Mahabharat Facts: हिंदू धर्म में महाभारत को पंचम वेद माना जाता है. यह विश्व के सबसे बड़े महाकाव्यों में से एक है. महाभारत में दिया गया ज्ञान आज भी उतना ही मान्य है, जितना उस समय था. लेकिन क्या महाभारत जितनी हमारे सामने रखी गई है, उतनी ही है? या फिर इससे जुड़े ऐसे कुछ रहस्य हैं, जिनसे आज तक पर्दा नहीं उठ सका है?
महाभारत से जुड़े ऐसे रहस्यों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे, जिनके बारे में अधिकांश लोगों को जानकारी नहीं है. तो चलिए, बिना देरी किए आज की इस वीडियो को शुरू करते हैं.
18 का रहस्य
महाभारत का युद्ध हुए यूं तो हजारों वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज भी लोगों में इसके प्रति जिज्ञासा बनी हुई है. आज भी इससे जुड़े कई ऐसे रहस्य हैं, जिन पर चर्चा होती रहती है. ऐसा ही एक रहस्य 18 अंक से जुड़ा है. दरअसल, महाभारत में 18 अंक का विशेष महत्व बताया जाता है. महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला था, जिसमें लाखों योद्धा मारे गए. इसके अलावा कौरवों और पांडवों की कुल 18 अक्षौहिणी सेना थी, जिसमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षौहिणी सेना थी.
यही नहीं, ऋषि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में कुल 18 पर्व बताए गए हैं. हिंदू धर्म में 18 पुराणों का भी विशेष महत्व है. श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान युद्ध के दौरान दिया और गीता में भी 18 अध्याय हैं. इसके अलावा, महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद कुल 18 प्रमुख योद्धाओं के जीवित बचने की बात कही जाती है. यह सब जानने के बाद इतना तो साफ है कि महाभारत और 18 अंक का गहरा नाता है. लेकिन ऐसा क्यों था, यह आज भी एक रहस्य है.
क्या आज भी जीवित हैं अश्वत्थामा?
महाभारत काल का एक ऐसा व्यक्ति, जिसके बारे में माना जाता है कि वह आज भी जीवित है, वह है अश्वत्थामा. अश्वत्थामा कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे. उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से युद्ध किया था. लेकिन युद्ध के अंत में किए गए अपने कर्मों के कारण उन्हें श्राप मिला था.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का गलत प्रयोग किया था. इससे भगवान श्रीकृष्ण क्रोधित हो गए और उन्होंने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि वह अपने किए गए पापों का बोझ उठाते हुए हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकता रहेगा. कहा जाता है कि इसी श्राप के कारण अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और निर्जन स्थानों पर भटक रहे हैं. आज भी कई जगहों पर अश्वत्थामा को देखे जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन इन दावों की सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है.
विमान और परमाणु अस्त्रों का उपयोग
ऐसा कहा जाता है कि महाभारत काल में विमान और परमाणु अस्त्रों जैसे शक्तिशाली हथियारों का उपयोग किया गया था. हालांकि, इन दावों को लेकर इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के बीच मतभेद हैं. मोहनजोदड़ो की खुदाई में कुछ ऐसे कंकाल मिलने के दावे किए गए हैं, जिनमें रेडिएशन का असर होने की बात कही जाती है. कुछ लोग इसे महाभारत में बताए गए ब्रह्मास्त्र से जोड़ते हैं.
कहा जाता है कि दुनिया का सबसे पहला परमाणु बम जैसा अस्त्र यानी ब्रह्मास्त्र अश्वत्थामा ने छोड़ा था. यही नहीं, महाभारत के सौप्तिक पर्व में ब्रह्मास्त्र और उसके प्रभाव से जुड़े प्रसंग मिलते हैं. हालांकि, महाभारत काल में वास्तव में विमान या परमाणु बम जैसे आधुनिक अस्त्रों का उपयोग हुआ था या नहीं, यह आज भी रहस्य और बहस का विषय है.
गांधारी के 100 पुत्र और एक पुत्री का रहस्य
महाभारत में गांधारी के 100 पुत्रों और एक पुत्री का उल्लेख मिलता है. हालांकि, गांधारी के पुत्रों को लेकर कई लोगों के मन में सवाल रहता है कि आखिर उनका जन्म कैसे हुआ था. महाभारत की कथा के अनुसार, गांधारी ने महल में ऋषि वेदव्यास की सेवा की थी. उनकी सेवा से प्रसन्न होकर वेदव्यास ने उन्हें 100 पुत्रों का वरदान दिया था. लेकिन, जब समय आया तो गांधारी लंबे समय तक गर्भवती रहीं. अंत में उन्होंने एक बड़े मांस-पिंड को जन्म दिया. इसे देखकर गांधारी बहुत दुखी हुईं और उसे फेंकने का विचार किया.
तब वेदव्यास ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और उस मांस-पिंड को 100 टुकड़ों में बांटकर अलग-अलग घड़ों में रखने को कहा. गांधारी ने एक पुत्री की भी इच्छा व्यक्त की, जिसके बाद 101 टुकड़े किए गए. कुछ समय बाद इन घड़ों से 100 कौरव राजकुमारों और एक पुत्री का जन्म हुआ. महाभारत में कौरवों की इस बहन का नाम दुश्शला बताया गया है. बाद में उसका विवाह सिंधु नरेश जयद्रथ से हुआ.
