Isobutanol Blending in Diesel: देश में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की चर्चा अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि डीजल को लेकर एक नया प्रयोग सुर्खियों में है. सरकार अब डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की संभावना तलाश रही है. नाम थोड़ा कठिन है, लेकिन इसके पीछे का मकसद बेहद बड़ा है. विदेशों से आने वाले महंगे तेल पर निर्भरता कम करना, किसानों के लिए नए पैदा करना और प्रदूषण पर लगाम लगाना. लेकिन क्या यह नया फ्यूल आपकी गाड़ी के इंजन के लिए सही रहेगा? क्या माइलेज पर असर पड़ेगा? और सबसे बड़ा सवाल, क्या आने वाले सालों में डीजल भी पेट्रोल की तरह 'ब्लेंडेड फ्यूल' बन जाएगा? यही वह कहानी है जो भारत के फ्यूल सेक्टर में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है.
डीजल में इस नई ब्लेंडिंग की चर्चा हम पहले भी अपने पुराने रिपोर्ट में कर चुके हैं. अब ताजा मामला ये है कि, केंद्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने डीजल में ब्लेंडिंग को लेकर बड़ा ऐलान किया है. हाल ही में देश की पहली फ्लेक्स फ्यूल कार (Wagon R Flex Fuel) के लॉन्च के मौके पर गडकरी ने कहा कि, "हम डीजल में इथेनॉल तो डाल नहीं सकते, इसलिए इथेनॉल से आइसोब्यूटेनॉल भी बन रहा है. और आइसोब्यूटेनॉल डीजल का विकल्प बन सकता है."
गडकरी ने कहा कि, "मैंने किर्लोस्कर के दो जेनरेटर सेट लॉन्च किए हैं. जिसमें से एक 100 प्रतिशत इथेनॉल पर और दूसरा आइसोब्यूटेनॉल पर सफलतापूर्वक चल रहा है. तो इंजन बन सकता है. और डीजल में भी 15 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की तैयारी चल रही है." इससे पहले भी गडकरी डीजल ब्लेंडिंग के बारे में बातें कर चुके हैं. पिछले साल अगस्त में पुणे में प्राज इंडस्ट्रीज द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भी उन्होंने कहा था कि, प्राज इंडस्ट्री और ARAI मिलकर आइसोब्यूटेनॉल पर काम करना शुरू किया है और वो लगातार इस पर प्रयोग कर रहे हैं.
अभी इस ब्लेंडिंग की कोई टाइमलाइन सामने नहीं आई है. लेकिन जिस तरह सरकार फ्यूल और एनर्जी सेक्टर को लेकर एक्टिव नज़र आ रही है, उम्मीद है कि जल्द ही देश के सड़क और खेत आइसोब्यूटेनॉल की महक से गमक उठेंगे. एक तरफ सरकार ने दिल्ली में E85 फ्यूल (82.12 रुपये) लॉन्च किया है, जिसकी कीमत रेगुलर पेट्रोल (102.12 रुपये) के मुकाबले तकरीबन 20 रुपये कम है. अब सरकार जल्द ही डीजल ब्लेंडिंग पर भी फैसला ले सकती है.
लेकिन इससे पहले डीजल में भी मिलावट की गंध महसूस हो, ये जानना जरूरी है कि, ये नई ब्लेंडिंग किस हद तक ऑटो सेक्टर और एग्रीकल्चरर्र सेक्टर को प्रभावित करेगी. क्योंकि देश में पेट्रोल और ईवी के साथ-साथ एक बड़ा वर्ग डीजल से चलने वाले वाहनों का प्रयोग करता है. जिसमें किसान, व्यपारी और इंडस्ट्रियल मशीनरी सभी शामिल हैं.
आइसोब्यूटेनॉल मूल रूप से एल्केनॉल (अल्कोहल) ग्रुप से आने वाला एक कलरलेस, फ्लेमेबल ऑर्गेनिक लिक्विड है. इसका केमिकल फार्मूला (C₄H₁₀O) है. इसे डीजल में ब्लेंडर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. अपने हाई एनर्जी डेंसिटी और ऑक्टेन रेटिंग के कारण आइसोब्यूटेनॉल फ्यूल ऐडिटिव्स के तौर पर भी उपयोग में लाया जाता है. डीजल में आइसोब्यूटेनॉल की ब्लेंडिंग पर अधिकतर रिसर्च ये इशारा करती हैं कि पर्यावरण के लिहाज से तो ये फायदेमंद है, मगर इंजन के लिए इसके नुकसान ज्यादा हैं. खासतौर पर पुराने डीजल इंजनों के लिए ज्यादा हानिकारक साबित हो सकता है.
डीजल फ्यूल में सीटेन नंबर (Cetane Number) एक महत्वपूर्ण मापदंड होता है, जो यह बताता है कि फ्यूल इंजन के सिलेंडर में इंजेक्ट होने के बाद कितनी जल्दी और आसानी से जलता है. सीटेन नंबर जितना अधिक होगा, डीजल उतनी ही तेजी से जलेगा, जिससे इंजन स्मूद तरीके से चलेगा, स्टार्टिंग बेहतर होगी और शोर व वाइब्रेशन भी कम होंगे. वहीं कम सीटेन नंबर वाला डीजल जलने में अधिक समय लेता है, जिससे इंजन की परफॉर्मेंस प्रभावित हो सकती है. आमतौर पर भारत में बिकने वाले डीजल का सीटेन नंबर लगभग 51 या उससे अधिक रखा जाता है, ताकि इंजन का परफॉर्मेंस और फ्यूल एफिशिएंसी बेहतर बनी रहे.
आइसोब्यूटेनॉल (Isobutanol) का सीटेन नंबर आमतौर पर 15 से 20 के बीच माना जाता है, जो डीजल के मुकाबले काफी कम है. तुलना करें तो भारत में इस्तेमाल होने वाले डीजल का सीटेन नंबर आमतौर पर 51 या उससे अधिक होता है. इसी वजह से आइसोब्यूटेनॉल को सीधे डीजल के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि सीमित मात्रा में ब्लेंडिंग के लिए देखा जाता है. हालांकि इसकी ऊर्जा घनत्व (Energy Density) इथेनॉल से अधिक होती है और यह फ्यूल के साथ बेहतर तरीके से ब्लेंड हो सकता है.
डीजल में थोड़ी कम मात्रा में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने पर इंजन के परफॉर्मेंस पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता. कुछ स्टडी में पाया गया है कि इससे धुआं (Particulate Matter) और कुछ प्रदूषक उत्सर्जन कम हो सकते हैं. हालांकि ब्लेंडिंग का अनुपात बढ़ने पर कम सीटेन नंबर के कारण इग्निशन में देरी (Ignition Delay) हो सकती है, जिससे इंजन की पावर, माइलेज और एफिशिएंसी प्रभावित हो सकती है. इसलिए डीजल में इसे मिलाने से पहले यह तय करना जरूरी होगा कि, इसकी ब्लेंडिंग की मात्रा कितनी रखी जाए.
जहां वाहन निर्माता कंपनियां फ्यूल में ब्लेंडिंग के बाद अपने वाहनों में लगातार बदलाव कर उसे बाजार में उतार देते हैं, वहीं किसान अपनी खेत की मेढ़ पर ही खड़ा रह जाता है. भारत दुनिया के सबसे बड़े ट्रैक्टर बाजारों में से एक है. डायमेंशन मार्केट रिसर्च के मुताबिक हर साल यहां तकरीबन 9 लाख से ज्यादा ट्रैक्टरों का प्रोडक्शन होता है. जिसमें एग्रीकल्चर, कंटस्ट्रक्शन, माइनिंग और लॉजिस्टिक्स मशीनें भी शामिल हैं.
किसानों के लिए लगातार नए ट्रैक्टर या खेती से जुड़ी मशीनरी को नया और अपग्रेड करना उतना आसान नहीं होता है. रिपोर्ट के अनुसार देश में तकरीबन 45 से 50 लाख ट्रैक्टर एक्टिव हैं. जिसमें सबसे ज्यादा पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के किसान इस्तेमाल करते हैं. अब इन किसानों में एक बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जिनके पास सालों पुराने ट्रैक्टर हैं. कुछ लोगों के पास कई दशक पुराने मॉडल भी मिल जाएंगे, जो पीढ़ियों से चला रहे हैं. ऐसे पुराने ट्रैक्टरों के लिए ये नई ब्लेंडिंग एक बड़ी मुसीबत बन सकती है. क्योंकि ये ट्रैक्टर नए फ्यूल और तकनीकी के लिहाज से अपडेटेड नहीं हैं, लेकिन चूकिं ये ठीक ढंग से काम करते हैं तो किसान इन्हें हटा भी नहीं सकते हैं. इसलिए सरकार को इन पुराने वाहनों को भी ध्यान में रखना होगा.