टारगेट तृषा... सियासी झगड़े में मोहरा बनती महिलाएं, तमिल सोसायटी का कड़वा सच उजागर

जो समाज पुरुषों के आपसी झगड़ों में बार-बार महिला की गरिमा पर चोट करता है, वह सिर्फ महिलाओं को सुरक्षित रखने में नाकाम नहीं हुआ है, बल्कि उसने खुद को भी नीचा गिरा लिया है.

Advertisement
तृषा का नाम उछालकर अपनी नाकामी छुपाती राजनीति (Photo-ITG) तृषा का नाम उछालकर अपनी नाकामी छुपाती राजनीति (Photo-ITG)

टीआर जवाहर

  • नई दिल्ली,
  • 05 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 2:47 PM IST

तमिलनाडु में 4 अगस्त को विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन की नाटकीय और हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी ने पूरे राज्य में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है. उनकी गिरफ्तारी तंजावुर में कावेरी जल विवाद पर हुए एक प्रदर्शन के बाद हुई, "जब भीड़ ने 'त्रिशा' के नाम के नारे लगाए, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए एक द्विअर्थी बयान दिया, जिसे आपत्तिजनक और अमर्यादित माना गया.

Advertisement

उन पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 79 (महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाना), धारा 296(b) (सार्वजनिक जगह पर अश्लील बातें करना) और 'तमिलनाडु महिला उत्पीड़न रोधी कानून' की धारा 4 के तहत केस दर्ज हुआ है. पुलिस ने सुबह-सुबह उन्हें नीलांगराई स्थित घर से हिरासत में लिया और 350 किलोमीटर दूर सेंगीपट्टी थाने ले गई. हालांकि, बाद में मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर उन्हें थाने से ही जमानत मिल गई. इस पूरी घटना ने राज्य की राजनीति में मौजूद अवांछित और महिला विरोधी मानसिकता को उजागर कर दिया है.

एक बार फिर, पुरुष राजनीतिक दिग्गजों के बीच चल रही इस तीखी लड़ाई में एक महिला कलाकार को सस्ते मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया है, फिर भी, जो लोग इस घटना को केवल पक्षपातपूर्ण झड़प या चुनावी दौर की एक मामूली चूक के तौर पर देखते हैं, वे इसकी व्यापक और कहीं ज़्यादा चिंताजनक तस्वीर को नहीं समझ पा रहे हैं.

Advertisement

ये सिर्फ तृषा की कहानी नहीं हैं, बल्कि वे समाज की एक पुरानी और गहरी सड़ चुकी सोच का ताजा उदाहरण हैं, राजनीति ने इस महिला-विरोधी सोच को जन्म नहीं दिया, बल्कि उसने यह समझ लिया है कि इसका इस्तेमाल वोटों के फ़ायदे के लिए किया जा सकता है. तमिल राजनीति में किसी महिला के नाम का इस्तेमाल करना सबसे सस्ता साधन बन गया है. इससे आसानी से तालियां, सुर्खियां और वायरल वीडियो मिल जाते हैं जबकि इसकी पूरी कीमत उस महिला को चुकानी पड़ती है.

यह भी पढ़ें: रिहाई के बाद बोले उदयनिधि स्टालिन- सभी महिलाएं मेरी मां-बहन जैसी, मेरे साथ आतंकी जैसा सुलूक हुआ

पुरुषों के लिए छूट और महिलाओं के लिए नैतिकता का पैमाना

हमारे समाज की चर्चाओं में एक साफ और दोहरा रवैया दिखाई देता है. पुरुष कलाकारों और बड़े नेताओं पर अक्सर धोखाधड़ी, अफेयर और शोषण के आरोप लगते हैं, लेकिन उन्हें हमेशा नज़रअंदाज कर दिया जाता है, उनका बचाव किया जाता है या लोग उन्हें जल्दी भूल जाते हैं, उनकी निजी जिदगी की इन गलतियों को या तो 'बड़े लोगों की मामूली बातें' मानकर टाल दिया जाता है, या फिर मीडिया और उनके फैंस की मंडली मिलकर इन बातों को दबा देती है.

