सऊदी अरब अमेरिकी सैन्य सहयोगी है, अरब दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक और रक्षा बजट के मामले में वैश्विक शीर्ष देशों में शामिल है. 2025 में इसका रक्षा खर्च लगभग 83 अरब डॉलर के आसपास था. अगस्त 2026 में पाकिस्तान और तुर्किए के साथ मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट (मक्का पैक्ट) पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें किसी एक पर हमले को तीनों पर हमला माना गया.
अक्टूबर 2026 में इसे सक्रिय किया गया और पाकिस्तानी-तुर्किए के सैनिकों की रैपिड डिप्लॉयमेंट की बात हुई. बावजूद इसके, ईरान-समर्थित हूती विद्रोही यमन के लाल सागर तट पर नियंत्रण हासिल कर चुके हैं, बाब अल-मंदेब पर प्रभाव डाल रहे हैं, सऊदी शहरों और तेल सुविधाओं पर हमले कर रहे हैं.
10 अक्टूबर 2026 को रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हुए हमले में 13 लोगों की मौत और 300 से अधिक घायल हुए हैं. यह एक दशक से अधिक समय में राज्य में सबसे घातक हमला था, जिससे उड़ानें निलंबित करनी पड़ीं. यह घटना सऊदी की वायु रक्षा की सीमाओं और राजधानी तक पहुंचने वाले खतरे की गंभीरता को उजागर करती हैं.
यमन संघर्ष 2015 से चल रहा है, जब सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हूतियों को सना (यमन की राजधानी) से पीछे धकेलने के लिए हस्तक्षेप किया. शुरुआती वायु अभियान में भारी नुकसान हुआ, पर निर्णायक जीत नहीं मिली. 2022 के ट्रूस के बाद अपेक्षाकृत शांति रही, लेकिन 2026 में क्षेत्रीय तनावों के बीच हूतियों ने आक्रामक रुख अपनाया. उन्होंने मोखा बंदरगाह और तटीय क्षेत्र पर कब्जा किया, सऊदी जहाजों पर नाकाबंदी की घोषणा की, पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन पर हमले किए और अब रियाद एयरपोर्ट तक पहुंच गए. सऊदी वायुसेना ने सैकड़ों हमले किए, पर जमीनी स्तर पर उसे कोई सफलता नहीं मिली. विशेषज्ञों के अनुसार सऊदी-समर्थित अरब वर्ल्ड आपसी अविश्वास से ग्रस्त हैं, और प्रभावी एकीकृत कमांड की कमी है. यूएई के पीछे हटने से यह समस्या और बढ़ी है.
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हूतियों के सामने सऊदी के कमजोर पड़ने के कई कारण हैं. यमन का पहाड़ी इलाका विद्रोहियों के अनुकूल है. हूती कबीलाई बंधुत्व और दशकों के युद्ध अनुभव से लैस हैं. वे प्रमुख क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखते हुए सऊदी को निरंतर सबक सिखाते रहते हैं. ईरानी समर्थन के चलते उन्होंने मिसाइल, ड्रोन और तकनीकी ज्ञान के अलावा स्थानीय उत्पादन क्षमता भी विकसित कर ली है. अमेरिकी और अन्य हवाई अभियानों के बावजूद उनकी क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. बमबारी से इनकी क्षमता घटाई जा सकती है, लेकिन जमीनी नियंत्रण या मिसाइल भंडार को स्थायी रूप से खत्म करना मुश्किल है. रियाद एयरपोर्ट पर सफल हमला इसी सीमा का प्रमाण है, जहां इंटरसेप्टर सिस्टम को भी हूती मिसाइलों ने धोखा दे दिया.
सऊदी सेना की अपनी कमजोरियां भी हैं. विशाल हथियार भंडार (एफ-15, पैट्रियट आदि) के बावजूद जटिल जमीनी अभियानों का सीमित अनुभव है. ऐतिहासिक रूप से विदेशी प्रशिक्षकों और ठेकेदारों पर उनकी निर्भरता रही है. ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि इंटरसेप्टर की कमी हैं, जिससे हमलों का मुकाबला करने में मुश्किल आ रही है. रणनीतिक बाधाएं भी सऊदी को कम जोर कर रही हैं. सऊदी की प्राथमिकता तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर पर्यटन और निवेश दुनिया भर का निवेश कराना है. लंबे युद्ध से आर्थिक नुकसान, तेल निर्यात बाधित और वैश्विक छवि प्रभावित होती है. जाहिर है कि एयरपोर्ट पर हमले ने पर्यटन और निवेश के माहौल को और प्रभावित किया है.
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अमेरिकी प्रशासन ने भी सऊदी का साथ देने से हाथ खींच लिया है. ट्रंप प्रशासन ने खुफिया और टारगेटिंग समर्थन दिया, लेकिन हूतियों पर बड़े हमलों से इनकार किया. अमेरिका-सऊदी संबंध अब लेन-देन पर अधिक आधारित है. मक्का पैक्ट का सक्रियता भी प्रतीकात्मक ही बनकर रह गया है. पाकिस्तान पहले से सऊदी में हजारों सैनिकों और वायु रक्षा सिस्टम के साथ मौजूद है. तुर्किए और पाकिस्तान का समर्थन मुख्य रूप से रक्षात्मक (वायु रक्षा, खुफिया) रहने की संभावना है, पूर्ण युद्ध में नहीं पड़ने से दोनों बच रहे हैं. रियाद एयरपोर्ट हमला पैक्ट के सक्रिय होने के कुछ ही दिनों बाद हुआ, जिससे इसकी व्यावहारिक प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
जाहिर है कि अगर ऐसा ही रहा तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सऊदी की स्थिति कमजोर पड़ने से कोई रोक नहीं पाएगा. अमेरिका की सुरक्षा गारंटी न मिलने से पूरी दुनिया का भरोसा सऊदी पर कमजोर होगा. तेल निर्यात मार्गों (हॉर्मुज और बाब अल-मंदेब) पर खतरा वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर रहा है. जाहिर है इसका प्रभाव सऊदी पर भी पड़ा है. रियाद एयरपोर्ट हमले ने राजधानी की असुरक्षा को दुनियाभर के सामने खोल कर रख दिया है.
क्षेत्रीय रूप से यूएई से दूरी और अन्य सहयोगियों की सीमित भागीदारी से सऊदी अकेला पड़ता दिख रहा है. फिर भी सऊदी पेट्रो डॉलर, पवित्र स्थलों का संरक्षक और राजनयिक प्रभाव रखता है. यह नए साझेदारों की तलाश कर रहा है. दीर्घकाल में सफलता यमनी सहयोगियों को मजबूत करने, स्थानीय समाधान और ईरान के साथ संतुलित कूटनीति पर निर्भर करेगी.
यदि सऊदी ऐसा नहीं कर पाता है और हूती इसी तरह नियंत्रण बढ़ाते रहे और रियाद जैसे शहरों पर हमले जारी रहे, तो सऊदी की क्षेत्रीय भूमिका और कमजोर होगी. शक्ति भंडार और गठबंधन कागजी ताकत से अधिक जमीनी प्रभावशीलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करते हैं. 10 अक्टूबर का एयरपोर्ट हमला यह याद दिलाता है कि आधुनिक हथियार और नए गठबंधन असीमित चुनौतियों को हमेशा हल नहीं कर पाते.
संयम श्रीवास्तव