एक समय था जब ओडीआई (वनडे इंटरनेशनल) क्रिकेट खुद किसी बड़े आयोजन का पर्याय था. क्रिकेट विश्व कप हर चार साल में आता था, लेकिन उसके बीच भी क्रिकेट फैन्स के पास इंतजार करने के लिए कुछ बड़े टूर्नामेंट्स होते थे. उन टूर्नामेंटों में सबसे खास थीं ट्राई सीरीज. तीन टीमें, लीग स्टेज, अंकतालिका, फाइनल की दौड़ और हर मुकाबले के साथ बदलता समीकरण.
यह इतना लोकप्रिय था कि किसी ट्राई सीरीज का रोमांच सिर्फ मैदान पर होने वाली भिड़ंत तक सीमित नहीं रहता था. दर्शक यह भी गिनते थे कि कौन फाइनल में पहुंचेगा, किस टीम को कितनी जीत चाहिए और किस परिस्थिति में रन रेट निर्णायक साबित हो सकता है.
मौजूदा परिस्थितियों में टेस्ट क्रिकेट को वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप ने एक लक्ष्य दिया है और टी20 क्रिकेट को दुनिया भर की फ्रेंचाइजी लीग ने एक विशाल बाजार. वनडे क्रिकेट इन दोनों के बीच अपनी जगह तलाश रहा है. ऐसे समय में ट्राई सीरीज का पुराना दौर याद करना इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि तब 50 ओवर के क्रिकेट को किसी अतिरिक्त सहारे की जरूरत नहीं थी.
ट्राई सीरीज की आधुनिक कहानी में केरी पैकर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. मीडिया कारोबारी पैकर का क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के साथ टेलीविजन अधिकारों को लेकर विवाद हुआ. इसके बाद उन्होंने वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट की शुरुआत की. इस लीग को सफल बनाने के लिए पैकर को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों की जरूरत थी. उस समय वेस्टइंडीज सबसे ताकतवर टीम थी और पैकर की टीम ने उसके कई बड़े खिलाड़ियों को अपने साथ जोड़ लिया.
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इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, वेस्टइंडीज और वर्ल्ड इलेवन के बीच ट्राई सीरीज का आयोजन हुआ. मुकाबले एक दिन में खत्म होते थे. रंगीन कपड़े और सफेद गेंदें इस्तेमाल होती थीं और टेलीविजन कवरेज पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आधुनिक था. क्रिकेट की गुणवत्ता भी शानदार थी. वेस्टइंडीज शुरुआती छह ऑस्ट्रेलियाई सत्रों में से चार में शामिल हुआ और हर बार चैम्पियन बना. जब पैकर और ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड के बीच समझौता हुआ, तब भी इस फॉर्मेट को ऑस्ट्रेलिया के घरेलू क्रिकेट कैलेंडर में जारी रखा गया.
... शारजाह बना ट्राई सीरीज का हब
ऑस्ट्रेलिया में लोकप्रिय हुआ यह मॉडल जब साउथ एशिया पहुंचा तो इसका प्रभाव और बढ़ गया. 1983 में भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) के तत्कालीन अध्यक्ष एनकेपी साल्वे ने भारत में विश्व कप आयोजित कराने की दिशा में प्रयास शुरू किए. पाकिस्तान के नूर खान और श्रीलंका के गामिनी दिसानायके भी उनके साथ आए. इसी प्रक्रिया में 19 सितंबर 1983 को एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) की स्थापना हुई. इसके बाद 1984 में भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका ने शारजाह में पहला एशिया कप खेला. यह आयोजन एशिया में मल्टी नेशन्स क्रिकेट की एक नई शुरुआत थी. धीरे-धीरे शारजाह सिर्फ एशिया कप का मैदान नहीं रहा. वह ओडीआई क्रिकेट का एक बड़ा केंद्र बन गया.