इसके ठीक उलट, महिला कलाकारों को सार्वजनिक नैतिकता के कड़े और बेरहम पैमानों पर परखा जाता है. किसी महिला की सफलता, उसकी पहचान या उसका जनजीवन में होना भर सब कुछ तुरंत यौन दृष्टिकोण से देखा जाने लगता है. जब पुरुष राजनेताओं के बीच किसी मुद्दे को लेकर जंग होती है तो वे एक-दूसरे पर नीतिगत हमला करने के बजाय किसी महिला का नाम घसीटते हैं. महिला को निशाना इसलिए बनाया जाता है, क्योंकि हमारे समाज ने महिला की इज्जच को बहुत नाजुक, आसानी से उछाले जाने योग्य और फायदा उठाने वाली चीज मान लिया है. शादीशुदा मर्द से शादी करने वाली औरत को 'घर तोड़ने वाली' कहा जाता है, जबकि उस घर का पुरुष प्रमुख दो-दो घर तबाह करने के बावजूद खुद को किसी 'चालाक औरत का शिकार' बताकर साफ बच निकलता है.

Advertisement

बेशक, सही आलोचना और चरित्र-हनन के बीच अंतर करना ज़रूरी है. सार्वजनिक जीवन में मौजूद लोग, चाहे वे ब्रांड्स का प्रचार करने वाले कलाकार हों, चुनाव में प्रचार करने वाले लोग हों या राजनीति में आने वाले नेता उन्हें अपने काम और बयानों पर सवाल-जवाब का सामना करना ही पड़ता है, लेकिन काम पर सवाल उठाने और राजनीति के चक्कर में किसी महिला के चरित्र पर हमला करने में जमीन-आसमान का फर्क है. चरित्र-हनन ही एक ऐसा हमला बन चुका है, जिसे समाज आज भी मनोरंजन की तरह देखता है.

यह स्थिति सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, दुनिया भर में  महिलाएं चाहे वे ब्रिटेन की संसद में हों, अमेरिका में पत्रकार हों, या ऑस्ट्रेलिया में सांसद हों वे सभी ऐसे ऑनलाइन यौन शोषण और नफरत का सामना करती हैं, जो पुरुषों को कभी नहीं झेलना पड़ता, जो हम देख रहे हैं, वह असल में पूरे लोकतंत्र की एक वैश्विक समस्या है, जो यहां तमिलनाडु के रंग में नजर आ रही है.

तमिल सिनेमा का विरोधाभास और आज़ादी से पहले की सनसनीखेज पत्रकारिता

यह सामाजिक सोच एक बहुत ही दिलचस्प सांस्कृतिक विरोधाभास के बीच ज़िंदा है और वह है खुद तमिल सिनेमा का दोहरापन. तमिल समाज ने के.बी. सुंदरांबल, सावित्री, पद्मिनी, पी. भानुमति, जे. जयललिता, श्रीदेवी, खुशबू, नयनतारा और तृषा जैसी भारत की सबसे प्रभावशाली और मजबूत महिला हस्तियों को जन्म दिया है. ये ऐसी महिलाएं रही हैं जिन्होंने लोगों के दिलों पर राज किया, बॉक्स ऑफिस पर अपनी धक जमाई और ज़बरदस्त आर्थिक ताकत हासिल की, लेकिन अफसोस की बात यह है कि जो समाज अपनी अभिनेत्रियों को देवी मानकर सिर-आंखों पर बिठाता है, वही समाज उन्हें अफवाहों, उनके रिश्तों और अश्लील इशारों तक सीमित कर देता है. उन्हें ऊंचे पायदान पर तो बैठाया जाता है, लेकिन उनके पैरों पर फेंकने के लिए कीचड़ हमेशा तैयार रखा जाता है.

Advertisement

अफ़वाहों को हथियार बनाने का इतिहास

जब राजनीति का सिनेमा की दुनिया से मेल हुआ, तो चरित्र-हनन और अफवाहों को हथियार बनाने का खेल और गहरा हो गया. फर्क सिर्फ इतना आया कि समय के साथ नेताओं और विरोधियों के सोचने का स्तर गिरता चला गया. हर पीढ़ी दावा तो यही करती है कि वह महिलाओं का सम्मान करती है, लेकिन हर पीढ़ी महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए नए-नए तरीके और शब्द ढूंढ ही लेती है.

