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चावुंडी दैव की कहानी क्या है, कांतारा विवाद में माफी मांगने क्यों मैसूर जाएंगे अभिनेता रणवीर सिंह?

कर्नाटक हाई कोर्ट ने कांतारा फिल्म से जुड़े मिमिक्री विवाद में अभिनेता रणवीर सिंह की बिना शर्त माफी स्वीकार कर ली है. कोर्ट ने रणवीर सिंह को अगले चार हफ्तों में मैसूर के चामुंडेश्वरी मंदिर जाने का निर्देश दिया है.

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एक्टर रणवीर सिंह से जुड़े कांतारा विवाद में उन्हें राहत मिल सकती है
एक्टर रणवीर सिंह से जुड़े कांतारा विवाद में उन्हें राहत मिल सकती है

कर्नाटक हाई कोर्ट ने ‘कांतारा मिमिक्री केस’ में एक्टर रणवीर सिंह की बिना शर्त माफी स्वीकार कर ली है. शनिवार, 25 अप्रैल को उन्होंने एफिडेविट दाखिल किया था. नए हलफनामे को देखते हुए कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि अब इस मामले को खत्म किया जा सकता है. कोर्ट ने रणवीर सिंह को अगले चार हफ्तों के अंदर मैसूर के चामुंडेश्वरी मंदिर जाने का भी निर्देश दिया है. इस तरह एक्टर रणवीर सिंह को कांतारा फिल्म से जुड़े उस विवाद राहत मिलती दिख रही है, जहां उन्होंने दैव चावुंडी की मिमिक्री की थी. 

मैसूर के चामुंडेश्वरी मंदिर से क्या है कनेक्शन?
कोर्ट ने अभिनेता रणवीर सिंह को मैसूर चामुंडेश्वरी मंदिर जाने के लिए इसलिए कहा है, क्योंकि कांतार फिल्म में दिखाई गई इस दैव परंपरा का चामुंडेश्वरी देवी से गहरा कनेक्शन है. असल में चावुंडी दैव, मैसूर की प्रसिद्ध चामुंडेश्वरी (देवी दुर्गा का उग्र रूप) का ही क्षेत्रीय रूपांतरण है. चामुंडा, चंड और मुंड नाम के असुरों का वध करने वाली देवी हैं. मैसूर की चामुंडी पहाड़ी पर स्थित मंदिर में मां चामुंडेश्वरी ने महिषासुर का वध किया था, ऐसी मान्यता है. चावुंडी दैव की परंपरा भी इसी शक्ति-उपासना से जुड़ी है, जो आदिवासी और लोक कथाओं के माध्यम से शक्ति के उग्र रूप का सम्मान करती है.

हालांकि इसमें क्षेत्रीय भिन्नता भी है, जो इन कहानियों को गहराई से पढ़ने में समझ आती है. मैसूर चामुंडेश्वरी वैदिक/पौराणिक देवी हैं, जो वाडियार राजवंश की कुलदेवी हैं. वहीं, 'चावुंडी दैव' तटीय कर्नाटक में 'भूत कोला' परंपरा के तहत पूजे जाने वाले स्थानीय दैव हैं. 'कांतारा' फिल्म में इस संबंध को दिखाया गया था, जहां दैव को देवी के रक्षक के रूप में दिखाया गया था. दोनों ही रूपों में, देवी को चामुंडी पहाड़ियों की संरक्षक और महिषासुर का विनाश करने वाली शक्ति के रूप में माना जाता है.

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एक तरह से कह सकते हैं कि मैसूर में विराजित चामुंडेश्वरी देवी का विराट स्वरूप हैं और देवी परंपरा में जैसे देवी के कई रूप और अंश होते हैं, चावुंडी उन्हीं में से एक हैं जिन्हें प्रधान देवी के ही गुण वाली एक शक्ति परंपरा का रूप में माना जाता है और उनकी पूजा की जाती है.Kantara
 

रणवीर सिंह के खिलाफ क्यों हुआ था केस?
असल में इसी साल जनवरी में अभिनेता रणवीर सिंह के खिलाफ FIR दर्ज हुई थी. आरोप था कि एक पब्लिक प्लेटफॉर्म पर उन्होंने मजाक करते हुए अजीब एक्सप्रेशन दिए और चेहरे के हाव-भाव बनाते हुए उसकी तुलना दैव परंपरा की देवी चावुंडी दैव से की. इसके बाद चावुंडी दैव को मानने वाले और श्रद्धालु इससे नाराज हो गए थे. 

कांतारा फिल्म में दिखाया गया था कि चावुंडी एक स्त्री दैव हैं और भैरव की बहन हैं. हालांकि उनका नाम चावुंडी भले ही उत्तर भारतीय शाक्त परंपरा की देवी चामुंडी से मिलता है, लेकिन एक जैसे ना और शक्ति समान होने के बाद भी चावुंडी दैव और चामुंडी देवी अलग-अलग हैं.

