नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने कई परिवारों को गम और तकलीफ के अथाह सागर में धकेल दिया है. सिसकती आंखें और अपनों को खोने का गम... दर्दनाक तस्वीरें हर किसी को झकझोर रही हैं. 600 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. 2500 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं. इनमें कई की बचने की उम्मीद कम ही है.
इसके बावजूद अपनों को इंतजार गमगीन आंखें कर रही है. शायद कोई चमत्कर हो जाए. कहीं से कोई कॉल और फिर उनकी आवाज... ये उम्मीद अभी भी बाकी है. तबाही के मंजर में अपनों की तलाश जारी है.
नेपाल की राजधानी काठमांडू के अस्पतालों में बड़ी संख्या में लोग अपने परिजनों की तलाश में पहुंच रहे हैं. उम्मीद है कि उनका अपना जिंदा होगा, तो कोई अपने रिश्तेदार की लाश मिलने का इंतजार कर रहा है.
काठमांडू के इस अस्पताल में इन दिनों इलाज के लिए आए मरीजों से ज्यादा बेचैनी उन लोगों में है, जो अपनों को तलाश में यहां पहुंच रहे हैं.
अस्पताल परिसर में घायलों और मृतकों की लिस्ट लगी है. लोग बार-बार इस सूची को देख रहे हैं. नाम दिखाई देता है तो उम्मीद बंधती है... और नाम नहीं मिलता तो तलाश का अगला रास्ता उन्हें पुलिस हेल्प डेस्क तक ले जाता है.
जिनके परिजनों का नाम घायलों की लिस्ट में नहीं है, उन्हें पुलिस हेल्प डेस्क पर अपना नाम और लापता परिजन की जानकारी दर्ज कराने के लिए कहा जा रहा है.
लेकिन यहां भी तलाश खत्म नहीं होती. घायलों की लिस्ट में नाम नहीं मिलने के बाद लोगों को शवगृह की तरफ भेजा जा रहा है.
एक तरफ लोग इस उम्मीद के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं कि शायद उनके अपने का इलाज चल रहा हो. शायद उनकी सांसें चल रही हों. जब घायल लोगों की लिस्ट में नाम नहीं मिलता, तो उम्मीद और डर के बीच खड़े इन लोगों के कदम शवगृह की तरफ बढ़ जाते हैं.
शवगृह के बाहर मृतकों की तस्वीरें लगाई गई हैं. परिजन एक-एक तस्वीर को गौर से देखते हैं. चेहरों को पहचानने की कोशिश करते हैं.
हर तस्वीर के साथ दिल में एक डर है. कहीं यह वही चेहरा तो नहीं, जिसे वे कई दिनों से तलाश रहे हैं. और हर तस्वीर के बीच एक उम्मीद भी है, शायद उनका अपना यहां न हो.
किसी के हाथ में अपने परिजन की तस्वीर है, तो किसी के पास सिर्फ एक नाम और पहचान की कुछ जानकारी.
बाढ़ ने परिवारों को बिखेर दिया है. और अब अस्पतालों की ये सूचियां और तस्वीरें उनके लिए अपनों तक पहुंचने का आखिरी जरिया बनी हुई हैं.
इन अस्पतालों में सिर्फ इलाज नहीं चल रहा. यहां उम्मीद और डर के बीच एक ऐसी तलाश चल रही है, जिसका अंत हर परिवार अपने तरीके से चाहता है.
किसी को अपने परिजन के जिंदा होने की खबर चाहिए. किसी को उनकी सांसों का यकीन और किसी को कम से कम अपने रिश्तेदार का अंतिम दर्शन.
ऐसे में बाढ़ की इस त्रासदी में राहत और बचाव के साथ-साथ लापता लोगों की पहचान और उनके परिजनों को जानकारी देना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गई है.
पंकज दास