भारत में 2.61 करोड़ बच्चों के पढ़ाई पर असर डाल रहा बिगड़ैल मौसम

यूनिसेफ रिपोर्ट के अनुसार 2025 में जलवायु आपदाओं से 2.61 करोड़ भारतीय बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई. तूफान, बाढ़ और लू मुख्य कारण. स्कूलों को क्लाइमेट रीजिलिएंट बनाना जरूरी, वरना बच्चों के भविष्य पर गहरा असर पड़ेगा.

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नोएडा में बारिश के दौरान सड़क पर स्कूली बच्चे. (File Photo: PTI) नोएडा में बारिश के दौरान सड़क पर स्कूली बच्चे. (File Photo: PTI)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 14 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:54 AM IST

जलवायु संकट अब सिर्फ मौसम या पर्यावरण की समस्या नहीं रह गया है. यह बच्चों के स्कूल और उनकी पढ़ाई तक पहुंच चुका है. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनिसेफ की नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. 2025 में दुनिया भर में कम से कम 17.1 करोड़ विद्यार्थियों की शिक्षा बाढ़, तूफान, लू और अन्य जलवायु आपदाओं के कारण बाधित हुई. इनमें अकेले भारत के 2.61 करोड़ से अधिक बच्चे शामिल हैं. यानी वैश्विक स्तर पर प्रभावित हर 100 विद्यार्थियों में करीब 15 भारतीय थे.

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रिपोर्ट का नाम है 'लर्निंग इंटरप्टेड: ग्लोबल स्नैपशॉट ऑफ क्लाइमेट-रिलेटेड स्कूल डिसरप्शंस इन 2025'. इसमें 106 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है. भारत में तूफान सबसे बड़ा कारण रहा. स्कूलों में पानी भरने, इमारतें क्षतिग्रस्त होने या भीषण गर्मी के कारण कक्षाएं बंद करनी पड़ीं. यह सिर्फ एक-दो दिन की पढ़ाई का नुकसान नहीं है. बार-बार स्कूल बंद होने से बच्चों की सीखने की गति टूटती है और लंबे समय में स्कूल छोड़ने का खतरा बढ़ जाता है.

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वैश्विक स्तर पर तूफान ने करीब 10.9 करोड़ बच्चों की पढ़ाई प्रभावित की. बाढ़ ने कम से कम 7 करोड़ और लू ने करीब 5 करोड़ बच्चों को प्रभावित किया. कई जगह स्कूल बंद हुए, ऑनलाइन पढ़ाई करनी पड़ी या उपस्थिति घटी. पाकिस्तान में मॉनसूनी बाढ़ से 2.8 करोड़ से अधिक बच्चों की स्कूल वापसी में देरी हुई. मिस्र में तूफान से भी इतने ही बच्चे प्रभावित हुए.

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भारत के लिए यह आंकड़ा चिंताजनक है क्योंकि यहां बच्चों की बड़ी आबादी है और जलवायु जोखिम ज्यादा हैं. तूफान, बाढ़ और गर्मी के बार-बार हमले शिक्षा व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं. 40 देशों में साल भर में कई बार पढ़ाई बाधित हुई. मेडागास्कर और स्पेन जैसे देशों में भी बार-बार घटनाएं दर्ज हुईं.

कमजोर देशों और बच्चियों पर ज्यादा बोझ

प्रभावित 17.1 करोड़ विद्यार्थियों में से करीब 75 प्रतिशत निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं. इन देशों में स्कूलों को सुरक्षित रखने और आपदा के बाद जल्दी बहाल करने के संसाधन कम हैं. बच्चियों के लिए खतरा और बढ़ जाता है. स्कूल और शौचालय क्षतिग्रस्त होने, परिवार विस्थापित होने या आमदनी घटने पर घर की जिम्मेदारियां लड़कियों पर आ जाती हैं. इससे स्कूल वापसी मुश्किल होती है और बाल विवाह का खतरा भी बढ़ सकता है.

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यूनिसेफ का अनुमान है कि अगर कदम नहीं उठाए गए तो 2025 में प्रभावित बच्चों को उनकी पूरी जिंदगी की कमाई में कम से कम 20,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो सकता है. इसका असर उत्पादकता और गरीबी कम करने पर भी पड़ेगा.

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स्कूलों को क्लाइमेट रीजिलिएंट बनाने की जरूरत

यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल कहती हैं कि जलवायु आपदाएं बच्चों की जिंदगी और भविष्य दोनों के लिए खतरा हैं. स्कूलों के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाना, आपदा के दौरान पढ़ाई जारी रखने की व्यवस्था, वित्त पोषण बढ़ाना और बच्चों को जलवायु ज्ञान देना जरूरी है. आंकड़ों को मजबूत कर पहले से अनुमान लगाना भी महत्वपूर्ण है.

भविष्य में जोखिम और बढ़ेंगे. 2050 तक भीषण लू का खतरा आठ गुना और बाढ़ तीन गुना बढ़ सकता है. इसलिए अभी से तैयारी करनी होगी. स्कूल सिर्फ इमारत नहीं, बच्चों के सपनों का रास्ता हैं. जलवायु संकट से इस रास्ते को बचाना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है. सरकारों, समुदायों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को मिलकर काम करना होगा ताकि हर बच्चे की पढ़ाई सुरक्षित रहे.

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