1990 के दशक में क्रिकेट का प्रभाव इंग्लैंड से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ रहा था और शारजाह इस बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा बन गया. भारत, पाकिस्तान और दूसरे देशों के बड़े खिलाड़ी यहां लगातार खेलते थे. सेलिब्रिटीज मैच देखने आते थे और टीवी पर मुकाबलों की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई. फ्रेंचाइजी क्रिकेट के दौर से काफी पहले शारजाह ने क्रिकेट को एक बड़े मनोरंजक आयोजन का रूप दे दिया था. 1992 के अंत तक 29 तीन या चार देशों वाले ओडीआई टूर्नामेंट खेले गए. इस दौरान 15 टूर्नामेंट्स ऑस्ट्रेलिया में और नौ टूर्नामेेंट्स शारजाह में आयोजित हुए. यानी वनडे क्रिकेट में ट्राई सीरीज की कहानी मुख्य रूप से दो जगहों से निकलती है- ऑस्ट्रेलिया और शारजाह.
1990 के दशक में साउथ अफ्रीका की इंटरनेशनल क्रिकेट में वापसी हुई और श्रीलंका भी तेजी से दुनिया की मजबूत टीमों में शामिल हो गया. 1996 में श्रीलंका विश्व चैम्पियन बना. अब इंटरनेशनल क्रिकेट में मजबूत वनडे टीमों की संख्या बढ़ चुकी थीं. इसका सीधा फायदा ट्राई सीरीज को मिला.1996 से 2008 के बीच फुल मेम्बर्स टीम्स ने सिंगापुर, मोरक्को, नीदरलैंड्स, मलेशिया, आयरलैंड, स्कॉटलैंड और कनाडा में भी तीन देशों वाले वनडे टूर्नामेंट खेले. विश्व कप के बीच चार साल का अंतर और चैम्पियंस ट्रॉफी की सीमित लोकप्रियता ने भी इन टूर्नामेंटों को महत्वपूर्ण बना दिया. साल भर मजबूत टीमों के बीच वनडे क्रिकेट देखने का यह सबसे बड़ा जरिया था.
इन टूर्नामेंटों में सिर्फ ट्रॉफियां नहीं जीती गईं, बल्कि कई ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होने क्रिकेट के नियमों, रणनीति और सोच को प्रभावित किया. 1979 में सिडनी में आयोजित मुकाबले में इंग्लैंड को आखिरी गेंद पर तीन रन बचाने थे. कप्तान माइक ब्रेयरली ने अपने लगभग सभी फील्डरों को बाउंड्री के पास भेज दिया. एक साल बाद न्यूजीलैंड को एक गेंद पर सात रन चाहिए थे. ऑस्ट्रेलिया के ग्रेग चैपल ने अपने भाई ट्रेवर से अंडरआर्म गेंदबाजी कराई. इस घटना ने क्रिकेट में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया. 1982-83 में लांस केर्न्स ने खास तरीके से तैयार किए गए बल्ले से MCG (मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड) में छह छक्के लगाए. 1980 के दशक में जावेद मियांदाद ने पर्थ के WACA ग्राउंड की परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए वेस्टइंडीज के खिलाफ नाबाद 59 रनों की पारी खेली, जिसमें 45 सिंगल शामिल थे और एक भी चौका-छक्का नहीं था.1986 में शारजाह में गस लोगी (वेस्टइंडीज) को उनकी फील्डिंग के लिए 'प्लेयर ऑफ द मैच' चुना गया. उस समय यह अपने आप में असाधारण घटना थी.
1994 के विल्स त्रिकोणीय सीरीज के फाइनल में युवा गेंदबाज ग्लेन मैक्ग्रा ने पाकिस्तान की मजबूत टीम के खिलाफ शानदार प्रदर्शन किया. 1996 में माइकल बेवन ने नए साल के दिन एक ऐसी रनचेज पूरी की, जिसने उन्हें आने वाले वर्षों में दुनिया के महान फिनिशरों में पहचान दिलाने की नींव रखी. उसी दौर में श्रीलंका ने रोमेश कालूवितरणा को सनथ जयसूर्या के साथ पारी की शुरुआत में उतारा. दोनों ने शुरुआत से ही तेज बल्लेबाजी की रणनीति अपनाई. बाद में यही तरीका 1996 विश्व कप में श्रीलंका की सफलता का अहम हिस्सा बना.
