12 अक्टूबर को नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाएगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी तप, त्याग, संयम और दृढ़ संकल्प की प्रतीक हैं. कठोर साधना और ब्रह्म में लीन रहने के कारण इन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया है. उनकी आराधना से साधक को आत्मबल और धैर्य प्राप्त होता है. देवी की पूजा विद्यार्थियों और साधना करने वालों के लिए विशेष फलदायी मानी गई है. जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा कमजोर हो, उन्हें भी मां ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए.
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि और मंत्र
नवरात्रि के दूसरे दिन स्नान के बाद पीले या सफेद वस्त्र पहनकर मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करें. सबसे पहले देवी के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें. इसके बाद माता को कुमकुम, चंदन, रोली, अक्षत, हल्दी और सुगंधित इत्र अर्पित करें. देवी को सफेद फूल, मिश्री या पंचामृत अर्पित करें. इसके बाद इस मंत्र का जाप कर सकते हैं. फिर मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र "ऊं ऐं नमः" का जाप करें. चंद्रमा को मजबूत करने के लिए सफेद पुष्प और सफेद वस्तुएं अर्पित कर "ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः" मंत्र का कम से कम तीन माला जाप करें.
धन की समस्या दूर करने का महाउपाय
धन संबंधी परेशानियों से राहत पाने के लिए पानी वाला नारियल लेकर अपनी गोद में रखें. इसके बाद ॐ दुं दुर्गाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें. फिर नारियल को बहते जल में प्रवाहित करने का विधान बताया गया है. मान्यता है कि इस उपाय से दरिद्रता दूर करने और आर्थिक स्थिति बेहतर होने की कामना की जाती है.
मां ब्रह्मचारिणी की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय और देवी मैना के घर हुआ था. पर्वतराज की पुत्री होने के कारण उनका नाम पार्वती पड़ा. बचपन में ऋषि नारद से भगवान शिव की कथाएं सुनकर उन्होंने शिव को पति के रूप में पाने का संकल्प लिया. माता पार्वती ने शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की. शुरुआत में उन्होंने सीमित भोजन किया. फिर फल और पत्तों पर निर्भर रहीं. बाद में उन्होंने भोजन और जल का भी त्याग कर दिया. उनकी कठोर साधना और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पत्नी के रूप में स्वीकार किया. इसी तपस्वी स्वरूप के कारण उन्हें मां ब्रह्मचारिणी कहा जाता है.
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