6 सितंबर 1965. पाकिस्तान को लगा अरब के उसके देश उसके साथ उतरेंगे. भारत के खिलाफ जंग में मदद देंगे. भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पश्चिमी पाकिस्तान में मोर्चा खोल दिया था. लाहौर के आसपास गोलियां चल रही थीं, टैंक आगे बढ़ रहे थे और पाकिस्तान के सामने अब कश्मीर तक सीमित संघर्ष नहीं, एक बड़ा युद्ध खड़ा था. इस वक्त इस्लामाबाद को अपने पुराने दोस्तों की याद आई.
लेकिन पाकिस्तान का भ्रम बहुत बुरी तरह से टूटा.
आइए थोड़ा पीछे चलते हैं. पाकिस्तान के भ्रम टूटने की कहानी का बैकग्राउंड समझते हैं.
1950 का दशक था. दुनिया दो खेमों में बंट चुकी थी. एक तरफ अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी थे, तो दूसरी तरफ सोवियत संघ. शीत युद्ध अपने चरम पर था. अमेरिका को डर था कि सोवियत प्रभाव मध्य-पूर्व तक पहुंच गया तो तेल से लेकर यूरोप की सुरक्षा तक सब कुछ खतरे में पड़ सकता है.
इसी डर से एक ऐसा सुरक्षा घेरा बनाने की कोशिश हुई, जो मध्य-पूर्व को सोवियत संघ से दूर रख सके. 1955 में इराक, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और ब्रिटेन ने मिलकर बगदाद पैक्ट बनाया.
इस संगठन का नाम बगदाद इसलिए पड़ा क्योंकि इसका मुख्यालय इराक की राजधानी में था.
अमेरिका इसमें औपचारिक सदस्य नहीं बना, लेकिन उसने इस गठबंधन को मजबूत समर्थन दिया और बाद में इसके साथ रक्षा संबंधी समझौते किए. 1959 में इराक के हटने के बाद इसका नाम बदलकर CENTO यानी Central Treaty Organization कर दिया गया.
पाकिस्तान का मकसद दूसरा था
जाहिर है पाकिस्तान को तब सोवियत रूस से कोई खतरा नहीं था. वो खुद तो अमेरिका की गोद में बैठा ही था.
हिन्दुस्तान के साथ हद तक बराबरी करने की आग में जल रहे पाकिस्तान का असल टारगेट नई दिल्ली था.
इन समझौते के बहाने पाकिस्तान ने पश्चिमी देशों के साथ सैन्य रिश्ते मजबूत किए. उसे अमेरिकी हथियार मिले, मिलिट्री ट्रेनिंग और सुरक्षा सहयोग बढ़ा. पाकिस्तान ने SEATO में भी सदस्यता ली. इससे पाकिस्तान की सेना तेजी से आधुनिक हुई. पाकिस्तान सोचने लगा कि इस पूरी सैन्य ताकत का
फायदा उठाकर वो भारत पर हावी होने की कोशिश करेगा. अमेरिकी अपनी कूटनीति के तहत पाकिस्तान को गाहे-बगाहे उकसाता और उसे मदद भी देता. ये वो दौर था जब भारत सोवियत रूस के कैंप में था. पाकिस्तान को झूठा आत्मविश्वास होने लगा.
लेकिन इस पूरी व्यवस्था में एक बुनियादी गलतफहमी पैदा हो गई. पाकिस्तान ने अमेरिकी हथियारों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली ताकत समझ लिया, जबकि अमेरिका पाकिस्तान को मुख्य रूप से कम्युनिस्ट खतरे के खिलाफ तैयार कर रहा था. अमेरिका पाकिस्तान में अपना स्टेशन तैयार कर रहा था. वह सोवियत रूस और चीन पर नजर रखना था.
यानी पाकिस्तान की दोस्ती तुर्की, ईरान, जैसे देशों से तो थी लेकिन दोस्ती की वजह अलग-अलग थी.
1965 का जंग आया, पाकिस्तान का दोस्ती का बुखार उतर गया
पाकिस्तान भारत के खिलाफ जंग में कूद चुका था. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि सहयोगी मदद करेंगे. लेकिन CENTO के सदस्यों ने मुंह फेर लिया.
अमेरिका ने दोनों तरफ हथियार बंद कर दिए. तुर्की और ईरान ने नैतिक समर्थन तो दिया, लेकिन सैन्य मदद नहीं. इस जंग में पाकिस्तान की बुरी तरह 'मरम्मत' हुई. पाकिस्तान का जिन अरब और अमेरिकी दोस्तों पर कूद रहा था उन्होंने उन्हें कुछ नहीं दिया. पाकिस्तान का दोस्ती का बुखार उतर चुका था.
