नॉर्वे में Driving Licence लेना क्यों है इतना मुश्किल? भारतीय ने बताया पूरा अनुभव

विनोद ने अपने अनुभव से बताया कि नॉर्वे में ड्राइविंग टेस्ट का मकसद सिर्फ यह देखना नहीं है कि कोई व्यक्ति कार चला सकता है या नहीं. असली मकसद यह सुनिश्चित करना है कि वह सड़क पर दूसरे लोगों की जिंदगी को भी सुरक्षित रख सके.

Advertisement
ड्राइविंग लाइसेंस के लिए करीब दो साल तक मेहनत करनी पड़ी और लगभग 6 लाख रुपये खर्च हुए. ( Photo: ITG) ड्राइविंग लाइसेंस के लिए करीब दो साल तक मेहनत करनी पड़ी और लगभग 6 लाख रुपये खर्च हुए. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 6:32 AM IST

भारत में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना कई लोगों के लिए एक सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि किसी देश में ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करने में करीब दो साल लग जाएं और इसके लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ें? नॉर्वे में रहने वाले एक भारतीय शख्स का अनुभव इन दिनों चर्चा में है. उन्होंने बताया कि नॉर्वे में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए उन्हें करीब दो साल तक मेहनत करनी पड़ी और लगभग 6 लाख रुपये खर्च हुए.

Advertisement

रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय शख्स विनोद 2011 में नॉर्वे पहुंचे थे. वहां पहुंचने के बाद उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि रोजमर्रा की जिंदगी के लिए कार चलाना सीखना जरूरी है, नॉर्वे में बर्फबारी, पहाड़ी इलाके, ठंड और लंबी दूरी जैसी परिस्थितियां ड्राइविंग को भारत के मुकाबले काफी अलग बना देती हैं. विनोद ने शुरुआत में एक पड़ोसी की मदद से कार चलाना सीखा. लेकिन सिर्फ कार चलाना सीख लेना ही काफी नहीं था. नॉर्वे में ड्राइविंग लाइसेंस पाने के लिए कई जरूरी ट्रेनिंग और टेस्ट से गुजरना पड़ता है.

थ्योरी टेस्ट से लेकर सेफ्टी ट्रेनिंग तक
विनोद के मुताबिक, लाइसेंस पाने की प्रक्रिया में कई अनिवार्य कोर्स, थ्योरी टेस्ट, सेफ्टी ट्रेनिंग और काफी प्रैक्टिस शामिल थी. उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में कार चलाने की तैयारी करनी पड़ी. इस दौरान उन्होंने बर्फीली सड़कों, पहाड़ी रास्तों, सुरंगों, हाईवे और छोटी सड़कों पर ड्राइविंग की प्रैक्टिस की. यहां तक कि ड्राइविंग की निगरानी करने वाले व्यक्ति के पास भी कम से कम पांच साल का ड्राइविंग अनुभव होना जरूरी था.

Advertisement

विनोद ने बताया कि नॉर्वे में ड्राइविंग स्कूल आमतौर पर घंटे के हिसाब से फीस लेते हैं. यानी जितनी ज्यादा प्रैक्टिस की जरूरत होगी, उतना ही खर्च बढ़ता जाएगा. ड्राइविंग स्कूल तब तक प्रैक्टिस करवाते हैं, जब तक उन्हें यह भरोसा न हो जाए कि व्यक्ति सड़क पर सुरक्षित तरीके से गाड़ी चला सकता है. आखिरकार वह फाइनल ड्राइविंग टेस्ट के लिए पहुंचे. यह टेस्ट करीब एक घंटे तक चला और इसमें ट्रैफिक के बीच ड्राइविंग के अलावा सुरंगों और पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी चलाना भी शामिल था. लेकिन पहली कोशिश में विनोद टेस्ट पास नहीं कर पाए.

पहली बार फेल, फिर दो महीने और की प्रैक्टिस
पहली कोशिश में फेल होने के बाद विनोद ने हार नहीं मानी. उन्होंने करीब दो महीने और ड्राइविंग की प्रैक्टिस की. इसके बाद उन्होंने दोबारा टेस्ट दिया और इस बार वह सफल रहे. विनोद के मुताबिक, पूरी प्रक्रिया में उन्हें करीब दो साल लग गए. उस समय उन्होंने लगभग 6 लाख रुपये खर्च किए थे. उनका कहना है कि आज के हिसाब से उस समय खर्च की गई रकम की कीमत 10 लाख रुपये से भी ज्यादा हो सकती है.

क्यों है नॉर्वे का सिस्टम इतना सख्त?
विनोद ने अपने अनुभव से बताया कि नॉर्वे में ड्राइविंग टेस्ट का मकसद सिर्फ यह देखना नहीं है कि कोई व्यक्ति कार चला सकता है या नहीं. असली मकसद यह सुनिश्चित करना है कि वह सड़क पर दूसरे लोगों की जिंदगी को भी सुरक्षित रख सके. यानी वहां ड्राइविंग लाइसेंस को सिर्फ कार चलाने की अनुमति के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि इसे सड़क पर जिम्मेदारी से गाड़ी चलाने की क्षमता से जोड़ा जाता है. विनोद ने भारत में ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि भारत में अगर लोगों को लाइसेंस हासिल करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़े तो शायद सड़क सुरक्षा को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.

Advertisement

विनोद की पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं. कई यूजर्स ने कहा कि भारत में ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करना नॉर्वे की तुलना में काफी आसान है. कुछ लोगों ने अपने अनुभव शेयर करते हुए दावा किया कि उन्होंने बिना ज्यादा टेस्ट या प्रैक्टिस के भी लाइसेंस हासिल कर लिया था. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »