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अजरबैजान के लिए अर्मीनिया से जंग लड़ने के लिए क्यों उतावला है टर्की, क्या लगा है दांव पर?

aajtak.in
  • 09 अक्टूबर 2020,
  • अपडेटेड 6:04 PM IST
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आर्मीनिया और अजरबैजान की जंग में अब तक 150 से ज्यादा नागरिकों की जान जा चुकी है. अजरबैजान में स्थित नागोर्नो-काराबाख में आर्मीनिया के कब्जे वाले इलाके को लेकर दोनों देशों में संघर्ष छिड़ा हुआ है. नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र आधिकारिक तौर पर अजरबैजान का हिस्सा है, लेकिन यहां की आबादी आर्मीनियाई बहुल है. आर्मीनिया ईसाई बहुल है, जबकि अजरबैजान मुस्लिम बहुल है. रूस और नाटो संगठन के सदस्य देश आर्मीनिया-अजरबैजान से संघर्षविराम की अपील कर रहे हैं लेकिन टर्की खुलकर अजरबैजान का साथ देने की बात कर रहा है.

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टर्की ने अपने दोस्त अजरबैजान को जंग के मैदान पर या बातचीत की मेज दोनों पर समर्थन देने की बात कही है. टर्की ने कहा है कि वो अजरबैजान की संप्रुभता का सम्मान करता है और वो तभी किसी शांति समझौते का समर्थन करेगा जब आर्मीनिया उसके इलाके से कब्जा छोड़ देगा. हालांकि, टर्की की सरकार ने अर्मीनिया के इस दावे को खारिज किया है कि वो अजरबैजान की सेना की मदद के लिए सीरियाई फाइटर्स और एफ-16 फाइटर जेट भेज रहा है. आर्मीनिया की सरकार ने ये भी आरोप लगाया है कि टर्की ही इस जंग की आग में घी डालने का काम कर रहा है.

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पिछले कई दिनों से चल रहे इस संघर्ष के बीच सवाल उठ रहे हैं कि आखिर अजरबैजान को टर्की क्यों सपोर्ट कर रहा है, इस संघर्ष में वो क्यों हिस्सा ले रहा है और उसकी मंशा क्या है? 
 

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टर्की और अजरबैजान के बीच गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं. यहां तक कि टर्की और अजरबैजान अपने रिश्ते को "दो राज्य, एक राष्ट्र" से परिभाषित करते हैं. अजरबैजान में भी तुर्क हैं और दोनों के बीच जातीय और भाषीय समानता बहुत ज्यादा है. इसके अलावा, टर्की पहला ऐसा देश था जिसने सोवियत के पतन के बाद 1991 में स्वतंत्र अजरबैजान को मान्यता दी थी. तेल से समृद्ध अजरबैजान टर्की के लिए ऊर्जा संसाधनों के नजरिए से भी काफी अहमियत रखता है. टर्की में अजरबैजान का काफी निवेश भी है.

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दूसरी तरफ, टर्की के आर्मीनिया के साथ कूटनीतिक रिश्ते नहीं है. साल 1993 में नागोर्नो-काराबाख में अजरबैजान के साथ एकजुटता दिखाने के लिए उसने आर्मीनिया के साथ अपनी सीमाएं बंद कर दी थीं. आर्मीनिया और टर्की के संबंध पहले से ही अच्छे नहीं थे. एक शताब्दी पहले, ऑटोमन साम्राज्य ने आर्मीनिया में भयंकर नरसंहार किया. इस नरसंहार को 20वीं सदी का पहला नरसंहार भी कहा जाता है. हालांकि, टर्की नरसंहार के आरोप को खारिज करता है. टर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दवान ऑटोमन साम्राज्य को टर्की का गौरवशाली इतिहास बताते रहे हैं.

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साल 2009 में टर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दवान ने आर्मीनिया के साथ शांति वार्ता से कदम पीछे खींच लिए थे. एर्दवान ने नागोर्नो-काराबाख से अर्मीनिया के कब्जा छोड़ने की शर्त पर उसके साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए थे. आर्मीनिया के साथ टर्की की शांति वार्ता की कोशिशों से अजरबैजान नाराज था.

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टर्की की सेना दशकों से अजरबैजान के अधिकारियों को प्रशिक्षण देती रही है. अगस्त महीने में, टर्की की सेना ने अजरबैजान में बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास आयोजित किया. रूस और इजरायल के बाद, टर्की अजरबैजान का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश है. जर्मन मार्शल फंड के अंकारा डायरेक्टर ओजगुर उनलुहिसार्किली के मुताबिक, टर्की ने अजरबैजान को ड्रोन्स और रॉकेट लॉन्चर भी बेचे. उनका कहना है कि टर्की ने मौजूदा जंग में भी अजरबैजान की मदद के लिए सैन्य ड्रोन ऑपरेटर्स भेजे हैं.

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टर्की ने लगातार दोहराया है कि अगर जरूरत पड़ती है तो वो अजरबैजान की मदद के लिए आगे आएगा. हालांकि, अभी तक इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि टर्की इस संघर्ष में सक्रिय रूप से लिप्त है. टर्की ने कहा है कि अजरबैजान टर्की की मदद के बिना लड़ाई लड़ने में सक्षम है.

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टर्की की सरकार ने अजरबैजान की मदद के लिए सीरियन फाइटर्स को भेजने की बात को भी खारिज किया है. हालांकि, सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स के दावे के मुताबिक, 850 सीरियाई लड़ाकू अजरबैजान पहुंचे हैं. टर्की ने आर्मीनिया के उस दावे को भी प्रोपेगैंडा कहकर खारिज किया है कि टर्की के एफ-16 फाइटर जेट ने अर्मीनिया के सुखोई-25  को मार गिराया है. विश्लेषक ओजगुर के मुताबिक, इस संघर्ष में टर्की की भूमिका वास्तविक ना होकर सांकेतिक ज्यादा है.