दरअसल पाकिस्तान ने जिस चीज को अपनी सुरक्षा गारंटी समझ लिया था, अमेरिका ने उसे शीत युद्ध की रणनीति का हिस्सा माना था.
1965 की जंग ने यह अंतर बिल्कुल साफ कर दिया.
6 साल बाद फिर जंग और टूट गया पाकिस्तान
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध पाकिस्तान के लिए और भी बड़ा सबक बन गया. पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में विद्रोह के साथ भारत-पाकिस्तान के बीच के बीच जंग छिड़ गई. पाकिस्तान ने CENTO सहयोगियों से मदद की अपील की. अमेरिका ने सातवें बेड़े का जहाज यूएसएस एंटरप्राइज बंगाल की खाड़ी में भेजा, जो दबाव बनाने की कोशिश थी, लेकिन कोई सैन्य हस्तक्षेप नहीं हुआ.
सोवियत रूस ने शक्ति संतुलन करते हुए अपना बेड़ा भारत की ओर से भेज दिया.
ब्रिटेन भी सक्रिय मदद से दूर रहा. तुर्की और ईरान ने राजनयिक समर्थन और कुछ सीमित सहायता दी, लेकिन कोई सैनिक टुकड़ी या बड़े पैमाने पर हथियार नहीं भेजे. नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान फिर पीटा और दुनिया के राजनीतिक मानचित्र पर एक नए देश का जन्म हुआ. 16 दिसंबर 1971 को ढाका में आत्मसमर्पण हो गया और बांग्लादेश बन गया। पाकिस्तान फिर से मुंह ताकता रह गया.
पाक को मदद क्यों नहीं मिली?
तुर्की NATO का सदस्य था और यूरोप की तरफ देखता था. ईरान अपनी सुरक्षा सोचता था. ब्रिटेन और अमेरिका भारत के साथ भी संबंध रखना चाहते थे और सोवियत संघ को सीधे टकराव से बचना चाहते थे.
इसके अलावा इंदिरा गांधी के लीडरशिप वाले भारत के सामने कोई भी देश इतनी आसानी से टकराने की हिमाकत नहीं कर सकता था.
आखिरकार 4 वर्ष बाद ईरान की क्रांति के बाद वहां के शाह की सत्ता चली गई और मार्च 1979 में ईरान और पाकिस्तान ने CENTO छोड़ दिया. 16 मार्च 1979 को इसे औपचारिक रूप से भंग घोषित कर दिया गया. इस तरह बगदाद पैक्ट (बाद में CENTO) करीब 24 साल चला और 1979 में समाप्त हो गया.
इस्लामिक NATO का शिगुफा
अब पाकिस्तान बगदाद पैक्ट जैसे ही एक समझौते का ढोल पीट रहा है. 7 अगस्त 2026 को मक्का में तीनों देशों ने Mecca Joint Defence Agreement पर हस्ताक्षर किए. समझौते के मुताबिक किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा. यह NATO के Article 5 की तर्ज पर है, इसलिए इसे 'इस्लामिक नाटो' कहा जा रहा है. इस समझौते में पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब और तुर्की शामिल हैं.
इसे 'इस्लामिक नाटो' नाम किसी एक सरकार ने आधिकारिक तौर पर नहीं दिया है. लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ इसे इस्लामिक नाटो कह रहे हैं.
इस समझौते रणनीतिक अहमियत इसलिए भी है क्योंकि सऊदी अरब के पास पैसा और ऊर्जा, तुर्की के पास बड़ी नाटो प्रशिक्षित सेना और रक्षा उद्योग, जबकि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार और बड़ा सैन्य बल है. इसलिए इसे पश्चिमी सुरक्षा व्यवस्था पर निर्भरता कम करने और क्षेत्र में ईरान और इजरायल के प्रभाव का संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है.
लेकिन बगदाद पैक्ट की तरह मक्का एग्रीमेंट की ढाल लेकर पाकिस्तान भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा हैे.
7 अगस्त को मक्का में हुए समझौते में तय हुआ कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा.
पाकिस्तान के लिए इसका महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि तुर्की NATO का सदस्य और मजबूत सैन्य शक्ति है, जबकि सऊदी अरब आर्थिक और कूटनीतिक ताकत रखता है. पाकिस्तान इस त्रिकोण को अपनी रणनीतिक हैसियत बढ़ाने और भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए पेश कर सकता है.
पन्ना लाल