मेडल से चूकीं, गुरु की याद ने तोड़ दिया… जसपाल राणा का नाम आते ही छलक पड़ा मनु भाकर का दर्द

मनु भाकर एशियन गेम्स में महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में पांचवें स्थान पर रहीं और पदक से चूक गईं. मुकाबले के बाद जसपाल राणा का नाम आते ही वह भावुक हो गईं. जून में 49 साल की उम्र में राणा के निधन के बाद यह मनु का पहला बड़ा मल्टी-स्पोर्ट्स इवेंट है. उन्होंने अपने गुरु की सबसे बड़ी सीख- नतीजे से ज्यादा प्रक्रिया पर ध्यान देने को याद किया और कहा कि जिंदगी अप्रत्याशित है, इसलिए उसे पूरी तरह जीना चाहिए.

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पांचवें नंबर का दर्द था, लेकिन राणा का नाम सुनते ही भर आईं मनु की आंखें. (Photo, PTI) पांचवें नंबर का दर्द था, लेकिन राणा का नाम सुनते ही भर आईं मनु की आंखें. (Photo, PTI)

आजतक स्पोर्ट्स डेस्क

  • नागोया (जापान),
  • 23 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 5:18 PM IST

फाइनल के बाद मनु भाकर की आंखों में पदक न जीत पाने का मलाल था, लेकिन आंसू सिर्फ इस हार के नहीं थे. वह तब खुद को संभाल नहीं सकीं, जब बातचीत जसपाल राणा तक पहुंची. एक ऐसा नाम, जो उनके लिए सिर्फ कोच नहीं था, बल्कि करियर और जिंदगी को दिशा देने वाला शख्स था. एशियन गेम्स में पांचवें स्थान पर रहने के बाद मनु के लिए सबसे मुश्किल सवाल स्कोर या 8.9 का नहीं था, बल्कि उस गुरु को याद करना था, जिसके साथ वह जापान में इस मंच पर उतरने का सपना देख रही थीं.

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49 साल की उम्र में जून में दिल की बीमारी से जसपाल राणा के निधन के बाद यह मनु का पहला बड़ा मल्टी-स्पोर्ट्स इवेंट है. बुधवार को  10 मीटर एयर पिस्टल के फाइनल में पदक से चूकने के बाद जब उनसे राणा के बारे में पूछा गया तो भावनाएं हावी हो गईं. कुछ पल के लिए मनु की आवाज लड़खड़ाई, आंखें नम हुईं और फिर उन्होंने उस रिश्ते को शब्द देने की कोशिश की, जिसकी गहराई किसी मेडल से कहीं बड़ी थी.

‘कुछ बातें एक-दो बार याद नहीं आतीं, जिंदगी भर साथ रहती हैं’

मनु ने कहा, 'अगर मैं उन सारे वर्षों को याद करूं... तो ऐसा नहीं है कि आप किसी चीज को एक-दो बार याद करते हैं. वह आपके साथ रहती है... जब कोई व्यक्ति आपकी जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा रहा हो, तो वह आपके साथ रहता है.'

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जसपाल राणा मनु के शुरुआती करियर से जुड़े रहे. 2024 पेरिस ओलंपिक में मनु ने दो कांस्य पदक जीते और उस सफलता के पीछे राणा के मार्गदर्शन की अहम भूमिका रही. राणा खुद एशियन गेम्स के दिग्गज थे. उन्होंने तीन एशियाड में आठ पदक जीते, जिनमें चार स्वर्ण शामिल थे. 2006 दोहा एशियन गेम्स में तो तेज बुखार के बावजूद वह शूटिंग रेंज में उतरे और तीन स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया.

यानी जिस मंच पर मनु आज अपने गुरु को याद कर रही थीं, उसी मंच के वह खुद भी एक किंवदंती थे.

नतीजे से ज्यादा प्रक्रिया पर ध्यान... राणा की सबसे बड़ी सीख थी

मनु के मुताबिक राणा उन्हें हमेशा नतीजे के पीछे भागने की बजाय प्रक्रिया पर भरोसा करना सिखाते थे. बुधवार के फाइनल में भी उन्होंने इसी सीख को अपना सबसे बड़ा सहारा बनाया.

मनु ने कहा, 'वह हमेशा प्रक्रिया को लेकर बहुत जिद्दी थे. उनका मानना था कि किसी भी दिन, जिंदगी के किसी भी मोड़ पर जब आप शूट करें तो अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने और अपनी प्रक्रिया का पालन करने में सक्षम होना चाहिए.'

फाइनल में आठवें शॉट पर आया 8.9 का स्कोर उनकी पदक की उम्मीदों के लिए बड़ा झटका साबित हुआ. मनु ने भी इसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई.

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उन्होंने कहा, 'जितना कोई इससे इनकार करना चाहे, हां, इसने निश्चित रूप से मेरी संभावनाओं को काफी प्रभावित किया.'

