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ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0: गुजरात पुलिस की बड़ी कार्रवाई, 2289 करोड़ के साइबर फ्रॉड का खुलासा, 638 गिरफ्तार

गुजरात पुलिस के ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 में 2289 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड का खुलासा हुआ है. 565 एफआईआर दर्ज हुईं, 638 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और सैकड़ों म्यूल अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई की गई. पढ़ें इस ऑपरेशन की पूरी कहानी.

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गुजरात पुलिस पकड़े गए आरोपियों से पूछताछ कर रही है (फोटो-ITG)
गुजरात पुलिस पकड़े गए आरोपियों से पूछताछ कर रही है (फोटो-ITG)

गुजरात में साइबर अपराध के खिलाफ राज्य पुलिस ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए 'ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0' को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है. इस अभियान के तहत म्यूल अकाउंट्स के जरिए किए जा रहे बड़े साइबर फ्रॉड नेटवर्क का पर्दाफाश किया गया. पुलिस ने 2289 करोड़ रुपये की आर्थिक धोखाधड़ी का खुलासा करते हुए सैकड़ों आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की है. इस अभियान का उद्देश्य आम नागरिकों की मेहनत की कमाई को साइबर अपराधियों से बचाना और दोषियों को कड़ी सजा दिलाना है.

गुजरात सरकार ने साइबर अपराध पर लगाम लगाने के लिए नई रणनीति अपनाई है. मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल के मार्गदर्शन और गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में पूरे राज्य में विशेष अभियान चलाया गया. गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CCE) ने इस अभियान का संचालन किया और विभिन्न जिलों में समन्वित कार्रवाई कर साइबर अपराध के बड़े नेटवर्क को निशाना बनाया.

इस अभियान का मुख्य फोकस म्यूल अकाउंट्स पर रहा. म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी धोखाधड़ी से हासिल धन को जमा करने, ट्रांसफर करने और मनी लॉन्ड्रिंग के लिए करते हैं. इन खातों के मालिकों को 'मनी म्यूल' कहा जाता है. कई मामलों में लोग जानबूझकर तो कई बार अनजाने में भी अपने खाते साइबर अपराधियों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध करा देते हैं.

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साइबर अपराधी आमतौर पर ठगी की रकम को सीधे अपने खाते में रखने के बजाय म्यूल अकाउंट्स के जरिए एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर करते हैं. इससे जांच एजेंसियों के लिए अपराधियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है. गुजरात पुलिस ने ऐसे खातों की पहचान कर उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखी और उनके खिलाफ व्यापक कार्रवाई शुरू की.

वर्ष 2025 में शुरू किए गए ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 में राज्य के सभी पुलिस आयुक्त, रेंज प्रमुख, लोकल क्राइम ब्रांच और साइबर पुलिस स्टेशनों को शामिल किया गया. अभियान की रोजाना निगरानी मुख्यालय स्तर से की गई और लगातार प्रोग्रेस रिपोर्ट ली गई. इससे अभियान को एक संगठित और परिणाम आधारित दिशा मिली.

पुलिस ने भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP), समन्वय पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन से प्राप्त डेटा का व्यापक विश्लेषण किया. इस डेटा इंटेलिजेंस के आधार पर संदिग्ध खातों और अपराधियों की पहचान की गई. इसके बाद जिलों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति कर फील्ड स्तर पर कार्रवाई को तेज किया गया.

ऑपरेशन के दौरान शिकायतों के निस्तारण और जांच को मजबूत बनाने के लिए विशेष सपोर्ट टीमों का गठन किया गया. साथ ही सभी बैंकों के साथ रियल टाइम डेटा शेयरिंग की व्यवस्था स्थापित की गई. पुलिस और बैंकिंग संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय ने इस अभियान को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

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गुजरात पुलिस का कहना है कि डेटा इंटेलिजेंस, तकनीकी विश्लेषण और विभिन्न एजेंसियों के तालमेल के कारण म्यूल अकाउंट्स की जड़ों तक पहुंचना संभव हो सका. इसी रणनीति की बदौलत साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे वित्तीय नेटवर्क को बड़ा झटका दिया गया और कई महत्वपूर्ण सुराग सामने आए. ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 की उपलब्धियां भी बेहद अहम रही हैं. 

अभियान के दौरान कुल 565 एफआईआर दर्ज की गईं और 638 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया. इसके अलावा 193 म्यूल अकाउंट्स पर कार्रवाई की गई तथा 4052 अपराधों की पहचान हुई, जिनमें से 491 मामले गुजरात से जुड़े पाए गए. जांच में कुल 2289 करोड़ रुपये की आर्थिक धोखाधड़ी का खुलासा हुआ. इस अभियान का असर बैंकिंग लेनदेन के पैटर्न पर भी दिखाई दिया. 

पुलिस के अनुसार चेक के माध्यम से होने वाले निकासी लेनदेन में करीब 75 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. मासिक चेक विड्रॉल 126 करोड़ रुपये से घटकर केवल 25 करोड़ रुपये रह गया, जो लगभग 80 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है.

पहली लेयर के म्यूल अकाउंट्स, यानी वे खाते जिनमें सबसे पहले ठगी का पैसा जमा होता है, उनकी संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है. अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच ऐसे खातों में 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. वहीं सितंबर से दिसंबर 2025 के दौरान एटीएम के जरिए नकद निकासी में 66 प्रतिशत की कमी देखी गई, जो अभियान की प्रभावशीलता को दर्शाती है.

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साइबर अपराध के खिलाफ इस लड़ाई को और मजबूत बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मार्गदर्शन में इंडियन डिजिटल पेमेंट इंटेलिजेंस कॉर्पोरेशन (IDPIC) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रिस्क स्कोरिंग प्रणाली लागू करने जा रहा है. इसके तहत हर लेनदेन को लो रिस्क, मीडियम रिस्क और हाई रिस्क श्रेणी में वर्गीकृत किया जाएगा.

संदिग्ध खातों की पहचान आसान बनाने के लिए Mulehunter.ai नामक रजिस्ट्री भी विकसित की गई है, जिससे विभिन्न बैंक आपस में जानकारी साझा कर सकेंगे और साइबर अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई कर पाएंगे.
 

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