अप्रैल 1996 में सनथ जयसूर्या ने सिंगापुर में आयोजित ट्राई सीरीज के दौरान उस समय का सबसे तेज ODI शतक (48 बॉल पर) बनाया. लेकिन कुछ ही महीनों बाद केन्या में हुए चतुष्कोणीय टूर्नामेंट में पाकिस्तान के शाहिद आफरीदी (37 गेंदों पर शतक) ने उनका रिकॉर्ड तोड़ दिया. 1998 में शारजाह में सचिन तेंदुलकर की 'डेजर्ट स्टॉर्म' पारी ने इस मैदान और ट्राई सीरीज की लोकप्रियता को एक और स्तर पर पहुंचा दिया. इसी टूर्नामेंट संस्कृति ने ऐसे मुकाबले दिए, जिनमें सिर्फ दो टीमें आमने-सामने नहीं होती थीं, बल्कि पूरे टूर्नामेंट की कहानी दांव पर लगी रहती थी.
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इंग्लैंड ने पहली ट्राई सीरीज 1998 में आयोजित की. यह सिलसिला 2005 तक चला. 2000 में जिम्बाब्वे ने लीग स्टेज में शीर्ष स्थान हासिल किया. 2001 में वकार यूनुस ने दो मैचों में 13 विकेट लिए. 2002 में युवराज सिंह और मोहम्मद कैफ ने फाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ शानदार रन चेज पूरी की. 2005 में बांग्लादेश ने विश्व चैम्पियन ऑस्ट्रेलिया को पहली बार हराकर इतिहास रचा. इन टूर्नामेंटों का असर इतना था कि टीमों के प्रदर्शन को बड़े टूर्नामेंटों की तैयारियों से भी जोड़कर देखा जाता था.
इसका बड़ा उदाहरण क्रिकेट विश्व कप 2023 से पहले ऑस्ट्रेलिया में देखने को मिला. 1999 विश्व कप जीतने वाली टीम के दिग्गज स्टीव वॉ और मार्क वॉ को 2003 के विश्व कप दल से बाहर कर दिया गया. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया अपनी घरेलू ट्राई सीरीज के फाइनल में जगह बनाने में नाकाम रहा था. विश्व कप से पहले इतनी बड़ी टीम में बदलाव यह दिखाता है कि उस दौर में ट्राई सीरीज के प्रदर्शन को कितनी गंभीरता से लिया जाता था. ट्राई सीरीज सिर्फ अभ्यास या कैलेंडर का हिस्सा नहीं थीं. वे टीमों की असली परीक्षा मानी जाती थीं.
टी20 ने बिगाड़ा ODI ट्राई सीरीज का खेल?
2010 के दशक के अंत तक ट्राई सीरीज का दौर कमजोर पड़ने लगा. दुनिया भर में टी20 फ्रेंचाइजी लीग बढ़ रही थीं और खिलाड़ियों का कैलेंडर पहले से ज्यादा व्यस्त हो चुका था. दो विदेशी टीमों को एक ही समय पर बुलाकर लंबा वनडे टूर्नामेंट आयोजित करना भी मुश्किल होने लगा. लेकिन ट्राई सीरीज के पतन के लिए सिर्फ टी20 क्रिकेट को जिम्मेदार ठहराना पूरी तस्वीर नहीं होगी. भारत ने आईसीसी (अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद) और एसीसी टूर्नामेंटों को छोड़कर 2003 के बाद किसी तीन या चार देशों वाले टूर्नामेंट की मेजबानी नहीं की. साउथ अफ्रीका ने 2001 के बाद ऐसा आयोजन नहीं किया और न्यूजीलैंड में आखिरी ऐसा टूर्नामेंट 1995 में हुआ. पाकिस्तान ने 2025 में चैम्पियंस ट्रॉफी से पहले ट्राई सीरीज का आयोजन किया. यह पाकिस्तान में 2004 के पाकटेल कप (Paktel Cup) के बाद इस तरह का पहला मौका था. इसका मतलब है कि ट्राई सीरीज का आकर्षण टी20 के पूरी तरह हावी होने से पहले ही कम होने लगा था.