विदेशों के योद्धाओं ने भी लिया था युद्ध में हिस्सा?
ऐसा भी कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में सिर्फ भारत के ही नहीं, बल्कि दूसरे क्षेत्रों के योद्धाओं ने भी हिस्सा लिया था. महाभारत में अलग-अलग जनपदों और दूर-दराज के क्षेत्रों से आए योद्धाओं और राजाओं का उल्लेख मिलता है. हालांकि, ग्रीस, रोम या अमेरिका जैसे आधुनिक देशों से योद्धाओं के महाभारत युद्ध में शामिल होने का दावा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है. इसी वजह से महाभारत को लेकर यह दावा भी किया जाता है कि यह एक तरह का विश्वव्यापी युद्ध था, लेकिन इसे प्रमाणित करने वाले ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं.
तीन चरणों में लिखी गई महाभारत
महाभारत एक विशाल महाकाव्य है, जिसे तैयार होने में लंबा समय लगा. परंपरा और कुछ विद्वानों के अनुसार, महाभारत के विकास को अलग-अलग चरणों में समझा जाता है. कहा जाता है कि शुरुआती रूप में इसमें 8,800 श्लोक थे, जिसे 'जय' कहा गया. इसके बाद इसका विस्तार 'भारत' के रूप में हुआ, जिसमें लगभग 24,000 श्लोक बताए गए. अंततः इसका विस्तृत रूप 'महाभारत' बना, जिसमें करीब एक लाख श्लोक बताए जाते हैं. इसी वजह से महाभारत को विश्व के सबसे विशाल महाकाव्यों में से एक माना जाता है.
क्या महाभारत काल में राशियां नहीं थीं?
ज्योतिष के इतिहास को लेकर यह बात कही जाती है कि प्राचीन भारतीय परंपरा में नक्षत्रों का विशेष महत्व था. वैदिक ज्योतिष में 27 नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है. कुछ लोगों का दावा है कि महाभारत काल में आज की तरह 12 राशियों का उपयोग नहीं होता था और ज्योतिष मुख्य रूप से नक्षत्रों पर आधारित था. हालांकि, प्राचीन भारतीय ज्योतिष में राशि और नक्षत्र दोनों की परंपराओं का विकास अलग-अलग चरणों में हुआ है. इसलिए यह कहना कि महाभारत काल में राशियां बिल्कुल अस्तित्व में नहीं थीं, पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता. महाभारत और वैदिक साहित्य में ग्रहों, नक्षत्रों और खगोलीय घटनाओं के कई उल्लेख मिलते हैं.
अभिमन्यु की मौत का सच
आप यह तो जानते ही होंगे कि अर्जुन के बेटे अभिमन्यु की हत्या चक्रव्यूह में हुई थी. लेकिन इससे जुड़ी कई बातें ऐसी हैं, जिन पर अक्सर चर्चा होती है. महाभारत के अनुसार, अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश किया और बेहद वीरता से युद्ध किया. उन्होंने कई योद्धाओं को पराजित किया. अंत में कई महारथियों ने मिलकर उन पर हमला किया.
कथा के अनुसार, अभिमन्यु के पास उस समय अपने बचाव के लिए पर्याप्त अस्त्र-शस्त्र नहीं बचे थे. इसी दौरान दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण की मृत्यु भी अभिमन्यु के हाथों हुई. इससे कौरव पक्ष और अधिक क्रोधित हो गया था. अंततः द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्मा समेत कई योद्धाओं ने मिलकर अभिमन्यु को घेर लिया. इसके बाद दुशासन के पुत्र ने अभिमन्यु पर अंतिम प्रहार किया और उनकी मृत्यु हो गई.
महान योद्धा बर्बरीक ने देखा था पूरा युद्ध
क्या आप उस महान योद्धा के बारे में जानते हैं, जिसके शीश ने महाभारत का पूरा युद्ध देखा था? वह महान योद्धा कोई और नहीं, बल्कि भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक थे. पौराणिक मान्यता के अनुसार, बर्बरीक ने प्रण लिया था कि वह महाभारत के युद्ध में हमेशा हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ेंगे. उनके पास तीन ऐसे बाण थे, जिनकी शक्ति असाधारण मानी जाती थी. कहा जाता है कि बर्बरीक की शक्ति को देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का भेष धारण करके उनसे दान में उनका शीश मांग लिया.
बर्बरीक ने बिना किसी संकोच के अपना शीश दान कर दिया. इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि वह अंत तक महाभारत का युद्ध देखना चाहते हैं. श्रीकृष्ण ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली. पौराणिक कथा के अनुसार, उन्होंने बर्बरीक के शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहां से बर्बरीक ने महाभारत का पूरा युद्ध देखा. इसी मान्यता के कारण बर्बरीक को आज कई स्थानों पर खाटू श्याम के रूप में पूजा जाता है.
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