अल-नीनो को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर चेतावनी दी है. अनुमान है कि नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच इसका असर सबसे ज्यादा रहेगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत को 2032 तक करीब 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब 94,55,960 करोड़ रुपये) का आर्थिक नुकसान हो सकता है.
वहीं, पूरी दुनिया को 10 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की आर्थिक नुकसान का अनुमान है. यह नुकसान केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खेती, रोजगार, एनर्जी और अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल सकता है. अल-नीनो एक ऐसी मौसमी घटना है, जो भारत में मानसून को कमजोर कर सकती है और गर्मी बढ़ा सकती है. आने वाले अल-नीनो के दौरान भी ऐसे ही हालात बनने की आशंका जताई गई है.
यह भी पढ़ें: रुला रहा अल-नीनो: दिल्ली में पारा 42 पर फील लाइक टेंपरेचर 51 डिग्री, ऐसा क्यों?
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
एक इंग्लिश अखबार में छपी रिपोर्ट के अनुसार अल-नीनो की वजह से भारत में भीषण गर्मी बढ़ सकती है और मानसून कमजोर हो सकता है. इसका सीधा असर खेती पर पड़ेगा. बारिश कम होने से फसलों का उत्पादन घट सकता है, सिंचाई की जरूरत बढ़ेगी और बिजली की मांग भी बढ़ सकती है. इससे खाद्य कीमतों और महंगाई पर भी असर पड़ने की आशंका है.
2032 तक 1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान क्यों?
रिसर्चर्स का कहना है कि अल-नीनो का असर केवल उसी साल तक सीमित नहीं रहता. इससे आर्थिक विकास की रफ्तार कई वर्षों तक धीमी रह सकती है. अनुमान है कि 2032 तक भारत की अर्थव्यवस्था को 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो सकता है. वहीं, वैश्विक स्तर पर यह नुकसान 10 ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक हो सकता है. वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि कुछ आर्थिक असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं.
यह भी पढ़ें: घातक गर्मी... 40 डिग्री का पारा भारतीयों से ज्यादा यूरोपीय लोगों को क्यों सताता है?
क्या करना होगा?
एकस्पर्ट्स का कहना है कि सरकारों को अभी से तैयारी शुरू करनी चाहिए. इसके लिए बेहतर वेदर फोरकास्ट, समय पर चेतावनी देने वाले सिस्टम, गर्मी सहने वाली फसलों का विकास, सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करना और रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ाना जरूरी होगा. इससे अल-नीनो और क्लाइमेट चेंज दोनों के असर को कम करने में मदद मिल सकती है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाला अल-नीनो केवल मौसम की घटना नहीं है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था, खेती और लोगों के जीवन पर बड़ा असर डाल सकता है. ऐसे में समय रहते तैयारी और क्लाइमेट के हिसाब से प्लानिंग बनाना फ्यूचर के नुकसान को कम करने के लिए जरूरी होगा.
आजतक साइंस डेस्क