नेपाल और चीन के बीच अहम ग्यिरोंग लैंड पोर्ट भीषण बाढ़ में तबाह हो गया है. करीब 1,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस बॉर्डर पोस्ट पर अब पहचानने लायक कुछ नहीं बचा है. सड़कें और पुल मिट्टी और मलबे के नीचे दब गए हैं. मौके पर पहुंचे चीनी रेस्क्यू वर्कर्स ने बताया कि चारों तरफ सिर्फ खंडहर नजर आ रहे थे. इस तबाही से नेपाल-चीन के बीच अहम जमीनी व्यापार मार्ग बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
ग्यिरोंग की तबाही का असर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है. इससे 2016 में प्रस्तावित चीन-नेपाल BRI रेलवे प्रोजेक्ट पर भी सवाल खड़े हो गए हैं. यह रेलवे तिब्बत के शिगात्से से ग्यिरोंग होते हुए नेपाल के रसुवा और फिर काठमांडू तक प्रस्तावित है. नेपाल वाला हिस्सा करीब 72 किलोमीटर का है, लेकिन 2018 की प्री-फिजिबिलिटी स्टडी के मुताबिक करीब 98.5 फीसदी हिस्सा सुरंगों या पुलों से होकर गुजरना था.
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बाढ़ ने दिखाए हिमालयी इंफ्रास्ट्रक्चर के खतरे
26 अगस्त को नेपाल के उत्तरी लांगटांग इलाके में ग्लेशियर की बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के टूटने से पानी, मलबा और मिट्टी ल्हेंदे खोला, भोटेकोशी और त्रिशूली नदी सिस्टम में बह निकले. इससे नेपाल के कई इलाके, सड़कें, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट तबाह हुए और बाढ़ ग्यिरोंग पोर्ट तक पहुंच गई.
इस आपदा में नेपाल में कमोबेश 1350 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हैं. नेपाल के वित्त मंत्री के मुताबिक शुरुआती आर्थिक नुकसान देश की अर्थव्यवस्था के करीब 10 फीसदी तक आंका गया है.
ग्यिरोंग 2014 में अंतरराष्ट्रीय उपयोग के लिए खोला गया था. 2015 के नेपाल भूकंप के बाद झांगमु-कोदारी मार्ग को नुकसान पहुंचने से इसका महत्व और बढ़ा. 2024 तक यह चीन-नेपाल व्यापार के करीब 30 फीसदी हिस्से को संभाल रहा था. कैलाश मानसरोवर जाने वाले भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए भी यह अहम रास्ता था.
2016 से कागजों में अटका है रेल प्रोजेक्ट
चीन ने 2016 में ग्यिरोंग के रास्ते काठमांडू तक रेलवे का प्लान रखा था. 2018 में इसे BRI के ट्रांस-हिमालयन मल्टी-डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क में शामिल किया गया. लेकिन अब तक इसका निर्माण शुरू नहीं हुआ है. रूट, लागत और निर्माण के लिए फाइनेंसिंग भी अंतिम रूप से तय नहीं हुई है.
नेपाल वाले हिस्से की अनुमानित लागत 2.75 अरब डॉलर थी, जबकि पुराने अनुमान में पूरे ग्यिरोंग-काठमांडू प्रोजेक्ट की लागत 5.5 अरब डॉलर तक बताई गई थी. चीन की ओर से स्टडी के लिए मदद दी गई और 2022 में विस्तृत फिजिबिलिटी स्टडी शुरू हुई. 2026 की शुरुआत तक चीनी टीमें फील्ड जांच पूरी कर रिपोर्ट तैयार कर रही थीं.
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बाढ़ के बाद विशेषज्ञ अब इस प्रोजेक्ट के पर्यावरणीय जोखिमों के दोबारा आकलन की मांग कर रहे हैं. नेपाल के प्रोफेसर बालमुकुंद रेग्मी ने हाई-रिस्क ग्लेशियल लेक्स के लिए ऑटोमेटेड रियल-टाइम वॉर्निंग सिस्टम की जरूरत बताई. चीन के शोधकर्ता चेंग फेई ने रेलवे की फिजिबिलिटी स्टडी में क्रॉस-बॉर्डर हाइड्रोलॉजिकल असेसमेंट शामिल करने की बात कही है.
इस आपदा ने यह सवाल भी सामने रखा है कि नाजुक हिमालयी इलाके में सुरंगों, पुलों और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर वाले प्रोजेक्ट को कितना सुरक्षित तरीके से बनाया जा सकता है. ऊपरी हिमालय में होने वाली ऐसी घटनाओं का असर नेपाल के अलावा भारत के निचले इलाकों तक भी पहुंच सकता है.
सुशीम मुकुल