विरोधियों ने एम. करुणानिधि की निजी ज़िंदगी पर हमला करने की कोशिश की, तो उन्होंने तमिलनाडु विधानसभा में राजाथी अम्माल का परिचय देते हुए कहा, "ये मेरी बेटी कनिमोझी की मां हैं" इस एक वाक्य ने संसद में बात संभाली और विरोधियों के हथियार को नाकाम कर दिया, लेकिन इसके बावजूद सामाजिक कड़वा सच नहीं बदला. बेहद प्रतिभाशाली कनिमोझी को राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा और उन्हें लगातार इस पुरुषवादी सोच और अफ़वाहों से लड़ते हुए पार्टी में अपनी पहचान बनानी पड़ी.

यह भी पढ़ें: तृषा कृष्णन पर उदयनिधि स्टालिन के बयान से खुश नहीं कंगना रनौत, बोलीं- भद्दा मजाक स्वीकार नहीं

जयललिता के साथ हुआ क्रूर व्यवहार

दूसरी ओर, दिवंगत जे. जयललिता को ताउम्र बेहद क्रूर और घटिया बयानों का सामना करना पड़ा. एम.जी. रामचंद्रन (MGR) के साथ उनके फिल्मी करियर से लेकर AIADMK पार्टी में उनके तेजी से उभरने तक, विरोधियों ने उनकी निजी जिदगी और तेलुगु अभिनेता शोभन बाबू से उनके रिश्तों को हमेशा निशाना बनाया. जब 1984 में MGR बीमार होकर अस्पताल में भर्ती थे, तब पार्टी के कुछ गुटों ने जयललिता को उनसे मिलने तक नहीं दिया और उन पर पार्टी पर कब्ज़ा करने का झूठा आरोप लगाया.

Advertisement

इस नफ़रत का सबसे दर्दनाक रूप दिसंबर 1987 में MGR के निधन पर दिखा. राजाजी हॉल में MGR के पार्थिव शरीर के पास जयललिता 21 घंटे तक शांत खड़ी रहीं. वहां उनके साथ बदसलूकी की गई और जब MGR की अंतिम यात्रा निकल रही थी, तब पूरी दुनिया ने टीवी पर देखा कि कैसे उन्हें धक्का देकर अंतिम संस्कार वाली गाड़ी से नीचे गिरा दिया गया.

1989 की ऐतिहासिक विधानसभा घटना

यह चरित्र-हनन 25 मार्च 1989 को तमिलनाडु विधानसभा में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया, जब विपक्ष की नेता के रूप में जयललिता ने मुख्यमंत्री करुणानिधि को चुनौती दी, तो सत्ताधारी दल के नेताओं ने उनकी निजी ज़िंदगी को लेकर बेहद अभद्र और अश्लील टिप्पणियां कीं, इसके बाद सदन में भारी हंगामा हुआ, हाथापाई हुई और उनकी साड़ी खींचने की कोशिश की गई. इस अपमान के बाद जयललिता ने द्रौपदी की तरह कसम खाई कि वह मुख्यमंत्री बनकर ही इस सदन में लौटेंगी और 1991 के चुनाव में उन्होंने भारी बहुमत से जीत हासिल करके यह कर दिखाया.

राजनीति की भेंट चढ़ने वाली महिलाएं और उन्हें केवल 'वस्तु' समझने की संस्कृति

तृषा इस राजनीतिक खींचतान में फंसने वाली अकेली कलाकार नहीं हैं, वे उन कई महिला कलाकारों की लंबी और दर्दनाक सूची का हिस्सा बन गई हैं, जिन्हें नेताओं ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए बलि का बकरा बनाया. 1996 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, सन टीवी पर चंदन तस्कर वीरप्पन का एक कांट-छांट कर बनाया गया इंटरव्यू दिखाया गया था, इसमें अफ़वाह उड़ाई गई कि AIADMK सरकार के पास अभिनेत्री सुकन्या का एक सीक्रेट वीडियो है, जिसका इस्तेमाल केंद्र के नेताओं को ब्लैकमेल करने के लिए किया जा रहा है. इस एक झूठी अफ़वाह ने अपने चरम पर पहुंच चुके सुकन्या के चमकते करियर को पूरी तरह बर्बाद कर दिया, दशकों लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, मद्रास हाईकोर्ट ने सुकन्या के पक्ष में फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि टीवी चैनल ने "सच की पूरी तरह से अनदेखी की" और उसे अभिनेत्री को हर्जाना देने का आदेश दिया.

