अली खामेनेई के जनाजे में ईरान पहुंचे भगवाधारी संत, जानें आखिर कौन हैं

अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ पहुंचे भगवाधारी संत स्वामी सारंग मोहिले सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं. जानिए कौन हैं स्वामी सारंग, जिन्हें ईरान ने विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया.

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आमंत्रण पर तेहरान पहुंचे हैं स्वामी सारंग. (Photo- Screengrab) आमंत्रण पर तेहरान पहुंचे हैं स्वामी सारंग. (Photo- Screengrab)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 2:31 PM IST

ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाजे में एक तस्वीर ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा. तेहरान में लाखों लोगों की भीड़ के बीच भगवा वस्त्र पहने एक भारतीय संत नजर आए. सोशल मीडिया पर यह तस्वीर तेजी से वायरल हुई और लोग जानना चाहते थे कि आखिर यह भगवाधारी संत कौन हैं.

ये संत हैं स्वामी सारंग मोहिले. उन्हें लोग स्वामी सारंग भी कहते हैं. वे कुछ भारतीय नेताओं के साथ प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में तेहरान पहुंचे हैं. उनके साथ पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और अन्य भारतीय प्रतिनिधि भी मौजूद हैं.

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स्वामी सारंग मोहिले का जन्म 7 मई 1973 को उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर से जुड़े एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वे सामाजिक-आध्यात्मिक थिंकर, स्पीकर और स्वामी सारंग ग्लोबल पीस फाउंडेशन के संस्थापक हैं. उनकी संस्था विश्व शांति और मानवता के मुद्दों पर काम करती है.

स्वामी सारंग की पहचान सिर्फ एक हिंदू संत के रूप में नहीं है. वे लंबे समय से विभिन्न धर्मों के बीच संवाद और सद्भाव बढ़ाने की कोशिशों में जुटे रहे हैं. वे लखनऊ के मुहर्रम जुलूस में भी शामिल हो चुके हैं और इमाम हुसैन की शहादत को सत्य, न्याय और साहस का प्रतीक बताते रहे हैं. उनका मानना है कि "शक्ति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति विजय में नहीं, बल्कि सत्य पर अडिग रहने में होती है."

तेहरान रवाना होने से पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर दो भावुक संदेश भी साझा किए. पहले संदेश में उन्होंने लिखा कि ईरान का निमंत्रण उनके लिए व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि भारत की उस सनातन परंपरा का सम्मान है जो संवाद, सह-अस्तित्व और मानवता को सर्वोच्च मानती है. उन्होंने कहा कि वे भारत और ईरान जैसी दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच सद्भाव और शांति का एक विनम्र सेतु बनना चाहते हैं.

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दूसरे संदेश में उन्होंने लिखा, "कुछ विदाइयां सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं होतीं, वे एक युग की नीरवता बन जाती हैं. मैं तेहरान श्रद्धांजलि देने नहीं, बल्कि उस मौन को प्रणाम करने जा रहा हूं, जहां एक महान आत्मा की स्मृति आज भी जीवित है."

तेहरान पहुंचने के बाद स्वामी सारंग मोहिले ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ अयातुल्ला खामेनेई को श्रद्धांजलि अर्पित की और शोकाकुल ईरानी जनता के प्रति संवेदना व्यक्त की. बताया गया कि उन्हें ईरान सरकार ने विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था.

स्वामी सारंग की यह यात्रा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने इसे किसी राजनीतिक कार्यक्रम की बजाय मानवता, अंतरधार्मिक संवाद और शांति का संदेश बताया. वर्षों से वे हिंदू, मुस्लिम, जैन और अन्य धार्मिक समुदायों के बीच संवाद को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों में सक्रिय रहे हैं. यही वजह है कि तेहरान में उनकी मौजूदगी को दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रिश्तों का प्रतीक माना जा रहा है.

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