दूसरी गेंद पर आउट होने से बचा... कुछ देर बाद एक और कैच छूटा... एक स्विच-हिट में स्टंप उड़ते-उड़ते बचा. फिर भी वैभव सूर्यवंशी ने अपना बल्ला रोकने की बजाय और खुलकर चलाया. 15 साल का यह बल्लेबाज शायद ‘बच गए’ सुनकर डरना नहीं जानता और ‘92’ देखकर रुकना भी नहीं. दलीप ट्रॉफी सेमीफाइनल में उसकी 81 गेंदों पर 92 रनों की पारी इसी सोच की सबसे शानदार मिसाल रही.
वैभव की इस पारी को सिर्फ 92 रन के आंकड़े से समझना मुश्किल है. असली कहानी उन मौकों में छिपी है, जब वह आउट हो सकते थे और उसके बाद उन्होंने क्या किया.
पारी की दूसरी ही गेंद पर यश ठाकुर ने उन्हें परेशान किया. वैभव ने गेंद का पीछा किया और बल्ले का किनारा लगा, लेकिन गेंद विकेटकीपर तक पहुंचने से पहले जमीन पर गिर गई. जीवनदान मिला. किसी किशोर बल्लेबाज के लिए यह खुद को थोड़ा रोक लेने का संकेत हो सकता था. वैभव के लिए नहीं.
कुछ ही देर बाद उन्होंने फिर जोखिम लिया. सारांश जैन की गेंद पर वह फ्लाइट में छके और पॉइंट की तरफ हवा में शॉट खेल बैठे. गेंद फील्डर तक पहुंची, लेकिन कैच छूट गया. इसके बाद भी वैभव ने अपने खेल की रफ्तार कम नहीं की.
उल्टा, अगली चुनौती के सामने और आक्रामक हो गए.
सारांश की गेंद पर कदम आगे निकाला और छक्का जड़ दिया. सिर्फ 42 गेंदों में अर्धशतक पूरा हो गया. यानी दो बार जिंदगी मिलने के बावजूद वैभव ने अपनी बल्लेबाजी की सबसे बड़ी पहचान- आक्रमण को नहीं छोड़ा.
ईशान और शमी ने समझाया, वैभव ने कुछ देर माना
पहले सेशन के बाद जब ड्रिंक्स ब्रेक हुआ तो ईशान किशन और मोहम्मद शमी ड्रेसिंग रूम से निकलकर वैभव के पास पहुंचे. उस समय वैभव 51 रनों पर नाबाद थे.
बातचीत में क्या कहा गया, यह साफ नहीं था, लेकिन संदेश का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था- थोड़ा रुककर खेलो, गेंद को देखो, हर गेंद पर हमला जरूरी नहीं है. वैभव ने भी कुछ देर के लिए यही किया.
लगातार आठ गेंदों तक उन्होंने गेंदों को छोड़ने की कोशिश की. स्विंग होती गेंदों को शरीर के अंदर से निकलने दिया. आगे की गेंदों पर डिफेंस किया. ऐसा लगा जैसे 15 साल का बल्लेबाज अपने सीनियर्स की बात को समझ रहा है.
... लेकिन यह ठहराव ज्यादा लंबा नहीं चला
आर्यन पांडे ने लेंथ की गेंद डाली और वैभव कदमों का इस्तेमाल करते हुए गेंद की लाइन में आ गए. बल्ले का पूरा चेहरा लगाया. शॉट में ऊंचाई ज्यादा थी, दूरी कम, लेकिन गेंद सीधी सीमा के पार पहुंच गई. मानो संदेश साफ था- संयम ठीक है, लेकिन वैभव अपना खेल छोड़ने वाला नहीं.
गेंद छोटी हो या स्पिन... वैभव पीछे हटने वालों में नहीं... यश ठाकुर ने जब छोटी गेंद से वैभव को फंसाने की कोशिश की तो उन्होंने उसे भी चुनौती की तरह लिया. लेग स्टंप की तरफ आई गेंद को हुक किया और फाइन लेग के ऊपर से छक्का जड़ दिया.
फिर बाएं हाथ के स्पिनर हर्ष दुबे आए. उन्होंने मिडिल और लेग की लाइन पकड़ने की कोशिश की. वैभव ने सिर्फ दो गेंदों में जवाब दे दिया- क्रीज से बाहर निकले और डीप मिडविकेट के ऊपर से गेंद को सीमा के पार पहुंचा दिया.
यही वैभव की बल्लेबाजी का रोमांच है. उसे गेंदबाज का नाम डराता नहीं. मैच की स्थिति रोकती नहीं. और सबसे दिलचस्प बात- अपनी पिछली गलती भी उसे अगली गेंद पर रक्षात्मक नहीं बनाती.
92 पर भी शतक का हिसाब नहीं लगाया
वैभव 92 रन तक पहुंच चुके थे. शतक सिर्फ आठ रन दूर था. एक बड़ा शतक सामने था और ईस्ट जोन को उनकी जरूरत भी थी.
यह वह स्थिति थी, जब ज्यादातर युवा बल्लेबाज शायद अपने खेल को थोड़ा सुरक्षित कर लेते. सिंगल लेते, जोखिम कम करते और तीन अंकों तक पहुंचने की कोशिश करते.
वैभव की कहानी अलग है
उसके सामने जब भी गेंद हिट करने लायक दिखाई देती है, वह शायद यह हिसाब नहीं लगाता कि स्कोर कितना है. 20 पर हो या 92 पर- गेंद अच्छी लगी तो बल्ला चलेगा.
यही उसकी खूबी है. और यही उसका खतरा भी. क्योंकि यही बेखौफ रवैया उसे बाकी बल्लेबाजों से अलग करता है, लेकिन यही उसे उस समय भी जोखिम लेने के लिए प्रेरित करता है, जब एक बड़ी पारी हाथ में होती है.
शतक से महज आठ रन दूर उसका आउट होना इसलिए सिर्फ एक विकेट नहीं था. यह उसकी बल्लेबाजी के स्वभाव की पूरी तस्वीर थी.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क