Advertisement

इसी तरह, जब अभिनेत्री खुशबू सुंदर ने एक मैगज़ीन इंटरव्यू में शादी से पहले प्री-मैरिटल सेक्स और संबंधों पर अपने खुले विचार रखे, तो क्षेत्रीय पार्टियों और रूढ़िवादी संगठनों ने उनके खिलाफ एक बड़ा अभियान छेड़ दिया, उनके पुतले फूंके गए, कोर्ट के बाहर उन पर चप्पलें फेंकी गईं और "तमिल महिलाओं का अपमान" करने के नाम पर उन पर 20 से ज़्यादा आपराधिक मामले दर्ज कर दिए गए. आख़िरकार, सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे उत्पीड़न को खत्म करते हुए सारे केस रद्द कर दिए.

चाहे नयनतारा पर तंज कसना हो या राधिका सरथकुमार पर निजी हमले जब भी पुरुष नेताओं को जनता का ध्यान भटकाने के लिए किसी वायरल मुद्दे की ज़रूरत होती है, वे महिला कलाकारों को ही सुनियोजित तरीके से निशाना बनाते हैं.

यह भी पढ़ें: जुबान बिगड़ी हुई थी उदयनिधि की, पहली बार मिला सवा शेर... CM विजय ने घर से उठवा लिया

राजनीति की यह कीचड़ उछालने वाली संस्कृति हवा में नहीं पनपती. यह हमारे समाज के दोहरे चरित्र और सिनेमा जगत की हल्की सोच से ताकत लेती है. खुद फिल्म इंडस्ट्री भी महिलाओं को केवल एक 'वस्तु' की तरह पेश करने को बढ़ावा देती है, जब किसी फिल्म का नाम मज़ाक में 'तृषा इल्लाना नयनतारा' (अगर तृषा नहीं, तो नयनतारा सही) रख दिया जाता है, तो यह सिर्फ नाम के जरिए पैसा कमाने का तरीका नहीं है. यह इस घटिया सोच को बढ़ावा देता है कि बेहद सफल और चोटी की महिलाएं भी मर्दों के मनोरंजन के लिए आसानी से बदली जा सकने वाली कोई 'चीज़' भर हैं.

Advertisement

महिलाओं के सम्मान को इस तरह कुचलने की यह बीमारी आसानी से हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी घुस चुकी है. हमारे प्राइवेट व्हाट्सएप ग्रुप्स, फैमिली चैट्स और ऑफिस के ब्रेक-रूम में भी महिला कलाकारों के नाम बहुत भद्दे तरीके से लिए जाते हैं. झूठी अफ़वाहें और अपमानजनक मीम्स बिना सोचे-समझे शेयर किए जाते हैं, जिससे महिलाओं के अपमान की यह संस्कृति 'आम बात' लगने लगती है. जब हमारा पूरा समाज बंद दरवाजों के पीछे इस तरह रोज़ाना महिलाओं का चरित्र-हनन करता है, तो यही चीज राजनेताओं को भी मंच से ऐसी अश्लील बातें बोलने की हिम्मत और सामाजिक छूट दे देती है.

अफ़वाहों का व्यापार और तकनीक के ज़रिए झूठी बदनामी

आज अफवाहें फैलाना सिर्फ एक टाइमपास नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा कारोबार बन चुका है. क्लिक मिलने से विज्ञापन का पैसा आता है, यूट्यूब चैनल व्यूज के लिए होड़ में लगे हैं, गुमनाम अकाउंट्स लोगों के गुस्से को भुनाकर कमाई कर रहे हैं और झूठी गपशप एक मुनाफे का बिजनेस मॉडल बन गई है, जो अफ़वाहें पहले चाय की दुकानों पर होती थीं, वे अब सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर पहुंच गई हैं, लेकिन पीड़ित आज भी वही है. कल तक जो बातें पर्दों के पीछे फुसफुसाकर की जाती थीं, आज वे लाइव-स्ट्रीम हो रही हैं, कमाई का जरिया बन रही हैं और इंटरनेट द्वारा तेज़ी से फैलाई जा रही हैं.

