धीरे-धीरे रे मना… वैभव सूर्यवंशी को उप-कप्तान बनाना कितना सही, कितना गलत?

वैभव सूर्यवंशी को फ्यूचर का सबसे बड़ा क्रिकेट सुपरस्टार कहा जा रहा है. पिछले एक-दो साल में वैभव ने जैसा खेल दिखाया है, वो संभव भी है. लेकिन हाल ही में जब उन्हें एक टीम की उप-कप्तानी सौंपी गई, तो दिमाग में आया कि ये कहीं ज्यादा ही जल्दबाज़ी तो नहीं हो रही. सवाल कई हैं और तलाश जवाब का है.

Advertisement
वैभव सूर्यवंशी को बड़ी जिम्मेदारी (Photo: Reuters) वैभव सूर्यवंशी को बड़ी जिम्मेदारी (Photo: Reuters)

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 06 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:03 AM IST

समस्तीपुर के ताजपुर गांव से निकलकर जब 13-14 साल का वैभव सूर्यवंशी मैदान पर उतरा था, तो उसके गेम और एग्रेशन ने सबको हैरान कर दिया था. 12 की उम्र में रणजी डेब्यू, फिर राजस्थान रॉयल्स के लिए आईपीएल में सबसे तेज़ सेंचुरी में से एक, अंडर-19 वर्ल्ड कप की चमक और अब 15 साल की उम्र में टीम इंडिया के लिए डेब्यू. 

Advertisement

क्रिकेट को आंकड़ों के हिसाब से पढ़ने वालों के लिए ये किसी गोल्डन एग से कम नहीं है, क्यूंकि वैभव रोज एक नया पन्ना लिख रहा है. लेकिन हाल ही में जब दलीप ट्रॉफी के लिए ईस्ट ज़ोन की टीम चुनी गई, तो चयनकर्ताओं ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने बहस छेड़ दी है. ईशन किशन की कप्तानी वाली टीम में 15 साल के वैभव सूर्यवंशी को उप-कप्तान बना दिया गया.

ईस्ट ज़ोन के चयनकर्ताओं में से एक प्ररंजन मलिक का तर्क है कि वैभव को जिम्मेदारी देने से वह और परिपक्व होगा, ताकि भविष्य में वह भारत का कप्तान भी बन सके. चयनकर्ताओं का मानना है कि चूंकि कप्तान ईशान किशन विकेटकीपर हैं और मुख्य फैसले वही लेंगे, इसलिए वैभव पर नेतृत्व का पूरा बोझ नहीं होगा. लेकिन इस पूरे तर्क के पीछे जो 'जल्दबाजी' छिपी है, उस पर सवाल उठना लाजिमी है. मीडिया और माहौल में जश्न है कि 15 साल का बच्चा वाइस कैप्टन बन गया. लेकिन इस शोर के पीछे एक पुरानी लोक-अनुभव की आवाज़ धीमी सी चेतावनी दे रही है कि ‘धीरे-धीरे रे मना...’

Advertisement

क्यूंकि इतनी तेज़ी से चलना न वैभव के लिए ठीक है और न ही क्रिकेट के लिए.

वैभव के टैलेंट पर किसी को शक नहीं है, फैन्स को तो खासकर नहीं है. जिस तरह से वह क्रीज पर गेंद को टाइम करता है, वह किसी कुदरती करिश्मे से कम नहीं है. लेकिन कप्तानी या उप-कप्तानी सिर्फ एक पोस्ट या रिवॉर्ड नहीं है. यह रणनीतिक परिपक्वता, विरोधी की चालों को समझने, स्पेल्स का आंकलन करने और दबाव में धैर्य रखने का हुनर है. यह वह कला है जो सैकड़ों मैच हारने-जीतने के अनुभव के बाद आती है. जिस उम्र में वैभव का ध्यान सिर्फ अपनी बल्लेबाजी को बेहतर करने और रेड-बॉल क्रिकेट में टिकने पर होना चाहिए, उस उम्र में उसके सिर पर टीम के फैसलों को समझने का मानसिक तनाव डाल दिया गया है.

आप आंकड़े ही देख लीजिए, आईपीएल और टी20 फॉर्मेट में वैभव का बल्ला जमकर बोला है, जहां उसका स्ट्राइक रेट 200 के पार रहता है. लेकिन लाल गेंद के फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में उसका औसत अभी भी 17-18 के आसपास अटका हुआ है. यह इस बात का सबूत है कि चार दिवसीय मैचों में उसके खेल को अभी बहुत काम और वक्त की दरकार है. जब कोई बल्लेबाज अपनी खुद की बल्लेबाजी की बारीकियों को समझने के दौर से गुजर रहा हो, तब उसे यह सोचना पड़े कि फील्डिंग कहां लगानी है या किस गेंदबाज से स्पेल कराना है, तो यह उसके स्वाभाविक विकास को बाधित करता है.

Advertisement

वाइस कैप्टन बनाने वाले सेलेक्टर बोल रहे हैं कि वो वैभव को फ्यूचर के लिए रेडी कर रहे हैं. लेकिन अभी वो 15 साल का है, क्या वो उसे 18 साल की उम्र में टीम इंडिया का कप्तान बनाना चाह रहे हैं? अभी तो वैभव को खुले हाथ, अपने मन से खेलने देना चाहिए, अभी से उसके माइंड में अगर लीडरशिप, कप्तानी, ब्रांडिंग और बाकी चीज़ें डालेंगें तो मैच प्रेशर, मैच टेक्टिक्स और बाकी चीज़ें वो कैसे सीखेगा.

इतिहास गवाह है कि वक़्त से पहले 'अगला सचिन' बनाने की होड़ में हमने कई प्रतिभाओं को झुलसते देखा है. सचिन तेंदुलकर ने भी 16 साल में डेब्यू किया था, लेकिन उन पर शुरुआत में कप्तानी का कोई दबाव नहीं डाला गया था. उन्हें सीनियर्स के साए में खुलकर खेलने और सीखने की आजादी दी गई थी.

आज के बाजार और सोशल मीडिया के दौर में '15 साल का उप-कप्तान' एक बहुत बिकने वाली हेडलाइन है. यह ब्रांड्स को भाती है और खबरों में टीआरपी लाती है. लेकिन 15 साल की उम्र में जब आप शिखर पर बिठा दिए जाते हैं, तो असफलता का डर बहुत गहरा हो जाता है. कल अगर दो-तीन पारियों में वैभव का बल्ला शांत रहा, तो यही मीडिया और सोशल मीडिया जो आज वाइस-कैप्टन बनने की वाहवाही लूट रहा है, उसकी परिपक्वता पर सवाल उठाने में एक सेकेंड नहीं लगाएगा.

Advertisement

क्रिकेट में एक पुरानी कहावत है कि क्लास को निखरने के लिए लाइमलाइट नहीं, बल्कि समय और एकांत चाहिए होता है. वैभव को अभी सिर्फ एक खिलाड़ी के रूप में पकने देना चाहिए था. ईस्ट ज़ोन के चयनकर्ताओं को यह समझना होगा कि बरगद का पेड़ बनने में सालों का वक्त लगता है, रातों-रात सिर्फ पौधे ही उगते हैं जो पहली तेज़ हवा में टूट जाते हैं.

इसलिए इस जश्न और वाहवाही के शोर के बीच वैभव की बेहतरी के लिए सिर्फ एक ही सलाह है, जो खुद कबीरदास ने लिखी है…

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, 
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »