जब भी भारत और नॉर्वे जैसे देशों की तुलना होती है, तो चर्चा आमतौर पर अच्छी सैलरी, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और क्वालिटी ऑफ लाइफ पर आकर रुक जाती है. लेकिन कई सालों तक भारत और नॉर्वे दोनों में रह चुके एक भारतीय का कहना है कि दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा अंतर इनमें से कोई भी नहीं है. उनके मुताबिक, असली फर्क इस बात में है कि दोनों देश अपने बच्चों की परवरिश कैसे करते हैं.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर विनोद नाम के एक NRI की पोस्ट ने इस मुद्दे पर नई बहस छेड़ दी है. उनका कहना है कि भारत में बच्चों का बचपन पढ़ाई, परीक्षा और अच्छे नंबर लाने की दौड़ में कहीं खो जाता है.
'स्कूल, कोचिंग, ट्यूशन... फिर अगले एग्जाम की तैयारी'
विनोद ने लिखा कि भारत में कई बच्चों की डेली रूटीन बेहद थका देने वाली होती है. सुबह स्कूल, फिर कोचिंग, उसके बाद ट्यूशन, होमवर्क और अगले टेस्ट की तैयारी. उनका कहना है कि यह अब इतना सामान्य हो गया है कि किसी को इसमें कुछ गलत भी नहीं लगता.
उन्होंने कहा कि माता-पिता बच्चों की पढ़ाई पर लाखों रुपये खर्च करते हैं. स्कूल अच्छे रिजल्ट के दबाव में रहते हैं और कोचिंग इंडस्ट्री लगातार बढ़ती जा रही है. लेकिन इस पूरी दौड़ में सबसे बड़ा नुकसान बच्चों का होता है. उनके शब्दों में बच्चे चुपचाप अपना बचपन खो देते हैं.
'नॉर्वे में बच्चों को सिर्फ नंबरों से नहीं आंका जाता'
विनोद का कहना है कि नॉर्वे और दूसरे स्कैंडिनेवियाई देशों में बच्चों को सिर्फ अच्छे अंक लाने की मशीन नहीं बनाया जाता. वहां उन्हें खेलने, खेलकूद में हिस्सा लेने, दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताने का पर्याप्त मौका मिलता है.उनके मुताबिक, शिक्षा का मकसद केवल परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक लाना नहीं होना चाहिए. बच्चों को हर चीज को समझने की चाह रखने वाले, आत्मनिर्भर और समस्या का समाधान करने वाला इंसान बनाना भी उतना ही जरूरी है.उन्होंने लिखा कि हमें ऐसे बच्चे नहीं चाहिए जो सिर्फ 'यस सर' कहना जानते हों.
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भारत में इतना दबाव क्यों?
विनोद की पोस्ट पर कई लोगों ने अपनी राय रखी. कुछ लोगों ने कहा कि भारत की बड़ी आबादी और प्रतिष्ठित कॉलेजों में सीमित सीटों की वजह से प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है. ऐसे में माता-पिता और बच्चों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है.
हालांकि, विनोद का मानना है कि प्रतिस्पर्धा अपनी जगह है, लेकिन इसके कारण बच्चों की जिज्ञासा और बचपन खत्म नहीं होना चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूलों में सिर्फ परीक्षा के अंकों के बजाय रचनात्मकता, संवाद कौशल, व्यावहारिक समझ और समस्या सुलझाने की क्षमता को भी महत्व मिलना चाहिए.
क्या लोग इस पोस्ट से सहमत थे
विनोद की पोस्ट पर कई लोगों ने कहा कि भारतीय बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाने लगते हैं. कुछ यूजर्स ने भारी स्कूल बैग, लगातार होमवर्क और रटने वाली पढ़ाई पर भी सवाल उठाए. उनका कहना था कि अगर बच्चों को व्यावहारिक तरीके से सीखने का मौका मिले, तो वे विषयों को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे.
इस बहस ने एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है, क्या बच्चों को सफल बनाने की दौड़ में हम उनसे उनका बचपन तो नहीं छीन रहे? आखिर मेहनत, सपने और प्रतिस्पर्धा के साथ क्या बच्चों को खेलने, जिज्ञासु बनने और खुलकर जीने का भी उतना ही अधिकार नहीं होना चाहिए?
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