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PK रिटर्न! खोई जमीन या पार्टी का रुतबा? नई यात्रा से क्या गेन करना चाहते हैं

चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर एक बार फिर से बिहार की यात्रा पर निकल रहे हैं. 8 फरवरी से 13 फरवरी तक प्रशांत किशोर बिहार के अलग-अलग जिलों की यात्रा करेंगे. उनकी यात्रा दोबारा से जन सुराज को खड़ी करने और अपने बिखरते सियासी कुनबे को बचाए रखने का दांव माना जा रहा है.

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बिहार की यात्रा पर फिर निकल रहे प्रशांत किशोर(Photo-PTI)
बिहार की यात्रा पर फिर निकल रहे प्रशांत किशोर(Photo-PTI)

बिहार की सियासत में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी प्रमुख लालू यादव का विकल्प बनने का प्रशांत किशोर का ख्वाब धरा रह गया. विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका. इतना ही नहीं जन सुराज के दो उम्मीदवारों को छोड़कर सभी की जमानत जब्त हो गई थी. ऐसे में जन सुराज के कई नेताओं का मोहभंग हो गया और उन्होंने पार्टी को अलविदा कह दिया था. ऐसे में बिखरते सियासी कुनबा के बीच प्रशांत किशोर फिर से बिहार की जमीन पर उतरने जा रहे हैं. 

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर 8 फरवरी से बिहार की यात्रा शुरू कर रहे हैं. उनकी यह यात्रा चंपारण से शुरू होगी और 13 फरवरी को वैशाली में खत्म होगी. प्रशांत किशोर पहले चरण की यात्रा छह दिनों की होगी, जिसमें आधा दर्जन जिलों का दौरा करके सियासी थाह लेंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि पीके जन सुराज के कुनबे को बचाने निकल रहे हैं या फिर दोबारा से पार्टी को खड़े करने की स्टैटेजी है? 

PK की बिहार यात्रा का पूरा रोडमैप
प्रशांत किशोर के बिहार यात्रा का रोडमैप जुन सुराज पार्टी ने जारी कर दिया है. जन सुराज के बिहार अध्यक्ष मनोज भारती ने प्रशांत किशोर की यात्रा को लेकर पार्टी के जिला अध्यक्षों को पत्र लिखा है. प्रशांत किशोर बिहार यात्रा का आगाज एक बार फिर से एतिहासिक धरती पश्चिम चंपारण के बगहा से करेंगे. इसके बाद दूसरे दिन बेतिया पहुंचे और फिर पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में पार्टी की बैठक करेंगे. 

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मोतिहारी के बाद प्रशांत किशोर मिथालंचल के दरभंगा पहुंचे, जहां पर पार्टी नेताओं के साथ बैठक करेंगे. इसके बाद मुजफ्फरपुर से होते हुए वैशाली पहुंचेगे. वैशाली में पीके की यात्रा का पहला चरण का समापन होगा. इस तरह छह दिनों में प्रशांत किशोर बिहार के छह जिलों में पार्टी संगठन को लेकर मंथन करेंगे.  

पार्टी को दोबारा खड़ा करने का प्लान
प्रशांत किशोर की 8 फरवरी से शुरू होने वाली ये यात्रा न केवल उनकी पार्टी का वजूद बचाने की कोशिश है, बल्कि 2025 की गलतियों को सुधारकर नए संगठनात्मक ढांचे के निर्माण की एक बड़ी कवायद है. पार्टी की ओर से जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार, जिस भी जिले में प्रशांत किशोर बैठक करेंगे.  सुराज के वरिष्ठ नेताओं के साथ बिहार के विभिन्न जिलों का भ्रमण करेंगे. 

पीके के द्वारा जिले की बैठक के ठीक तीन दिनों के भीतर जिला मुख्यालय में ही प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में नए संगठन की घोषणा कर दी जाएगी. ये 'क्विक एक्शन' मॉडल पार्टी में खाली पड़े पदों को भरने और सक्रिय लोगों को जिम्मेदारी सौंपने के लिए अपनाया गया है. इस बहाने संगठन को दोबारा से खड़े करने का दांव माना जा रहा है. 

बिखरते कुनबे के बचाने का क्या दांव? 
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद जन सुराज के प्रमुख चेहरों में से एक भोजपुरी गायक रितेश पांडे ने पार्टी छोड़ दी है तो मनीष कश्यप फिर से एक यूट्यूबर बन गए हैं. इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह कभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ करके 'घर वापसी' करने के संकेत दे रहे हैं. इस तरह से बदलते सियासी माहौल में बिखरते हुए सियासी कुनबे को बचाए रखने के लिए खुद पीएम अब व्यक्तिगत रूप से जिला इकाइयों से संवाद करने की प्लानिंग की है. 

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पीके की इस यात्रा का मूल उद्देश्य 'सशक्तीकरण और पुनर्गठन' है। पार्टी का मानना है कि इस दौरे से उन नेताओं को कड़ा संदेश जाएगा जो चुनाव हार के बाद साथ छोड़ रहे हैं. इसके अलावा पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं को भविष्य के लिए तैयार किया जा सकेगा. प्रशांत किशोर की राजनीति का मूल मंत्र 'सीधा संवाद' है. वो कहते रहे हैं कि बिहार की समस्या व्यवस्थागत है, जिसे केवल राजधानी में बैठकर नहीं बदला जा सकता. ऐसे में उनकी इस यात्रा के पीछे मुख्य रूप से तीन उद्देश्य नजर आते हैं.

हार का विश्लेषण और सुधार का प्लान
2025 के नतीजों ने साफ कर दिया कि केवल भीड़ जुटाने और प्रचार से वोट नहीं मिलते. ऐसे में पीके नई यात्रा के जरिए अपनी कमियों को जमीनी स्तर पर जाकर समझने की रणनीति है. जन सुराज अभी भी एक 'अभियान' जैसा अधिक और 'पार्टी' जैसा कम दिखता है. ऐसे में दोबारा यात्रा के माध्यम से वह ब्लॉक और पंचायत स्तर पर कार्यकर्ताओं की एक फौज तैयार करना चाहते हैं. 

वहीं, विपक्ष की खाली जगह को भरना का दांव माना जा रहा है. बिहार में नीतीश कुमार की राजनीति का सूर्यास्त करीब माना जा रहा है और तेजस्वी यादव की अपनी सीमाएं हैं. ऐसे पीके खुद को 'तीसरे ध्रुव' (Third Pole) के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. प्रशांत किशोर भले ही 'शून्य' पर जरूर आउट हुए, मगर अब तक मैदान नहीं छोड़े हैं. अब 'जन सुराज' में बड़ी सर्जरी के लिए एक बार फिर से मैदान में उतर रहे हैं.

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बिहार यात्रा से क्या हासिल करेंगे पीके
बिहार में 2025 के विधानसभा चुनावों में अपेक्षित सफलता न मिलने (0 सीटें, करीब 3-6% वोट शेयर) के बावजूद, अब उनका दोबारा यात्रा पर निकलना उनकी 'जिद' और 'दृढ़ता' दोनों को दर्शाता है. जन सुराज के सामने सबसे बड़ी बाधा बिहार का जातीय समीकरण है. बिहार में वोट आज भी 'काम' से ज्यादा 'नाम' (जाति) पर गिरता है. बीजेपी के पास सवर्ण और अति-पिछड़ा वोट है, आरजेडी के पास एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण. ऐसे पीके का 'सबको साथ लेकर चलने' का विचार सुनने में अच्छा है, लेकिन चुनावी गणित में इसे तब्दील करना बेहद कठिन है. 

पीके पहले कई दलों के रणनीतिकार रहे हैं. जनता के एक वर्ग में अभी भी यह संशय है कि वह अंततः किसके साथ जाएंगे या कहीं वह किसी राष्ट्रीय पार्टी की 'बी-टीम' के तौर पर तो नहीं? विपक्ष उन पर बीजेपी की बी-टीम का आरोप लगाता रहा है. इस नैरेटिव को तोड़ने और पार्टी को जोड़े रखने के मकसद से निकल रहे हैं. बिना चुनावी जीत के कार्यकर्ताओं को लंबे समय तक जोड़े रखना किसी भी नए दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है.

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