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CBI ने पुतले से किया ट्विशा की मौत का डमी ट्रायल, गिरिबाला सिंह और समर्थ को लेकर खुलेंगे कौन-कौन से राज?

ट्विशा की मौत मामले में CBI ने क्राइम सीन का लाइव रिक्रिएशन और डमी ट्रायल कराया. मृतका की सास गिरिबाला सिंह और पति समर्थ सिंह को घटनास्थल पर ले जाकर पूरी घटना दोहराई गई. जानिए इस डमी ट्रायल का मकसद और पूरी कहानी.

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डमी ट्रायल के दौरान CBI ने कोई कसर नहीं छोड़ी (फोटो-ITG)
डमी ट्रायल के दौरान CBI ने कोई कसर नहीं छोड़ी (फोटो-ITG)

20 दिन बाद एक बार फिर ट्विशा की मौत हुई. लेकिन इस बार ये मौत डमी मौत थी. वही घर, वही छत, वैसा ही फंदा और आस-पास वही लोग, जिन्होंने ट्विशा को फांसी के फंदे पर लटकते हुए देखने का दावा किया था. मतलब ट्विशा की सास और उसका पति. दरअसल, ट्विशा की कद काठी का और ठीक उसके वजन जितना एक पुतला तैयार किया गया. उसके गले में फंदा डाला गया. फिर ट्विशा की सास से कहा गया कि वो फंदा खोले. पति से कहा गया कि वो लाश को नीचे उतारे. और सब कुछ लाइव कैमरे में रिकॉर्ड होता रहा. इस तरह ट्विशा की मौत का मंजर एक बार फिर सामने आ गया.

5 दिनों की सीबीआई हिरासत में भेजी गई ट्विशा की सास और पूर्व जज साहिबा गिरिबाला सिंह इस वक्त ये सीबीआई की हिरासत में हैं और उसी हिरासत में उन्हें उनके घर ले जाया गया. उसी घर में जिसकी छत पर 12 मई को ट्विशा की मौत हुई थी. पिंक रंग के कुर्ते और ट्राउज़र में CBI अफ़सरों से घिरि गिरिबाला सिंह के चाल और तेवर में अब भी कोई फर्क नहीं दिख रहा था. 

समर्थ सिंह- ट्विशा का पति और जज साहिबा रहीं गिरिबाला सिंह का बेटा. वो भी 5 दिनों की CBI हिरासत में है. अपनी हिरासत में CBI वाले उसे अपने साथ उसी घर में ले गए, जिस घर में 12 मई को ट्विशा की मौत हुई थी. वहां एक पुतला था. जिसे आप डमी भी कह सकते हैं. डमी कुल 3 टुकड़ों में थी और हर टुकड़ा कार से निकाले जाने के बाद एक एक शख्स उठाकर इसे अपने साथ ले जा रहा था. उसी घर में जिस घर में ट्विशा की 12 मई को मौत हुई थी.

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पुतले के 3 टुकड़ों में पहला सिर और धड़ था. उसके पीछे जो शख्स था, उसके हाथ में दोनों हाथ थे. और उसके पीछे जो शख्स था, उसके पास उस पुतले के दोनों पैर थे. वहीं एक वज़न तोलने वाले मशीन थी. जिसे वेइंग मशीन भी कहते हैं. जब पुतले के तीनों टुकड़े आपस में मिला लिए जाएंगे तब उसी वेइंग मशीन से उस पुतले का वजन लिया जाएगा. पुतले का वज़न ठीक उतना ही होना चाहिए, जितना ट्विशा का वजन था.

वज़न घटाने या बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होने वाला वेट प्लेट्स वहां मौजूद थे. इसमें हर तरह का वेट प्लेट्स था 2 किलो, 5 किलो. 10 किलो, 20 किलो. अगर पुतले का वज़न कम ज्यादा होगा तो इसी वेट प्लेट्स से उसके वेट को पूरा 80 किलो किया जाएगा. तो मां बेटे यानि गिरिबाला सिंह और समर्थ सिंह घर के अंदर पहुंच चुके थे. डमी यानि पुतला, वेइंग मशीन, वेट प्लेट्स ये भी घर के अंदर पहुंचाए जा चुके थे. CBI की टीम ख़ासकर फॉरेंसिक टीम भी घर के अंदर जा चुकी थी.

घर के अंदर दाख़िल होने के बाद पुतले समेत सारा साज़ो सामान, CBI की टीम, फॉरेंसिक टीम अब सभी पूर्व जज साहिबा गिरिबाला सिंह के घर के इसी छत पर इकट्ठा हो चुके थे. CBI की टीम के बीच बस एक चेहरा अलग था और वो चेहरा था ट्विशा के पति समर्थ सिंह का. अब सवाल ये था कि CBI की इस टीम के बीच छत पर इस वक्त गिरिबाला सिंह और समर्थ सिंह क्या कर रहा था? 