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रूस का रुख क्या है?

आर्मीनिया और रूस की सीमाएं तो नहीं लगती हैं लेकिन आर्मीनिया रूस का करीबी दोस्त है. काला सागर और कैस्पियन सागर के बीच कॉकेशस इलाके में आर्मीनिया रूस की सैन्य साझेदारी भी है. इस इलाके में रूस का एक बड़ा सैन्य बेस है. नागोर्नो-काराबख के पश्चिम से 200 किमी दूर और टर्की की सीमा से सिर्फ 10 किमी दूर ग्युमरी में रूस के इस सैन्य बेस में करीब 3000 सैनिक हैं.

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आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशहिनियन ने इस सैन्य बेस को टर्की हमले के खिलाफ सबसे बड़ी दीवार बताया है. आर्मीनिया और रूस कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन के सदस्य हैं. ये सोवियत का हिस्सा रहे देशों का सैन्य गठबंधन है जिसमें अजरबैजान शामिल नहीं है. इस बात की प्रबल संभावना है कि जंग बढ़ने पर आर्मीनिया इस सैन्य गठबंधन की भी मदद मांग सकता है. हालांकि, आर्मीनिया के प्रधानमंत्री ने पिछले सप्ताह कहा कि अभी उन्हें रूस की सेना की मदद मांगने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है.

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टर्की क्यों भिड़ा हुआ है?

विश्लेषकों का कहना है कि टर्की के अजरबैजान-अर्मीनिया संघर्ष में शामिल होने के पीछे उसकी क्षेत्रीय और वैश्विक महत्वाकांक्षाएं हैं. एर्दवान ने अजरबैजान के लिए अपने समर्थन को लेकर खुद कहा है कि ये वैश्विक व्यवस्था में टर्की को उचित जगह दिलाने की मुहिम का हिस्सा है. टर्की ने सीरिया में कुर्दिश लड़ाकुओं के खिलाफ अपनी सैन्य ताकत दिखाई है, लीबिया में त्रिपोली की सरकार के साथ खड़े होकर समुद्री सीमा समझौते की सुरक्षा सुनिश्चित की है और पूर्वी-भूमध्यसागर इलाके में ग्रीस के साथ विवादित जलक्षेत्र में तेल-गैस भंडारों की खोज के लिए युद्धपोतों के साथ जहाज भेजे हैं.
 

मार्शल फंड के डायरेक्टर ने कहा, जहां कहीं भी कोई समस्या दिखाई देती है, टर्की तुरंत उस समस्या का सैन्यकरण करने में जुट जाता है. हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि संघर्ष में रूस की एंट्री की आशंका से अजरबैजान बेहद सतर्कता के साथ कदम आगे बढ़ाएगा और इस संघर्ष में किसी भी टर्की के हमले को सीमित रखेगा.

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टर्की के राष्ट्रपति एर्दवान के लिए अजरबैजान के लिए मजबूती से खड़े होना उनकी रणनीतिक प्राथमिकता है और दुनिया के सामने अपनी सैन्य ताकत दिखाकर वो अपने देश के भीतर भी समर्थन हासिल करना चाहते हैं. कोरोना वायरस की महामारी और आर्थिक संकट के बीच एर्दवान की सरकार को इससे फायदा मिल भी रहा है. एर्दवान इस्लामिक दुनिया में भी नेतृत्व की भूमिका में आना चाहते हैं. कश्मीर, फिलीस्तीन समेत कई मुद्दों पर वह सबसे ज्यादा आक्रामक रहे हैं. 
 

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फ्रांस, अमेरिका और रूस कई दशकों से अंतराष्ट्रीय विवादों में मध्यस्थता की कोशिश करते रहे हैं लेकिन उन्हें बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ. अजरबैजान का आधिकारिक रूप से हिस्सा होते हुए भी अर्मीनियन ने नागोर्नो-काराबाख पर कब्जा कर रखा है. अब एर्दवान कह रहे हैं कि तीन दशकों से अमेरिका, फ्रांस और रूस ने इस संकट की अनदेखी की और अब उन्हें शांति की पहल करने का कोई अधिकार नहीं है.
 

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इस संघर्ष से टर्की को आर्थिक लाभ भी मिल सकता है. जातीय-भाषीय समानताओं के बावजूद दोनों देशों के आर्थिक साझेदारी तुलनात्मक रूप से उतनी मजबूत नहीं है. टर्की का अजरबैजान को निर्यात उसके कुल निर्यात का सिर्फ 1.3 फीसदी ही है. टर्की की अजरबैजान से ऊर्जा खरीद भी निम्न स्तर पर ही है क्योंकि रूस और ईरान के साथ अजरबैजान के दीर्घ अवधि के समझौते हैं. टर्की का अजरबैजान से आयात पिछले साल सिर्फ 411 मिलियन डॉलर तक ही सीमित था. जबकि निर्यात भी 1.8 अरब डॉलर का हुआ. इसके विपरीत, अजरबैजान का टर्की में प्रत्यक्ष निवेश साल 2019 में 6 अरब डॉलर था जो देश के कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का 4 फीसदी है. 

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टर्की अजरबैजान-अर्मीनिया के संघर्ष को एक मौके के तौर पर देख रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि टर्की अजरबैजान पर रूस और ईरान का प्रभाव कम करके उस पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है. इस संघर्ष में आक्रामक रुख से टर्की एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश कर रहा है.
 

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