ईरान-अमेरिका के बीच जंग रुक चुकी है और होर्मुज को खोल दिया गया है, जिसके बाद तेल के टैंकर होर्मुज से होकर आने भी लगे हैं. इस बीच, भारत एक बड़ा काम करने पर विचार कर रहा है. ताकि जब संकट आए तो भारत में तेल की कमी ना हो.
तेल का आयात प्रभावित होने के बाद भी भारत, चीन जैसे देश की तरह ही अपना काम चुपचाप करता रहे. साथ ही देश की जनता को ईंधन और गैस की कमी का सामना ना करना पड़े. सूत्रों ने बताया कि सरकार इस काम को तेजी से करने पर विचार कर रही है.
दरअलस, बिजनेस टुडे को सूत्रों ने बताया कि भारत एक व्यापक राष्ट्रीय भंडार नीति पर विचार कर रहा है जिसका उद्देश्य देश की कच्चे तेल भंडारण क्षमता को काफी हद तक बढ़ाना और अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है.
सूत्रों के अनुसार, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMC) के सहयोग से, भारत के कच्चे तेल के भंडार को बढ़ाने और देश की भंडारण क्षमता को वर्तमान स्तर लगभग 74 दिनों से बढ़ाकर 100 से 150 दिनों के बीच करने की योजनाओं पर काम कर रहा है.
तेल और एनर्जी के लिए नए जगहों की भी तलाश
तेल मंत्रालय के अनुसार, भारत के कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार मौजूदा समय में करीब 74 दिनों का है. नए प्रस्ताव के तहत सरकारी स्वामित्व वाली रिफाइनरियां इंडिय ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) देश के तेल भंडारण और भंडार अवसंरचना के विस्तार की दिशा में काम कर रही हैं. सरकार और तेल उत्पादक कंपनियां एक्स्ट्रा कच्चे तेल भंडार स्थापित करने के लिए भारत भर में कई स्थानों की खोज भी कर सकती हैं.
क्या है इस कदम का मकसद?
इस कदम का उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाजारों में आपूर्ति संबंधी बाधाओं और अस्थिरता का सामना करने की भारत की क्षमता को बढ़ाना है. कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक और उपभोक्ता होने के नाते, भारत अपनी तेल मांग के 85% से अधिक की पूर्ति के लिए विदेशी आपूर्ति पर निर्भर है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा एक प्रमुख नीतिगत प्राथमिकता है.
उद्योग जगत के सूत्रों ने बताया कि सरकार रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडारण सुविधाओं के निर्माण के लिए कई स्थानों का वैल्यूवेशन कर रही है. भौगोलिक विविधता सुनिश्चित करने और आपात स्थितियों के दौरान आपूर्ति तक तुंरत पहुंच के लिए कई स्थलों पर विचार किया जा रहा है.
गौरतलब है कि यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है, जब ग्लोबल स्तर पर जियो-पॉलिटिकल तनाव बढ़ा हुआ है और वैश्विक तेल बाजारों में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है. कई देश आपूर्ति में अचानक कमी और कीमतों में अचानक वृद्धि से खुद को बचाने के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ा रहे हैं.