इस डिजिटल हमले में एक बेहद परेशान करने वाला पहलू यह है कि इसमें अक्सर महिलाएं भी शामिल हो जाती हैं. हाल ही में खुद को 'डिजिटल रक्षक' बताने वाली एक महिला द्वारा लीक किए गए वीडियो और बयानों का सिलसिला इसका उदाहरण है. उसने सच सामने लाने के नाम पर महिला कलाकारों के चरित्र पर ही कीचड़ उछालना शुरू कर दिया. जब डिजिटल प्लेटफॉर्म महिलाओं के अपमान से पैसे कमाते हैं और महिलाएं खुद व्यूज के लिए दूसरी महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाती हैं, तो यह समाज की नैतिक गिरावट को दिखाता है.

आज किसी महिला कलाकार को निशाना बनाने के लिए उसका कुछ बोलना या करना भी ज़रूरी नहीं है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से मिनटों में उनकी झूठी तस्वीरें, नकली आवाज़ें और मनगढ़ंत बातचीत तैयार की जा सकती हैं. कल तक अफ़वाह फैलाने के लिए कल्पना की ज़रूरत होती थी, आज सिर्फ सॉफ्टवेयर की ज़रूरत है. लोग अफ़वाहों को जल्दी भूल जाते हैं, लेकिन इंटरनेट और सर्च इंजन नहीं भूलते. राजनीति का मुद्दा खत्म हो जाने के बाद भी इंटरनेट पर फैले ये झूठे दाग किसी महिला की पहचान को हमेशा के लिए नुकसान पहुंचाते हैं.

कानूनी दायरा और एक कड़वा सच

भारत के कानूनों ने इस पर रोक लगाने की कोशिश ज़रूर की है. महिलाओं के अश्लील चित्रण पर रोक लगाने वाले कानून (1986) से लेकर तमिलनाडु महिला उत्पीड़न रोधी कानून, आईटी एक्ट की धारा 67 और अब भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों तक कानूनों में डिजिटल अपराधों को जगह दी गई है, लेकिन एक तरफ जहां कानून सख्त हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ समाज इसे आम बात मानता जा रहा है.

कानूनी प्रक्रिया अक्सर घटना घटने के बाद ही हरकत में आती है. यह सिर्फ तब सक्रिय होती है जब राजनीतिक दुश्मनी पुलिस शिकायत, एफआईआर (FIR) और हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियों तक पहुंच जाती है.

अदालत से न्याय मिलने में दशकों का लंबा समय लग जाता है जैसा कि अभिनेत्री सुकन्या की 30 साल लंबी कानूनी लड़ाई में देखा गया, इसके उलट, जनता की नजरों में किसी का चरित्र-हनन पलक झपकते ही हो जाता है और उसका असर हमेशा रहता है. कानून मानहानि की सजा तो दे सकता है, लेकिन एक बार जब लाखों लोग उस झूठ को देख लेते हैं, तो वह खोई हुई गरिमा आसानी से वापस नहीं लौटा सकता.

किसी बड़े नेता की गिरफ्तारी से अखबारों की सुर्खियां तो बन सकती हैं, लेकिन इससे समाज की गहरी खराबी ठीक नहीं होती. आज के समय में यूट्यूबर्स बिना किसी डर के कुछ भी बोल रहे हैं, कानून इस डिजिटल दौर की रफ्तार का मुकाबला करने में पीछे छूट रहा है और राजनेता बेफिक्र हैं क्योंकि उन्हें पता है कि जनता की याददाश्त छोटी होती है. आज निशाना 'तृषा' हैं. कल 'जयललिता', 'खुशबू', 'सुकन्या' या कोई और चेहरा था, कल कोई और होगा. नाम बदलते रहेंगे, लेकिन यह खेल नहीं बदलेगा.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »