कुछ महीने पहले ही गोल्ड और सिल्वर खरीदारों की धूम मची हुई थी. हर कोई अपने पोर्टफोलियो में सोना और चांदी को जोड़ना चाहता था. ज्यादातर निवेशक शेयर के बदले गोल्ड-सिल्वर ETFs में निवेश करना पसंद कर रहे थे. सोशल मीडिया पर इंफ्यूएंशर भी तरह-तरह के टिप्स दे रहे थे. यहां तक कि फंड हाउसेस भी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए नए-नए फंड या ईटीएफ पेश कर रहे थे.
इसका कारण सिर्फ एक था, वह सोने-चांदी के दाम में रिकॉर्ड तेजी. पिछले कुछ सालों में सोने-चांदी ने इतनी तेजी दिखाई थी कि सभी हैरान थे. कई लोगों के पैसे कुछ ही महीनों में डबल हो गए थे, तो कई को एक से दो महीनों में ही बंपर रिटर्न मिला था.
लिहाजा फोमो के चक्कर में फंसकर लोगों ने खूब सोने-चांदी की खरीदारकी की. हालांकि, अब सब सुस्त पड़ चुके हैं. कोई सोना-चांदी ईटीएफ खरीदने की बात नहीं कर रहा, कोई एक्सपर्ट्स अब सलाह भी नहीं दे रहा है. सोशल मीडिया पर भी चुप्पी छाई हुई है.
इस कारण, पिछले कुछ समय से सोने-चांदी के भाव में गिरावट से Gold-Silver ETFs के प्राइस काफी नीचे आ चुके हैं. छोटे से लेकर बड़े निवेशकों ने इन असेट से जमकर पैसा निकाला है. मई, 2026 में गोल्ड ईटीएफ से करीब 725 करोड़ रुपये की रकम निकाली जा चुकी है.
गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ से कितनी हुई निकासी?
भारतीय म्यूचुअल फंड संघ (AMFI) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार , मई में गोल्ड ईटीएफ से ₹725 करोड़ की शुद्ध निकासी दर्ज की गई, जो अप्रैल में हुई ₹3,040 करोड़ की नेट बाइंग थी. यह गिरावट इस कैटेगरी में एक साल तक निर्बाध खरीद के बाद आई है. इस निकासी के बाद भी गोल्ड ईटीएफ का एयूएम बढ़ा है. पिछले साल की तुलना में यह तीन गुना बढ़कर 1.85 लाख करोड़ रुपये हो चुका है. यह गोल्ड की मजबूत मांग का दिखाता है.
अब प्रॉफिट बुकिंग खत्म?
विश्लेषकों ने इस उलटफेर का कारण मुनाफावसूली, मजबूत अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती को लेकर बदलती उम्मीदों के संयोजन को बताया है. INVasset PMS के बिजनेस हेड हर्षल दासानी ने कहा कि गोल्ड ईटीएफ दबाव में हैं क्योंकि बाजार महंगाई से बचाव के लिए खरीदारी से हटकर ब्याज दर के जोखिम के आधार पर रिवैल्यूवेशन की ओर बढ़ गया है.
उन्होंने कहा कि अमेरिका के रोजगार संबंधी आंकड़ों के उम्मीद से बेहतर आने से इस बात की चिंता फिर से बढ़ गई है कि महंगाई स्थिर रह सकती है, जिससे फेडरल रिजर्व द्वारा आक्रामक ब्याज दर में कटौती की संभावना कम हो जाती है. उन्होंने कहा कि सोना कोई रिटर्न नहीं देता, इसलिए जब अमेरिका बॉन्ड यील्ड और डॉलर में बढ़ोतरी होती है, तो इसे रखने की अवसर लागत बढ़ जाती है.सोने की कीमतों में तेज उछाल के बाद ग्लोबल स्तर पर लंबी अवधि के निवेश को खत्म करने से भी यह गिरावट और बढ़ रही है.
उन्होंने आगे कहा कि हालांकि पोर्टफोलियो हेज के तौर पर सोने के लिए लॉन्गटर्म तर्क अभी भी बरकरार है, लेकिन व्यापार में भीड़ बढ़ गई है और अब मुनाफावसूली देखने को मिल रही है.
सिल्वर का शानदार प्रदर्शन
जहां निवेशकों ने सोने में अपना निवेश कम किया, वहीं चांदी के ETF में मजबूत मांग जारी रही. औद्योगिक मांग में मजबूती की उम्मीदों और निवेशकों की बढ़ती रुचि के चलते मई में इस कैटेगरी में ₹2,133 करोड़ का कुल निवेश हुआ है. हालांकि, दासानी ने चेतावनी दी कि चांदी ग्लोबल मार्केट आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव के प्रति संवेदनशील बनी हुई है.
दासानी के अनुसार, सौर ऊर्जा, विद्युतीकरण और आपूर्ति संबंधी बाधाओं जैसे विषयों से चांदी के लॉन्गटर्म नजरिया को समर्थन मिलता है, हालांकि निकट भविष्य में कीमतों में होने वाले बदलाव डॉलर की गति, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और फेडरल रिजर्व की नीतिगत फैसलों पर निर्भर करता है.
(नोट- सोना-चांदी में किसी भी तरह के निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की मदद जरूर लें.)