लेकिन इसके बाद भी वह उस प्रक्रिया से नहीं हटीं, जिसे राणा ने उन्हें सिखाया था.

जापान आने का सपना था, लेकिन हालात बदल गए

इस एशियन गेम्स को लेकर मनु के मन में एक और भाव था. वह जापान में राणा के मार्गदर्शन में शूटिंग करने को लेकर उत्साहित थीं. उन्होंने राणा को 'एशियन चैम्पियन' और 'बेस्ट ऑफ द बेस्ट' बताते हुए कहा कि जब वह 2018 जकार्ता एशियन गेम्स में आई थीं, तब राणा एक निर्विवाद चैम्पियन की तरह थे.

मनु ने कहा कि वह जापान आने को लेकर बेहद उत्साहित थीं, लेकिन 'परिस्थितियां' बदल गईं. इसके आगे बोलने से पहले उन्होंने खुद को संभाला.

यही ठहराव शायद उन शब्दों से ज्यादा कह गया, जो वह कह नहीं पाईं.

जसपाल राणा ने कोच के रूप में मनु भाकर के करियर को नई ऊंचाई दी और पेरिस ओलंपिक में उनके दो कांस्य पदक की ऐतिहासिक उपलब्धि में अहम भूमिका निभाई थी. (PTI)

राणा ने शूटिंग से आगे की जिंदगी भी सिखाई

मनु से जब पूछा गया कि क्या राणा ने कभी एशियन गेम्स को लेकर उन्हें कुछ खास कहा था, तो उनका जवाब बेहद भावुक था. उनके मुताबिक राणा की कही हर बात उनके लिए गहरी मायने रखती थी.

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फिर उन्होंने एक ऐसी सीख याद की, जिसका शूटिंग से कोई सीधा संबंध नहीं था...'जिंदगी बहुत अप्रत्याशित है और इसे पूरी तरह जियो, दयालु रहो और... सब कुछ.'

शायद यही वजह है कि राणा की याद मनु के लिए किसी एक टूर्नामेंट या किसी एक पदक से जुड़ी नहीं है. उनके लिए यह जिंदगी को देखने का तरीका भी है.

मुश्किल तैयारी के बावजूद मनु ने खुद को संभाला

एशियन गेम्स से पहले जापान में मनु की तैयारी आसान नहीं रही. मंगलवार का प्री-ट्रेनिंग सेशन भी बेहद खराब रहा था. उन्होंने बताया कि उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा और साइडर्स तक ठीक से नहीं दिख रहे थे.

इसके बावजूद क्वालिफिकेशन और फाइनल में उन्होंने अपनी प्रक्रिया को प्राथमिकता दी. मनु ने माना, 'मेरी प्रक्रिया नंबर एक चीज थी और मैं क्वालिफिकेशन और फाइनल दोनों में ऐसा करने में सक्षम रही. ज्यादातर शॉट वैसे ही थे, जैसे मैंने योजना बनाई थी. हालांकि कुछ शॉट अच्छे नहीं रहे.'

मनु ने यह भी बताया कि भोपाल में एशियन गेम्स से पहले हुए सिमुलेटेड फाइनल की तुलना में जापान में उनका प्रदर्शन थोड़ा बेहतर रहा. यानी परिणाम भले पांचवां स्थान रहा, लेकिन उनके लिए कहानी सिर्फ स्कोरबोर्ड की नहीं थी.

दो मैच, दो धमाकेदार जीत और 29 गोल. एशियन गेम्स में खिताब बचाने उतरी भारतीय हॉकी टीम ने पूल-ए में शुरुआत तो तूफानी अंदाज में की है, लेकिन अब उसके सामने पहली ऐसी चुनौती है जो उसकी तैयारियों की असली तस्वीर सामने रखेगी. डिफेंडिंग चैम्पियन भारत गुरुवार को साउथ कोरिया से भिड़ेगा.

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भारत ने अपने अभियान की शुरुआत इंडोनेशिया को 13-1 और श्रीलंका को 16-1 से हराकर की. इन दोनों मुकाबलों में भारतीय फॉरवर्ड लाइन ने जमकर गोल बरसाए, लेकिन कोरिया के खिलाफ मुकाबला अलग होगा. विश्व रैंकिंग में भारत आठवें और कोरिया 21वें स्थान पर है, फिर भी एशियन गेम्स में कोरिया का रिकॉर्ड उसे हल्के में लेने की इजाजत नहीं देता.

कोरिया चार बार एशियन गेम्स चैम्पियन रह चुका है और पिछले संस्करण में कांस्य पदक जीत चुका है. ऐसे में भारत के लिए गुरुवार का मुकाबला सिर्फ पूल मैच नहीं, बल्कि खिताब की राह में पहली गंभीर परीक्षा होगा.