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तो बस यूं समझ लीजिए की जिस रिक्रिएशन या डमी ट्रायल के लिए CBI की टीम वहां पहुंची है वो गिरिबाला सिंह और समर्थ सिंह के बिना मुमकिन ही नहीं था. क्योंकि समर्थ सिंह ही वो पहला शख्स था जिसने अपनी बीवी ट्विशा को 12 मई की रात इसी छत पर ठीक इसी जगह फंदे से लटका देखा था. वो समर्थ ही थी जो ये बता सकता था कि फंदा कैसे कसा था? गांठ गर्दन के किस तरफ थी. पैर ज़मीन से कितना ऊपर या नीचे था? फंदे और गांठ के बीच चेहरे का रुख़ क्या था? 

समर्थ अगर पहला चश्मदीद था तो दूसरी चश्मदीद थी समर्थ की मां यानि ट्विशा की सास गिरिबाला सिंह. क्योंकि वो गिरिबाला सिहं ही थी जिसने 12 मई की रात ट्विशा के गले का फंदा खोला था. पर पहले समर्थ सिहं की बारी थी. क्योंकि छत पर सबसे पहले वही गया था. अब छत पर ट्रायल शुरु हुआ. सबसे पहले सीबीआई और फॉरेंसिक टीम टायर जैसे उसी रिंग पर इलैस्टिक का ठीक वैसा ही बेल्ट बांधती है.

बेल्ट कसी जा चुकी थी. क्राइम सीन पर समर्थ मौजूद था. सीबीआई की टीम बाकायदा बेल्ट का फंदा बनाने के बाद उस फंदे की गांठ या रस्सी की हाइट सब कुछ उसी के हिसाब से रिक्रिएट कर रहे थी. जब समर्थ ने फंदे के बारे में अपनी फ़ाइनल राय दी उसी के बाद ट्रायल का पहला फेज़ पूरा हो गया. अब बारी थी सबसे अहम ट्रायल की. थोड़ी देर पहले जिस पुतले या डमी को तीन टुकड़ों में देखा गया था अब वो तैयार हो चुका था. सभी टुकड़ों को जोड़कर बाकायदा उसे ट्विशा के वजन के बराबर बनाकर उस पुतले को काले रंग की वेस्ट पहनाई गई. 

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अब उस डमी को छत पर लगे उसी रिंग से लटकते इलैस्टिक के बेल्ट के फंदे से गले को कसना था. शायद ट्विशा के गले में जो फंदा कसा था उसकी गांठ बाईं तरफ़ थी क्योंकी सीबीआई की टीम ने भी समर्थ से पूछकर डमी के गले में गांठ बाईं तरफ़ ही कसी थी. अब फंदा बिल्कुल तैयार हो चुका था. जिस जगह और जैसे ट्विशा की लाश पहली बार फंदे से झूलते हुए मां-बेटे ने देखी थी, उसी हिसाब से डमी को लटकाया गया. पूर्व जज साहिबा गिरिबाला सिंह और उसके बेटे समर्थ सिंह से बातचीत के बाद अब आख़िरी ट्रायल पूरा करना था. 

ये ट्रायल ये था कि अब ट्विशा फंदे से झूल चुकी थी. थोड़ी देर बाद उसका पति समर्थ और सास गिरिबाला सिंह छत पर आती हैं और पहली बार दोनों ट्विशा को फंदे से झूलते उसे देखते हैं. जैसा कि दोनों ने सीबीआई को अपने बयान में कहा था. जब पहली बार मां-बेटे की नजर फंदे से झूलती ट्विशा पर पड़ी, तब दोनों ने क्या किया अब यही ट्रायल शुरु होना था. तो जानते हैं मां-बेटे का उस रात पहला रिएक्शन क्या था? 

सबसे पहले ट्विशा के करीब 12 मई की रात समर्थ गया था. उसने फंदे से झूलती ट्विशा को पीछे से पकड़ा. पर शायद वो ट्विशा को नीचे नहीं उतार पा रहा था. क्योंकि गले में फंदा कसा था. तभी सास गिरिबाला सिंह छत पर आईं. वो गिरिबाला सिहं ही थी जिसने ट्विशा के गले से फंदा खोला था. दोनों मां-बेटे ने बिल्कुल वही सीन रिक्रिएट किया. फंदा खोलने के बाद अब समर्थ किसी तरह ट्विशा के इस पुतले को जमीन पर रखता है. वजन शायद ज्यादा था इसीलिए उसे ट्विशा को उठाने में परेशानी हो रही थी. 

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इसके बाद ट्विशा को किसी तरह छत की सीढ़ी के करीब तक लाया गया. सीबीआई की टीम भी रिक्रिएशन के दौरान उस सीढ़ी तक पहुंची. लेकिन अफ़सोस हमारा कैमरा वहां तक नहीं पहुंच पाया. वैसे उसी 12 मई की रात की सीसीटीवी की तस्वीर भी सामने आई है, जब सीढ़ी के ऊपर समर्थ और फिर बाद में उसका एक कज़िन और पड़ोसी शायद ट्विशा को सीपीआर देने की कोशिश कर रहे थे. यानि उसकी सांसे वापस लाने की कोशिश कर रहे थे. कम से कम तस्वीर में तो यही दिखाया गया. और इस तरह क्राइम सीन का रिक्रिएशन और डमी ट्रायल अपने अंजाम तक पहुंचा.

पर सवाल ये है कि आख़िर इस रिक्रिएशन या डमी ट्रायल से सीबीआई किस नतीजे पर पहुंचना चाहती है. क्या किसी क्राइम सीन के रिक्रिेएशन या डमी ट्रायल से केस की सच्चाई सामने आ सकती है. अगर हां तो कैसे? और सबसे बड़ा सवाल ये कि ये डमी ट्रायल क्या होता है? इससे सीबीआई ये कैसे पता लगा सकती है कि ट्विशा ने खुदकुशी की या उसका क़त्ल हुआ है? तो चलिए अब आपको क्राइम सीन का रिक्रिएशन और डमी ट्रायल, डमी ट्रायल का सच और डमी ट्रायल के नतीजे. तीनों के बारे में बताते हैं.

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मध्य प्रदेश फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी के पूर्व डायरेक्टर डॉक्टर हर्ष शर्मा ने हैंगिंग यानि फांसी से हुई मौत के सैकड़ों केस देखे हैं. डॉक्टर हर्ष शर्मा के मुताबिक किसी भी रिक्रिएशन या डमी ट्रायल के लिए सबसे जरूरी होता है, वो चश्मदीद जिसने सबसे पहले क्राइम सीन को देखा. फॉरेंसिक ज़ुबान में इसे लास्ट सीन भी कहते हैं. यानि ऐसा गवाह जिसने लाश को फंदे से लटकते हुए देखा हो. जिसने ये देखा हो कि जब लाश फंदे से झूल रही थी तब उसकी पोजिशन क्या थी? उसके पैर कहां थे? गले पर फंदे की गांठ किस तरफ थी. सिर किस तरफ झुका हुआ था.

वैसे ज्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना यही है रिक्रिएशन या डमी ट्रायल बस इस हद तक तो काम आता है कि ये पता लगाया जा सके कि चश्मददी सच बोल रहा है या झूठ? लेकिन रिक्रिएशन या डमी ट्रायल से कोई भी जांच एजेंसी ये पता नहीं कर सकती कि मामला खुदकुशी का है या कत्ल का? 

वैसे ट्विशा केस पर ये रिक्रिएशन या डमी ट्रायल कितना असर डालेगा ये तो पता नहीं लेकिन अब सीबीआई भी होशियार हो चुकी है. उसे पता है कि किसी सुलगते केस पर कैसे काम करना चाहिए? फ़ाइनल रिपोर्ट जो भी आए पर कम से कम सीबीआई मीडिया के जरिए ये बताने की कोशिश में है कि देखो वो कितनी मेहनत से इस केस पर काम कर रही है. 

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वरना आप ही बताइए आज से पहले क्या आपने कभी किसी फांसी का ऐसा लाइव रिक्रिएशन या डमी ट्रायल देखा है? सीबीआई की टीम को भी पता था कि इस छत की ठीक सामने वाली छत पर पूरी मीडिया इकट्ठी है. हर कैमरे का रुख उन्हीं की तरफ है. फिर भी उन्होंने किसी पर्दे से क्राइम सीन को ढकने की कोशिश ही नहीं की. 

इतना ही नहीं सीबीआई की गाड़ियां आराम से गिरिबाला सिंह के घर के इस गेट तक भी आ सकती थी. लेकिन फिर कैमरे में एक्शन कहां से कैद होता. लिहाजा, जिस गाड़ी में पुतले यानि डमी रखे थे उसे घर से दूर खड़ी कर वहां से पैदल इन पुतलों को उठाकर लाया गया ताकि हर कैमरा अच्छे से इन्हें कैद कर सकें. अब सोचिए ये सब देख देख कर भोपाल पुलिस की क्या हालत होगी.

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