Pitra Paksha 2026: प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध कल, जानें पिंडदान-तर्पण का मुहूर्त और विधि

Pitra Paksha 2026: पितृपक्ष में तिथिनुसार पितरों का श्राद्ध करने की परंपरा है. यानी पितृ की मृत्यु जिस तिथि पर हुई है, उसका श्राद्ध भी हिंदू पंचांग की उसी तिथि के अनुसार किया जाता है. 27 सितंबर को प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा.

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पितरों के तर्पण और श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त को सबसे उत्तम माना गया है. (Photo: ITG) पितरों के तर्पण और श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त को सबसे उत्तम माना गया है. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 10:47 PM IST

पितृपक्ष शुरू हो गया है. इस पवित्र अवधि में पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनका श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है. मान्यता है कि पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने से पितृ दोष दूर होता है और पितरों की कृपा हमेशा हमारे ऊपर बनी रहती है. पितृपक्ष में तिथिनुसार पितरों का श्राद्ध करने की परंपरा है. यानी पितृ की मृत्यु जिस तिथि पर हुई है, उसका श्राद्ध भी हिंदू पंचांग की उसी तिथि के अनुसार किया जाता है. 27 सितंबर को प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा. प्रतिपदा तिथि पर उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु हिंदू पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि पर होती है.

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प्रतिपदा श्राद्ध तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर को रात 10 बजकर 18 मिनट से लेकर 27 सितंबर को रात 8 बजकर 58 मिनट तक रहेगी. ऐसे में प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध 27 सितंबर दिन रविवार को किया जाएगा.

तर्पण और श्राद्ध के लिए शुभ समय
पितरों के तर्पण और श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त को सबसे उत्तम माना गया है. यह समय दोपहर के आस-पास पड़ता है. सामान्य तौर पर यह समय दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 53 मिनट के बीच पड़ता है. लेकिन अलग-अलग शहरों में इसका समय एक-दूसरे से थोड़ा अलग हो सकता है. इसलिए पंचांग देखकर समय सुनिश्चित कर लें.

पितरों का श्राद्ध कैसे किया जाता है?
पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म के लिए सबसे पहले श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठना चाहिए. श्राद्ध के दौरान पितरों क चावल, जौ, काले तिल, घी और शहद से बना पिंड अर्पित किए जाते हैं. इस विधि को पिंडदान किया जाता है. इसके बाद दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में कुशा से बनी अंगूठी पहनकर पितरों को जल अर्पित किया जाता है, जिसे तर्पण कहते हैं. इसके बाद पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए.

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इसके बाद पांच गरीब ब्राह्मणों को बैठाकर श्राद्ध का भोजन कराया जाता है और फिर सामर्थ्य के अनुसार उन्हें दान-दक्षिणा दी जाती है. साथ ही, श्राद्धकर्म कके बाद गाय, कुत्ता, कौआ और चींटी जैसे जीवों को भी भोजन अर्पित करने की परंपरा है. इसे पंचबली या पंचग्रास कहा जाता है. मान्यता है कि इस विधि से किया गया श्राद्ध सीधे पितरों तक पहुंचता है.

कौन कर सकता है पितरों का श्राद्ध?
मान्यताओं के अनुसार, पुत्र, पौत्र या घर का कोई भी पुरुष सदस्य पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर सकता है. हालांकि, अलग-अलग परंपराओं और परिवारों में श्राद्ध कर्म की विधि अलग हो सकती है. वर्तमान समय में कई परिवारों में महिलाएं भी पितरों के लिए तर्पण और श्राद्धकर्म करती हैं.

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