कर्नाटक के तुलु नाडु में 'भूत कोला' की दैवीय नृत्य परंपरा में चावुंडी दैव का नाम भी आता है. दैव चावुंडी का स्वभाव उग्र है और वह जंगल की रक्षक हैं. चावुंडी दैव सिर्फ कहानी या नृत्य परंपरा का पात्र नहीं है, बल्कि न्याय करने वाली जीवित शक्ति मानी जाती हैं. यही कारण है कि जब दैव-परंपरा को 'परफॉर्मेंस या रोल' के तौर पर देखा जाता है, तो आस्था-परंपरा को मानने वाले लोग असहज होते हैं.

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लोककथाओं में आस्था की जड़ें
चावुंडी दैव की जड़ें लोककथाओं और आस्था की कहानियों में हैं. चावुंडी अकेली नहीं हैं, बल्कि रक्षा करने वाले चार दैवों में से एक हैं. जिनमें दो गुलिगा और पंजुरली दैव हैं. तीसरी हैं चावुंडी और चौथे हैं हुली दैव. इस तरह तुलुनाडु की परंपरा में इन सभी को एक साथ 'धर्म चतुर्मुख' कहा जाता है. 

लोककथाओं में चावुंडी गुलिगा दैव की बहन हैं. उनकी कहानियां जमीन की रक्षा, विश्वासघात और न्याय से जुड़ी हुई हैं. ऐसा न्याय जो पर्यावरण को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाने वालों को दंड देकर किया जाता है. चावुंडी दैव की भूमिका दुष्टों को दंड देने वाली और सामाजिक-सांस्कृतिक संतुलन को फिर से स्थापित करने वाली शक्ति के रूप में देखी जाती है. 

माना जाता है कि जब समुदाय अपने पूर्वजों को दिए गए वादों से मुकरता है तब चावुंडी दैव हस्तक्षेप करती हैं. ये वादे जल, जंगल जमीन से ही जुड़े हुए हैं. जैसे बड़े पैमाने पर जंगल का कटना, नदियों के तटों को पाटकर उनका रास्ता बंद करना. तालाबों को सुखा देना और बेवजह जंगली जानवरों का शिकार करना. जब गुलिगा और पंजुरली दैव दंड देते हैं. लेकिन उनके दंड देने से भी संतुलन स्थापित नहीं होता है और बदले की भावना बड़ी होने लगती है, तब चावुंडी न्याय करती हैं. एक उग्र और आक्रामक न्याय...

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चामुंडी देवी और चावुंडी दैव... अंतर या समानता?

दैव चावुंडी की ये सभी खासियतें उत्तर भारतीय देवी चामुंडी से काफी मिलती-जुलती हैं, फिर भी चावुंडी दैव पूरी तरह अलग और स्थानीय आध्यात्मिक सत्ता की प्रतीक हैं. चावुंडी दैव का स्वरूप बहुत भयंकर है. उनका शरीर भस्म में लिपटा-पुता और लंबे-लंबे बाल बिखरे होते हैं. गले में खोपड़ियों की माला होती है और उनका वाहन बाघ है. तुलु संस्कृति में उनकी पूजा पारंपरिक मंदिरों में नहीं होती, बल्कि पवित्र 'भूत कोला' अनुष्ठान के जरिये ही की जाती है.

भूत कोला रात भर चलने वाला अनुष्ठान होता है, जिसमें ढोल-नगाड़े, अग्नि, संगीत, विशेष वेशभूषा और तांत्रिक नृत्य शामिल होते हैं. इस दौरान प्रशिक्षित कलाकार- जिनके बारे में माना जाता है कि उन पर दैव अवतरित होते हैं , समाधि या तंद्रा की अवस्था में दैव का रूप धारण करते हैं. इसी अवस्था में दैव समुदाय को निर्देश देते हैं, विवादों का निपटारा करते हैं और आशीर्वाद भी देते हैं. 

अलग-अलग पर एक जैसी खासियत
नामों की समानता के बावजूद चावुंडी दैव और चामुंडी माता एक ही नहीं हैं. चावुंडी दैव तुलुनाडु की रक्षक दैव आत्मा हैं. वहीं चामुंडी माता वैदिक और पौराणिक परंपरा की देवी हैं. वह देवी दुर्गा का उग्र स्वरूप मानी जाती हैं और चंड-मुंड नामक असुरों के वध के लिए प्रसिद्ध हैं. उनकी पूजा पूरे भारत में होती है, विशेष रूप से मैसूर में.

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हालांकि दोनों में उग्र स्त्री शक्ति, विनाश और खोपड़ी-मालाओं जैसे कुछ प्रतीकात्मक तत्व समान दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी आध्यात्मिक परंपराएं और सांस्कृतिक संदर्भ पूरी तरह अलग हैं. भूत कोला या 'भूत आराधने' का आयोजन बिलावा और बंट समुदायों द्वारा किया जाता है, जबकि दैव का रूप धारण करने वाले माध्यम कलाकार आमतौर पर नालिके, परावा या पंबाडा समुदायों से आते हैं.

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