम्मद फहीम को घोषित अपराधी (प्रोक्लेम्ड ऑफेंडर) घोषित कर दिया था. हालांकि, समय बीतने के साथ मामला ठंडे बस्ते में चला गया. हाल ही में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की सेंट्रल रेंज को इस पुराने मामले की दोबारा जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसके बाद पुलिस टीम ने नए सिरे से जांच शुरू की.
क्राइम ब्रांच के अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मामला लगभग तीन दशक पुराना था. आरोपी की हालिया तस्वीरें, विश्वसनीय पहचान रिकॉर्ड और आधुनिक डिजिटल सबूत उपलब्ध नहीं थे, क्योंकि यह अपराध उस दौर का था जब आज जैसी डिजिटल जांच प्रणाली मौजूद नहीं थी. इसके बावजूद पुलिस ने स्थानीय स्तर पर खुफिया जानकारी जुटाने और तकनीकी निगरानी का सहारा लेकर जांच को आगे बढ़ाया.
पीटीआई के अनुसार, जांच के दौरान पुलिस को आरोपी के पैतृक गांव से जानकारी मिली कि मोहम्मद फहीम अभी भी जीवित है और कभी-कभी वहां आता-जाता है. इसके बाद पुलिस ने उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी. तकनीकी और मानवीय खुफिया जानकारी के आधार पर उसकी लोकेशन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ट्रेस की गई. इसके बाद पुलिस टीम ने योजनाबद्ध तरीके से ऑपरेशन चलाकर 3 जुलाई को ठाकुरगंज इलाके से उसे गिरफ्तार कर लिया.
पूछताछ के दौरान मोहम्मद फहीम ने पैसे के विवाद में शरीफ हसन खान की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. उसने बताया कि हत्या के बाद वह नागपुर भाग गया था और अगले 29 वर्षों तक महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के कई शहरों, जिनमें मुंबई, नागपुर और लखनऊ शामिल हैं, में 'अली भाई' नाम से छिपकर रहता रहा. इस दौरान वह प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) का काम करता था और गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपना ठिकाना बदलता रहता था.