गोलों की बारिश के बीच भारत की नजर डिफेंस पर

भारत के शुरुआती दो मैचों में सबसे ज्यादा चर्चा उसके आक्रामक खेल की रही है. स्ट्राइकर दिलप्रीत सिंह सात फील्ड गोल के साथ टीम के टॉप स्कोरर हैं। श्रीलंका के खिलाफ पेनल्टी कॉर्नर और एक स्ट्रोक से चार गोल करने वाले जुगराज सिंह भी शानदार फॉर्म में हैं।

वहीं, करिश्माई स्ट्राइकर अभिषेक ने श्रीलंका के खिलाफ हैट्रिक जमाकर अपनी धार दिखा दी है. यानी भारत के पास गोल करने वाले खिलाड़ियों की कमी नहीं है.

लेकिन असली सवाल दूसरी तरफ है. भारत ने इंडोनेशिया और श्रीलंका के खिलाफ 13-1 और 16-1 की जीत दर्ज की, फिर भी दोनों मुकाबलों में एक-एक गोल गंवाया. कोरिया के खिलाफ भारतीय डिफेंस की पहली बड़ी परीक्षा इसी वजह से होगी.

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12 में सिर्फ 5 पेनल्टी कॉर्नर गोल

मुख्य कोच क्रेग फुल्टन ने भी सुधार के लिए सबसे अहम क्षेत्रों में पेनल्टी कॉर्नर कन्वर्जन को रखा है. श्रीलंका के खिलाफ भारत को 12 पेनल्टी कॉर्नर मिले, लेकिन वह सिर्फ पांच को गोल में बदल सका.

एशियन गेम्स जैसे बड़े टूर्नामेंट में यह आंकड़ा भारत के लिए आगे चलकर निर्णायक हो सकता है. कोरिया जैसी टीम के खिलाफ मौके मिलने पर उन्हें गोल में बदलना बेहद जरूरी होगा.

वर्ल्ड कप की निराशा को सोने में बदलने का मौका

भारत हाल में नीदरलैंड्स और बेल्जियम में खेले गए FIH वर्ल्ड कप में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सका था और आठवें स्थान पर रहा. अब टीम के पास उस निराशा को पीछे छोड़कर एशियन गेम्स में सीधे 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक का टिकट हासिल करने का मौका है.

एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम को लॉस एंजेलिस ओलंपिक के लिए सीधे क्वालिफिकेशन मिलेगा. लिहाजा भारत के लिए यहां सिर्फ खिताब की रक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि ओलंपिक टिकट भी दांव पर है.

फुल्टन पहले ही साफ कर चुके हैं कि वर्ल्ड कप से मिली सीख को अब मैदान पर उतारना होगा. उनके मुताबिक टीम ने वर्ल्ड कप के बाद अपनी कमियों की पहचान की है और अब उन सुधारों को खेल में लागू करना उसका अगला लक्ष्य है.

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सेमीफाइनल की राह भी साफ करनी होगी

12 टीमों के इस टूर्नामेंट में प्रत्येक पूल से शीर्ष दो टीमें सेमीफाइनल में पहुंचेंगी. कोरिया के बाद भारत को शनिवार को मेजबान और पिछले संस्करण के रजत पदक विजेता जापान से भिड़ना है. पूल चरण का आखिरी मुकाबला 28 सितंबर को बांग्लादेश के खिलाफ होगा.

बांग्लादेश के खिलाफ मुकाबला अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है, लेकिन कोरिया और जापान के खिलाफ मैच भारत की असली तस्वीर सामने रखेंगे.

दो मैचों में 29 गोल कर भारत ने अपना इरादा बता दिया है. अब कोरिया के खिलाफ उसे यह साबित करना है कि वह सिर्फ गोलों की मशीन नहीं, बल्कि मुश्किल मुकाबलों में भी खिताब बचाने का दम रखता है.
 

पदक नहीं आया. 8.9 ने मौका कमजोर किया. तैयारी में भी कई परेशानियां रहीं. लेकिन मनु ने इस प्रदर्शन को अंत नहीं माना.

उन्होंने कहा, 'मैं सकारात्मक हूं कि भविष्य में मैं और बेहतर कर सकती हूं और लगातार सुधार करती रहूंगी.'

 मनु ने अपनी मौजूदा कोच सर्बियाई विशेषज्ञ जेलेना अरुनोविच और पूरी सपोर्ट टीम को भी श्रेय दिया.  उन्होंने कहा, 'आप सिर्फ मुझे देखते हैं, लेकिन बहुत सारे लोग बहुत मेहनत करते हैं, ताकि हम प्रदर्शन कर सकें.'

मनु पांचवें स्थान पर रहीं. उनके गले में इस बार कोई पदक नहीं था. लेकिन उस दिन शूटिंग रेंज से बाहर निकलते हुए उनके साथ एक चीज जरूर थी- जसपाल राणा की वह सीख कि नतीजे आपके हाथ में नहीं, लेकिन अपनी प्रक्रिया और अपना सर्वश्रेष्ठ देना आपके हाथ में है.

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