चीन ने चंद्रमा पर आदमी उतारने की अपनी योजना साफ कर दी है. 31 अक्टूबर 2026 को सातवें ह्यूमन स्पेस सिंपोजियम में बताया कि वह 2030 से पहले पहली बार ताइकोनॉट्स यानी एस्ट्रोनॉट्स को चंद्रमा की सतह पर भेज देगा. इसमें दो लॉन्ग मार्च-10 रॉकेट का इस्तेमाल होगा.
एक रॉकेट लान्यू लैंडर को चंद्रमा की कक्षा में पहुंचाएगा. दूसरा रॉकेट मेंग्झोउ अंतरिक्ष यान में तीन ताइकोनॉट्स को लेकर जाएगा. दोनों यान कक्षा में जुड़ेंगे. फिर दो अंतरिक्ष यात्री लैंडर में बैठकर चंद्रमा पर उतरेंगे. वे तीन दिन रुकेंगे और हर दिन स्पेसवॉक करेंगे.
पूरा मिशन दो भागों में बंटा है. पहले लैंडर को भेजा जाएगा. उसके बाद चालक दल वाला यान जाएगा. दोनों के जुड़ने के बाद दो ताइकोनॉट्स नीचे उतरेंगे. तीसरा यान में ही रहेगा. तीन दिन तक वे चंद्रमा की सतह पर काम करेंगे. रोज स्पेसवॉक का मतलब है कि वे बाहर निकलकर नमूने जमा करेंगे या मशीनें लगाएंगे. यह योजना काफी सोच-समझकर बनाई गई है ताकि जोखिम कम रहे.
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अभी क्या तैयारी चल रही है
चीन बिना चालक दल वाले कई टेस्ट कर रहा है. पूरी ड्रेस रिहर्सल भी हो रही है. यानी असली मिशन जैसा अभ्यास बिना आदमी के. ये टेस्ट सफल रहे तो ही आखिरी मिशन भेजा जाएगा. चीन सिर्फ एक बार उतरने तक सीमित नहीं रहना चाहता. आगे चलकर चंद्रमा पर रिसर्च स्टेशन बनाने की भी योजना है.
यह योजना नासा के आर्टेमिस प्रोग्राम के साथ मेल खाती है. अमेरिका भी जल्द चंद्रमा पर वापस जाना चाहता है. चीन अपनी रफ्तार बढ़ा रहा है. दोनों देश अलग-अलग रास्ते से एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं. चीन का फोकस स्वदेशी तकनीक पर है. लॉन्ग मार्च-10, लान्यू लैंडर और मेंग्झोउ यान सब स्वदेशी हैं.
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क्यों महत्वपूर्ण है यह मिशन
चंद्रमा पर आदमी उतारना सिर्फ गर्व की बात नहीं है. इससे नई तकनीकें निकलती हैं. भविष्य में चंद्रमा से संसाधन निकालने या आगे मंगल जाने की तैयारी भी होती है. चीन पहले ही अपने अंतरिक्ष स्टेशन और रोवर मिशनों से काफी अनुभव हासिल कर चुका है. अब वह अगला बड़ा कदम उठाने जा रहा है.
आम भाषा में कहें तो चीन कह रहा है कि 2030 से पहले उसके तीन अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर जाएंगे. दो रॉकेट से सब सामान और आदमी जाएंगे. तीन दिन वहां रुककर काम करेंगे. अभी टेस्ट चल रहे हैं. अगर सब ठीक रहा तो चीन भी अमेरिका की तरह चंद्रमा पर अपना झंडा गाड़ देगा.
आजतक साइंस डेस्क