नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ और मडस्लाइड में चीन वही रवैया अपना रहा है, जो कोरोना काल में अपनाया था. 2020 में वुहान से शुरू हुई महामारी के शुरुआती दिनों में जब स्थानीय डॉक्टर और नागरिक सच बताने की कोशिश कर रहे थे, तब अधिकारियों ने उन्हें ‘अफवाह फैलाने’ का आरोप लगाकर चुप करा दिया था. अब भी तिब्बत के गिरोंग पोर्ट की भयावह तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया से तेजी से हटाए जा रहे हैं. स्थानीय लोगों द्वारा साझा किए गए क्लिप्स गायब हो रहे हैं, जबकि सरकारी मीडिया सिर्फ बचाव अभियान की आधिकारिक तस्वीरें दिखा रही है.
दरअसल अपने इमेज को लेकर चीन इतना सतर्क है कि आपदा की तस्वीरें, वीडियो भी बाहर नहीं आने दे रहा है. चीन की ओर से अगर कोई ऐसा करना चाहता है तो उस पर चीन की साइबर सिक्योरिटी टीम कार्रवाई कर रही है.
चीन की साइबर सुरक्षा पुलिस ने दक्षिण-पश्चिम चीन के तिब्बत में गिरोंग पार्ट पर आए लैंड स्लाइड से जुड़ी कथित अफवाहों के मामले में 10 मामलों को खुलासा करने का दावा किया है. चीन के अधिकारियों का दावा है कि कुछ लोग आपदा के बारे में गलत जानकारी फैला रहे हैं और हताहतों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे हैं और जनता को गुमराह कर रहे हैं.
चीन ने ऐसे मामलों में 10 लोगों के खिलाफ एक्शन लिया है.
चीन में स्थिति ऐसी है कि अगर कोई व्यक्ति मरने वालों की संख्या डालता है और ये डाटा सरकारी आंकड़ों से मैच नहीं करता है तो उस पर चीन की एजेंसियां एक्शन कर रही हैं और ऐसे शख्स को जेल भेज रही हैं. जुर्माना लगा रही हैं.
चीनी कानून के अनुसार, आपदा से जुड़ी जानबूझकर अफवाह फैलाने पर 10 दिन तक हिरासत और 1000 युआन तक जुर्माना हो सकता है। गंभीर मामलों में 3-7 साल की जेल भी संभव है.
एक मामले में साइबर सुरक्षा पुलिस ने पाया कि 'क्यू'नाम के एक इंटरनेट यूज़र ने बिना किसी सबूत के अंदाज़ा लगाया और एक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर अफ़वाह फैलाई कि "ख़बरों में कहा गया है कि 1,400 लोग मारे गए, लेकिन असल में 3,000 लोग पहले ही लापता हो चुके थे." इसके बाद स्थानीय पुलिस ने 'क्यू' पर प्रशासनिक जुर्माना लगाया.
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हालांकि ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, लेकिन इमेज को लेकर सतर्क चीन ऐसी सूचनाओं बर्दाश्त नहीं करता है.
एक और ऐसे ही मामले में 'लिऊ' (Liu) नाम के एक इंटरनेट यूज़र ने पोस्ट किया कि "चीनी पक्ष की तरफ़ 3,000 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है."
चीन का कहना है कि ये बयान झूठा है. इसके लिए चीन ने लिऊ जुर्माना लगाया है.
बता दें कि चीन ने इस हादसे में मृतकों का आंकड़ा मात्र 16 बताया है. इतने बड़े हादसे में निश्चित रूप से ये संख्या अव्यावहारिक लगती है.
चीन का कहना है कि 'झांग' नाम के एक इंटरनेट यूज़र ने पोस्ट किया कि "1,000 से ज़्यादा लोग बह गए. झांग ने आगे दावा किया कि उस जगह पर सैकड़ों मज़दूर और कंस्ट्रक्शन वर्कर थे, साथ ही पर्यटक और बॉर्डर पार करने वाले लोग भी थे और प्रभावित लोगों की असल संख्या 1,000 से ज़्यादा रही होगी. चाइनीज पुलिस ने इस जानकारी को झूठा बताया और झांग पर एक्शन लिया.
चीन के डर की वजह क्या है?
दरअसल चीन का सारा सिस्टम गोपनीयता और डर के साये में चलता है. इसके अलावा तिब्बत का मुद्दा चीन के लिए काफी संवेदनशील है. तिब्बत 1950 के दशक से चीन के नियंत्रण में है. वहां कोई भी घटना यहां तक कि प्राकृतिक आपदा भी राजनीतिक मानी जाती है.
क्योंकि इससे चीन की नीतियों, चीन के विकास कार्यक्रम पर सवाल खड़े होते हैं. इससे जुड़े पर्यावरण के सवाल खड़े होते हैं. अगर वहां की तस्वीरें, वहां की आवाजें बाहर आती है तो तिब्बत का पक्ष बाहर आता है. लेकिन चीन की सरकार ऐसा नहीं चाहती है. चीन के कब्जे में रह रहे तिब्बत में अभिव्यक्ति की आजादी का कोई सिस्टम नहीं है.
इस आपदा को भी चीन नैरेटिव कंट्रोल से जोड़कर देख रहा है. चीन जोर देता है कि आपदा नेपाल की तरफ शुरू हुई. चीन तिब्बत के हिमालयी क्षेत्रों में बन रहे बांधों पर कोई ऑडिट नहीं चाहता है, और चेतावनी न देने को 'फेक न्यूज' कहकर खारिज करता है.
चीन को लगता है कि वास्तविक नुकसान का पैमाना बाहर आने से पार्टी की छवि प्रभावित हो सकती है. सूचना नियंत्रण से परिवारों को भी रिश्तेदारों की खबर लगनी मुश्किल होती है.
चीन में संवेदनशील विषयों जैसे तिब्बत, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग में सेंसरशिप आम है. और यहां आपदा में भी आधिकारिक आंकड़ों और कथा से अलग कुछ नहीं चलता.
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