सऊदी अरब का इजरायल से खुफिया मदद मांगना मिडिल-ईस्ट की राजनीति का ऐसा पल है जिसे सिर्फ यमन के तात्कालिक युद्ध के रूप में समझना भूल होगी. रियाद ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड की मध्यस्थता से तेल अवीव से संपर्क किया. कारण साफ है कि हूती लड़ाकों ने लाल सागर तट, मोखा बंदरगाह और बाब अल-मंदेब के द्वीपों पर कब्जा जमा लिया है.
सऊदी जहाजों की नाकाबंदी जारी है. होर्मुज पहले से तनाव में है. पूर्वी-पश्चिमी पाइपलाइन पर हमला हो चुका है. तेल निर्यात का गला दबने का खतरा वास्तविक है. लेकिन यह खबर उससे कहीं बड़ी है जितनी सतह पर दिख रही है. सऊदी अरब इजरायल को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देता. राजनयिक संबंध नहीं हैं. फिर भी जरूरत पड़ने पर दरवाजा खटखटाया गया,
जाहिर है कि कई तरह की बातें तो होंगी ही. मक्का पैक्ट का साझेदार पाकिस्तान यमन की विदेशी जमीन पर सेना भेजने से पीछे हट गया. अमेरिका और ब्रिटेन ने सीधे हमलों से इनकार किया. रियाद अकेला पड़ गया. यह अकेलापन सिर्फ सैन्य नहीं, रणनीतिक भी है.
सऊदी सरकार का विजन 2030
मोहम्मद बिन सलमान लंबे समय से एक बात समझ चुके हैं कि तेल हमेशा राजा नहीं रहेगा. विश्व की ऊर्जा मांग बदल रही है. नवीन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और जलवायु दबाव तेल के वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं. सऊदी सरकार का विजन 2030 इसी समझ का जवाब था. पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड सैकड़ों अरब डॉलर घरेलू अर्थव्यवस्था में लगा रहा है.
पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, विनिर्माण, स्वच्छ ऊर्जा और मनोरंजन को तेल के विकल्प के रूप में खड़ा किया जा रहा है. गैर-तेल राजस्व और गैर-तेल जीडीपी का हिस्सा बढ़ा है, लेकिन यह प्रयोग अधूरा है. इसे पूरा करने के लिए सऊदी को और पूंजी, तकनीक, पर्यटक, निवेशक और सुरक्षित व्यापार मार्ग चाहिए. युद्ध इन सबका दुश्मन है.
सऊदी के लिए दोहरी फांस
ईरान युद्ध के बाद खाड़ी की चिंता और गहरी हो गई है. यूएई, सऊदी और अन्य राज्य अब लंबे संघर्ष से निकलने की छटपटाहट में हैं. विश्व में व्यापार और टूरिज्म का केंद्र बन रहे इन देशों में ईरान युद्ध का साया इस तरह पड़ा है कि ये देश अपने भविष्य के बारे में सोचकर चिंतित हैं. यह चिंता लाजिमी भी है. क्योंकि होर्मुज बंद या बाधित रहे तो तेल का पैसा भी रुक जाता है. बाब अल-मंदेब बंद हो जाए तो लाल सागर वाला विकल्प भी खत्म. सऊदी के लिए यह दोहरी फांस है.
ऐसे में दुनिया से जुड़ने का रास्ता विचारधारा से नहीं, व्यावहारिकता से बनेगा. इजरायल से दोस्ती फिलहाल औपचारिक न हो, पर दुश्मनी बनाए रखना सऊदी के लिए महंगा पड़ रहा है. खुफिया सहयोग, समुद्री निगरानी और तकनीकी साझेदारी वही पुल हैं जो रियाद के लिए बेहद अहम हो गया है.
अब्राहम समझौते का सपना गाजा युद्ध के बाद ठंडा पड़ा था. फिलिस्तीनी राज्य की शर्त अब भी सऊदी की सार्वजनिक रेखा है. फिर भी जमीन पर समीकरण बदल रहे हैं. यूएई और बहरीन पहले ही इस रास्ते पर हैं. सऊदी चुपचाप उसी दिशा में खिसक रहा है, क्योंकि उसकी सबसे बड़ी परियोजनाएं स्थिरता मांगती हैं, नारे नहीं. नेओम, पर्यटन बूम, विदेशी निवेश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला किसी भी लंबे अरब-इजरायल टकराव को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं.
मक्का पैक्ट भी वजह
मक्का पैक्ट का नैतिक भार भारी है. पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी का रक्षा समझौता हमले को सामूहिक हमला मानता है. लेकिन पाकिस्तान की लाल रेखा साफ है.अपनी सीमा की रक्षा संभव है, यमन में लड़ना नहीं. इस्लामाबाद ईरान से भी रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहता. नतीजा यह कि इस्लामी एकजुटता का ढांचा तब ढीला पड़ जाता है जब तेल का रास्ता बंद होने लगे. धार्मिक-राजनीतिक भाईचारा तब तक चलता है जब तक अर्थव्यवस्था खतरे में न हो. खतरा आते ही यथार्थवाद आगे आ जाता है.
यह मोड़ भारत के लिए भी मायने रखता है. ऊर्जा सुरक्षा, लाल सागर-स्वेज मार्ग, और पश्चिम एशिया में संतुलन नई दिल्ली की चिंता है. सऊदी अगर इजरायल के साथ व्यावहारिक तालमेल बढ़ाता है तो क्षेत्रीय गलियारे चाहे व्यापार के हों या सुरक्षा के, नए रूप ले सकते हैं.
साथ ही जोखिम भी बढ़ेगा. हूती-ईरान धुरी इसे इस्लामी दुनिया के साथ विश्वासघात बताएगी. घरेलू सऊदी जनता में इजरायल विरोध अब भी गहरा है. इसलिए रियाद औपचारिक सामान्यीकरण की बजाय छाया सहयोग चुन रहा है.
हूतियों से डर गया सऊदी अरब?
सवाल यह नहीं कि सऊदी हूतियों से डर गया है या नहीं. सवाल यह है कि वह किस भविष्य के लिए लड़ रहा है. तेल पर टिकी रियासत अब निवेश, पर्यटन और तकनीक की रियासत बनना चाहती है. उस भविष्य में बाब अल-मंदेब बंद नहीं रह सकता, होर्मुज हमेशा तनाव में नहीं रह सकता, और इजरायल हमेशा दुश्मन की सूची में नहीं रह सकता.
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मदद की गुहार इसलिए सिर्फ मिसाइल और ड्रोन के खिलाफ नहीं है. यह उस दुनिया से जुड़ने की गुहार है जिसमें तेल का अंत निश्चित नहीं, लेकिन तेल की अकेली बादशाहत जरूर खत्म हो रही है.
खाड़ी अब पुराने नारों और नई जरूरतों के बीच फंसी है. सऊदी का कदम बताता है कि जरूरतें जीत रही हैं. जो इसे केवल हूती संकट समझेगा, वह अगले दशक का मध्य पूर्व नहीं समझ पाएगा.
संयम श्रीवास्तव