Pitra Paksha 2026: त्रिपिंडी श्राद्ध क्या है? जानें यह कब और क्यों किया जाता है

Pitra Paksha 2026: पितृपक्ष में पितरों की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है. इसी क्रम में त्रिपिंडी श्राद्ध का भी विशेष उल्लेख मिलता है. इसमें पिता, पितामह और प्रपितामह के निमित्त तीन पिंड अर्पित किए जाते हैं.

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इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर तक रहने वाला है. (Photo: ITG) इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर तक रहने वाला है. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 6:31 PM IST

Pitra Paksha 2026: 26 सितंबर से पितृपक्ष शुरू हो रहा है. पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध करने की परंपरा है. लेकिन क्या आपने कभी त्रिपिंडी श्राद्ध के बारे में सुना है. त्रिपिंडी श्राद्ध में पिता, पितामह और प्रपितामह यानी तीन पीढ़ियों के पितरों के लिए पिंडदान किया जाता है. इसे पितरों के पितृ दोष से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है. गृह क्लेश, काम में अड़चन और आर्थिक समस्याओं से मुक्ति के लिहाज से भी त्रिपिंडी श्राद्धकर्म का विशेष महत्व बताया गया है.

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त्रिपिंडी श्राद्ध क्यों किया जाता है?
शास्त्रीय मान्यताओं में पितृ दोष या  पितरों की नाराजगी को परिवार में आने वाली कई परेशानियों से जोड़कर देखा गया है. मान्यता है कि जब घर में हर वक्त बेवजह क्लेश रहे या बने बनाए काम बिगड़ने लगे तो पितृ दोष इसका कारण हो सकता है. आर्थिक मोर्चे पर संकट और लगातार होने वाली दुर्घटनाओं को भी कई बार इससे जोड़ा जाता है. कहते हैं कि जब हमारी तीन पीढ़ी के पितृ नाराज हों तो अक्सर लोगों के जीवन में ऐसी समस्याएं आती हैं. इसलिए इन समस्याओं से निजात के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध श्राद्ध किया जाता है.

तीन पीढ़ियों के लिए होता है पिंडदान
त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन पिंड तैयार करके तीन पीढ़ियों के पितरों को अर्पित किए जाते हैं. इसमें पिता, पितामह और प्रपितामह के नाम और गोत्र का स्मरण किया जाता है. फिर चावल, दूध, पंचमेवा, दही, काले तिल और कुश आदि सामग्री का इस्तेमाल कर पिंड बनाया जाता है. चावल को दूध में पकाकर भी पिंड तैयार किए जा सकते हैं. इसके बाद तीन वेदियां स्थापित कर उन पर पत्ते रखे जाते हैं और पिंड अर्पित किए जाते हैं.

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पिंड अर्पित करने की विधि
पिंडदान करते समय अंगूठे और तर्जनी के बीच के स्थान से पिंड अर्पित करने की बात कही गई है. हथेली के इस स्थान का पितृ स्थान कहा जाता है. पिता, पितामह और प्रपितामह के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए तीनों पिंड अलग-अलग वेदियों पर रखे जाते हैं. विधि पूरी होने के बाद तीनों पिंडों को एकत्र किया जाता है. इसके बाद इन्हें गाय को खिलाने की बात बताई गई है. इस प्रक्रिया के जरिए तीन पीढ़ियों के पितरों की तृप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है.

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