नॉर्वे में 300 रुपये का खीरा देखकर भारतीय ने पूछा- किसान को कितना मिलता है?

नॉर्वे की एक दुकान में सब्जियों की कीमत देखकर भारतीय ने भारत की कृषि सप्लाई चेन पर बड़ा सवाल उठाया. उसने पूछा कि ग्राहक जो कीमत चुकाता है, उसमें से आखिर किसान के हिस्से में कितना पैसा पहुंचता है.

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एक यूजर ने दावा किया कि कई मामलों में किसान को उसकी उपज का उतना हिस्सा नहीं मिल पाता(Photos: @turiyatman/X) एक यूजर ने दावा किया कि कई मामलों में किसान को उसकी उपज का उतना हिस्सा नहीं मिल पाता(Photos: @turiyatman/X)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:11 AM IST

नॉर्वे की एक ग्रॉसरी स्टोर में सब्जियों की कीमत देखकर भारत में रहने वाले किसी आम ग्राहक के लिए शायद सबसे पहले महंगाई का ख्याल आए. लेकिन नॉर्वे में रह रहे एक भारतीय ने इन कीमतों को देखकर एक अलग सवाल उठा दिया. उन्होंने पूछा कि भारत में जिस सब्जी के लिए ग्राहक पैसे देता है, उसमें से आखिर किसान के पास कितना पैसा पहुंचता है?

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X यूजर विनोद ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया है. इसमें नॉर्वे की एक लोकल ग्रॉसरी स्टोर में सब्जियों की कीमतें दिखाई गई हैं. वीडियो में ऑर्गेनिक नींबू करीब 850 रुपये किलो, टमाटर करीब 680 रुपये किलो और एक खीरा करीब 300 रुपये का दिखाई देता है.विनोद ने लिखा कि नॉर्वे में कई साल रहने के बाद भी जब वह दुकान जाते हैं तो ऐसी कीमतें उन्हें हर बार चौंकाती हैं.

भारत से तुलना ने खड़ा किया बड़ा सवाल

विनोद ने नॉर्वे की इन कीमतों की तुलना भारत में मिलने वाली सब्जियों से की. उनके मुताबिक, भारत में नींबू करीब 90-110 रुपये किलो, टमाटर 60-80 रुपये किलो और खीरा करीब 20-30 रुपये प्रति पीस मिल सकता है.

हालांकि, भारत में सब्जियों की कीमत शहर, मौसम, क्वालिटी और बाजार के हिसाब से लगातार बदलती रहती है. इसलिए सोशल मीडिया पोस्ट में बताए गए आंकड़ों को पूरे भारत की औसत कीमत नहीं माना जा सकता,लेकिन विनोद का सवाल कीमतों की इस तुलना से कहीं आगे जाता है.

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ग्राहक के पैसे में किसान का कितना हिस्सा?

विनोद ने अपनी पोस्ट में सवाल उठाया कि अगर भारत में ग्राहक किसी सब्जी के लिए पैसा देता है तो उस रकम में से कितना हिस्सा उस किसान तक पहुंचता है, जिसने उसे उगाया है? यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नॉर्वे में सब्जियां भारत से कितनी महंगी हैं. सवाल यह है कि किसान से बाजार तक पहुंचते-पहुंचते एक सब्जी की कीमत कितनी बार बदलती है और उस पूरी प्रक्रिया में किसान को कितना मिलता है.उन्होंने इसी संदर्भ में पूछा कि क्या भारत में किसानों को उनकी मेहनत के हिसाब से उचित कीमत मिल रही है.

सोशल मीडिया पर किसानों की कमाई पर बहस

विनोद की पोस्ट के बाद चर्चा सिर्फ नॉर्वे की महंगी सब्जियों तक सीमित नहीं रही. सोशल मीडिया यूजर्स ने भारत की कृषि सप्लाई चेन और किसानों की कमाई पर सवाल उठाने शुरू कर दिए.

एक यूजर ने दावा किया कि कई मामलों में किसान को ग्राहक द्वारा चुकाई गई अंतिम कीमत का पूरा फायदा नहीं मिलता और सप्लाई चेन में मौजूद अलग-अलग स्तरों पर कीमत बढ़ती जाती है.

हालांकि, किसान को मिलने वाली कीमत और ग्राहक द्वारा चुकाई गई खुदरा कीमत के बीच अंतर को सिर्फ बिचौलियों से जोड़ना सही नहीं होगा. ट्रांसपोर्ट, मंडी शुल्क, स्टोरेज, छंटाई, खराब होने वाली उपज, थोक व्यापार और खुदरा बिक्री जैसी कई लागतें भी अंतिम कीमत को प्रभावित करती हैं.

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सब्जी की कीमत से ज्यादा अहम है यह सवाल

नॉर्वे की दुकान में 300 रुपये का खीरा देखकर हैरानी होना इस कहानी का सिर्फ शुरुआती हिस्सा है. इस वीडियो ने असली चर्चा उस सवाल पर ला दी है, जो भारत के हर किसान और ग्राहक से जुड़ा है.किसान खेत में जिस सब्जी को उगाता है, ग्राहक जब उसे बाजार से खरीदता है तो उसके दिए 100 रुपये में से आखिर किसान के हिस्से में कितने रुपये आते हैं?

यही सवाल इस वायरल वीडियो को सिर्फ विदेश में महंगी सब्जियों की कहानी से आगे ले जाता है. यह भारत की किसान की कमाई, कृषि सप्लाई चेन और खेत से बाजार तक पहुंचने वाली कीमत को समझने का मौका भी देता है.

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