2005 में एक ट्राई सीरीज और एक द्विपक्षीय सीरीज को लेकर इंग्लैंड की आलोचना हुई क्योंकि एशेज से पहले टीम ने 10 ओडीआई खेल लिए थे. उस साल फाइनल टाई रहा और बाद में इंग्लैंड ने एशेज जीत ली. लेकिन 2006 से इंग्लैंड ने गर्मियों के कार्यक्रम को अलग-अलग द्विपक्षीय सीरीज में बांट दिया. इसके बाद वहां ट्राई सीरीज की वापसी नहीं हुई. ऑस्ट्रेलिया में भी 2007 के वर्ल्ड टी20 के बाद टी20 इंटरनेशनल मैचों को घरेलू कैलेंडर में जगह मिलने लगा. पारंपरिक 15 मैचों वाली ट्राई सीरीज को जारी रखना मुश्किल हो गया. ऑस्ट्रेलिया ने कुछ समय के लिए द्विपक्षीय मुकाबलों को प्राथमिकता दी और ट्राई सीरीज धीरे-धीरे इतिहास बन गई.
ट्राई सीरीज के कमजोर होने की एक वजह यह भी थी कि मेजबान टीम के बिना होने वाले मुकाबलों में दर्शकों की रुचि अक्सर कम रहती थी. दूसरी ओर ब्रॉडकास्टर्स के लिए फ्रेंचाइजी टी20 क्रिकेट ज्यादा आकर्षक उत्पाद बन गया. दिलचस्प बात यह है कि जिस टेलीविजन क्रांति ने केरी पैकर के वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट को जन्म देने में मदद की थी, वही बदलता हुआ बाजार बाद में पारंपरिक ट्राई सीरीज के लिए चुनौती बन गया.
वनडे क्रिकेट में ट्राई सीरीज का दौर लगभग खत्म हो गया, लेकिन इसका विचार पूरी तरह गायब नहीं हुआ. टी20 इंटरनेशनल में तीन देशों वाले टूर्नामेंट आयोजित होते रहे. 2017-18 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ऐसी प्रतियोगिता हुई. श्रीलंका की निदाहास ट्रॉफी में दिनेश कार्तिक की फिनिशिंग ने फाइनल को यादगार बना दिया. 2018 में जिम्बाब्वे के खिलाफ एरॉन फिंच ने 172 रन बनाए, जो उस समय मेन्स टी20 इंटरनेशनल में विश्व रिकॉर्ड था. पाकिस्तान और न्यूजीलैंड ने भी ट्राई सीरीज आयोजित कीं. शारजाह में भी यह फॉर्मेट देखने को मिला. हाल ही में नामीबिया ने भी टी20I ट्राई सीरीज का आयोजन किया, जहां मेजबान टीम ने शुरुआती मैच में साउथ अफ्रीका को हराकर बड़ा उलटफेर किया.
करीब 25 वर्षों तक ट्राई सीरीज वनडे क्रिकेट के विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहीं. उन्होंने मजबूत टीमों को लगातार एक-दूसरे के खिलाफ खेलने का मौका दिया, रणनीतियों को बदला और ऐसे फाइनल दिए जिनका इंतजार पूरे टूर्नामेंट के दौरान रहता था. आज वनडे क्रिकेट के सामने टेस्ट और टी20 के बीच अपनी अलग जगह बनाए रखने की चुनौती है.
अनुराग कुमार झा