आजादी के 80 साल: भारत में धर्म-संकट और संभावना

भारत के स्वतंत्रता के बाद से धर्म एक जटिल और संवेदनशील विषय रहा है, जिसने देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान को गहराई से प्रभावित किया है. संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को अपनाया, लेकिन भारत की बहुधार्मिक विविधता ने इसे एक चुनौतीपूर्ण मुद्दा बना दिया है.

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धर्म को केवल समस्या के रूप में देखना भी भारत की अधूरी तस्वीर बनाता है (फोटो- ITG) धर्म को केवल समस्या के रूप में देखना भी भारत की अधूरी तस्वीर बनाता है (फोटो- ITG)

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:33 AM IST

भारत जब 1947 को आजाद हुआ, तो यह सिर्फ एक देश की आजादी नहीं थी, बल्कि इसके साथ पाकिस्तान के रूप में एक नए देश का जन्म भी हुआ. 

भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म (Religion) के आधार पर हुआ. पाकिस्तान ने अपनी इस्लामी पहचान का झंडा खुलेआम बुलंद किया, लेकिन आजाद हुए भारत के सामने एक बुनियादी सवाल था कि इस बंटे-बचे हुए भू-भाग वाले देश में 'धर्म' की जगह क्या होगी?

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तकरीबन आठ दशक के इस सफर में यह सवाल कभी बेहद जटिल तो कभी उलझे तरीके से सामने आता रहा है, लेकिन पूरी तरह सुलझा कभी भी नहीं. आजाद भारत ने अपने प्रसिद्ध पर्यायवाची नाम हिंदुस्तान को अपनाया जरूर, लेकिन इस नाम को कभी भी धार्मिक पहचान का आधार नहीं बनाया. 

क्योंकि, पाकिस्तान के अलग हो जाने के बाद भी भारत कई तरह के दर्शनों, मान्यताओं, पंथ और संप्रदाय की पहचान को खुद में संजोये रखने वाला देश बना. इन तमाम अलग-अलग पंथों और मान्यताओं ने भारत को धार्मिक आधार पर अधिक समृद्ध और विविधता से भरा बनाया, साथ ही इसकी 'वसुधैव कुटुंबकम' वाली भावना को भी जिंदा रखा है. 

इसलिए आजादी के 80वें वर्ष में भारत में 'धर्म' की स्थिति को केवल इस सवाल से नहीं समझा जा सकता कि देश धार्मिक हुआ है या धर्मनिरपेक्ष. असल प्रश्न यह है कि भारत में धर्म का जैसा स्वरूप अभी दिखाई दे रहा है, वह भारतीय समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति बना रहेगा या राजनीतिक-सामाजिक पहचान की ऐसी दीवार बन जाएगा, जिसके आर-पार संवाद लगातार कठिन होता जाए.

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इस सवाल के साथ एक बार फिर 80 साल पीछे ही लौटते हैं. भारत का संविधान गढ़ने वाले लोगों ने बंटवारे का स्पष्ट बैकग्राउंड 'रिलीजन' होने के बावजूद भारत को किसी एक धर्म का राष्ट्र घोषित नहीं किया. संविधान के आर्टिकल 25 से 28 तक नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अधिकार दिए गए. आर्टिकल 25 अंतरात्मा की स्वतंत्रता के साथ धर्म को मानने, उसे व्यवहार में अपनाने और प्रचार करने की आजादी देता है.

धार्मिक आजादी के इस उहापोह में तकरीबन 25 साल बीत गए और साल 1976 में संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द को जोड़ा गया, लेकिन धर्म के आधार पर राज्य की निष्पक्षता और नागरिकों की समानता का आधार संविधान के मूल ढांचे में पहले से मौजूद था.

यहां सेक्युलर शब्द का जिक्र करते हुए ये बताना जरूरी हो जाता है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिम के कई देशों के मॉडलों से बेहद अलग रही. यहां राज्य और धर्म के बीच पूरी तरह दीवार नहीं खड़ी की गई. राज्य धार्मिक संस्थाओं से जुड़े कानून बनाता है, धार्मिक ट्रस्टों और संस्थाओं के प्रशासन में भूमिका निभाता है और अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) को भी सम्मान देता है.

यानी भारत ने धर्म को सार्वजनिक जीवन से बाहर करने के बजाय बहुधार्मिक समाज में समान नागरिकता स्थापित करने का रास्ता चुना. यही भारत की खूबी रही. इस खूबी के बावजूद भारत में 'धर्म' को लेकर कुछ 'संकट' भी हैं.

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सही मायने में तो धर्म किसी पूजा-पद्धति से जुड़ा हुआ नहीं है. धर्म ईश्वर में आस्था रखने और उससे जुड़े त्योहार-संस्कार मनाने का भी नाम नहीं है. फिर भी धर्म की पहचान परिवार, पर्व परंपरा, विवाह, जन्म और मृत्यु के संस्कार, भोजन, संगीत, स्थापत्य, तीर्थ, लोककला के आधार पर की जाती है.

इन 80 सालों में धर्म से जुड़ा सबसे बड़ा संकट यही है कि अव्वल तो हम यह नहीं सीख पाए हैं कि धर्म, कर्म का ही दूसरा नाम है. गीता भी कर्म को ही धर्म बताती है. वेद और उपनिषद में भी धर्म की व्याख्या 'मानवीय संदेश' के तौर पर की गई है. कहीं इसके सात, कहीं 10 तो कहीं-कहीं इसके 14 प्रकार बताए गए हैं, लेकिन धर्म की मूल भावना कर्म करना, क्षमा करना, दया करना और हिंसा से दूर रहना ही बताया गया है.
फिर अलग-अलग जिम्मेदारियों के निभाने को भी धर्म का नाम दिया गया. पिता का धर्म अलग, बेटे का धर्म अलग, गुरु और राजा का धर्म अलग तो वहीं व्यापारी-मजदूर, छात्र, अतिथि सभी का धर्म अलग-अलग है. 

विडंबना भी है और सबसे बड़ा संकट भी कि धार्मिक होने का दावा करने के बावजूद एक समाज के तौर पर हम इसे ही पहचानने में फेल रहे हैं. इसीलिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने एक भाषण में कहा था कि 'धर्म से तो कोई निरपेक्ष हो ही नहीं सकता, क्या कोई धर्म से अलग होकर अधर्म के साथ रहेगा? वह जोड़ते हैं कि लोग अलग-अलग पंथ को जरूर मान सकते हैं, लेकिन धर्म से अलग होकर नहीं.'

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इसलिए आज गंगा आरती, अजमेर की दरगाह पर चादरपोशी, गुरुद्वारा साहिब का लंगर, क्रिसमस का झांकियां या किसी सुदूर गांव में शिवरात्रि पर लगा कोई मेला, ये केवल धार्मिक क्रियाएं नहीं, बल्कि हमारी पंथ वाली मान्यता और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा भी हैं. यही कारण है कि भारत में धार्मिक पहचानें कई बार स्पष्ट सीमाओं में बंटी हुई दिखती हैं, लेकिन जमीन पर परंपराएं एक-दूसरे से संवाद भी करती रही हैं. भक्ति और सूफी परंपरा ने भाषा, संगीत और लोकजीवन में ऐसा साझा संसार रचा है, जिन्हें किसी एक धर्म की सीमा में बांधना मुश्किल है.

फिर भी 'धर्म' अक्सर ही राजनीति के साथ जुड़कर सामाजिकता के लिए संकट बनता रहा है. आजाद भारत में धर्म और राजनीति का रिश्ता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ. शाहबानो केस, राम जन्मभूमि आंदोलन, 1992 में का ढांचा विध्वंस से लेकर गोधरा और गुजरात, फिर अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा तक ये सभी घटनाएं बताती हैं कि 'धर्म' भारतीय राजनीति के केंद्र में बार-बार लौटता रहा है.

फिर भी इन तमाम अलग-अलग नजरिये के बीच मूल प्रश्न यही है कि क्या बहुसंख्यक समाज अपनी धार्मिक और सभ्यतागत पहचान को सार्वजनिक रूप से जताते हुए भी राज्य की नजर में हर नागरिक की समानता को सिद्ध कर सकता है? यही सवाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा है और इसी में भारत की आत्मा में बसे धर्म की सकारात्मक संभावना भी छिपी हुई है.
जिसमें धर्म और राष्ट्रीय पहचान का संबंध एक साथ, एक लाइन में आते हैं.

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एक विचार भारत को हिंदू सभ्यता से बने राष्ट्र के रूप में देखता है, जिसमें दूसरे धार्मिक समुदाय भी सम्मानपूर्वक रहते हैं. दूसरा विचार भारत को संवैधानिक राष्ट्र के रूप में देखता है, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी और किसी धर्म को न मानने वाला कोई व्यक्ति भी अपनी पूरी गरिमा के साथ इस देश की पहचान को सीने से चिपकाए हुए जीता-मरता है. इन दोनों विचारों के बीच तनाव भले ही बना रहे, लेकिन इसे न तो नकारा जा सकता है, न ही भुलाया जा सकता है और भुलाया जाने चाहिए भी नहीं.

क्योंकि धर्म को केवल समस्या के रूप में देखना भी भारत की अधूरी तस्वीर बनाता है. बहुत से लोगों के लिए धर्म आशा, अनुशासन, नैतिकता और सेवा का जरिया है. गुरुद्वारों का लंगर, मंदिरों के अन्नक्षेत्र, धार्मिक संस्थाओं से चल रहे स्कूल-अस्पताल, आपदाओं में राहत कार्य ये बताते हैं कि धर्म का एक बड़ा चेहरा सामाजिक सेवा का भी है.

भारत की धार्मिक विरासत के भीतर संवाद और आत्म आलोचना की गहरी परंपराएं मौजूद हैं. बुद्ध की करुणा, महावीर की अहिंसा, गुरु नानक की समानता, कबीर का पाखंड विरोध, सूफी प्रेम,  कश्मीर के शैवों से लेकर दक्षिण के आलवार और नयमार भक्ति संतों के भजन फिर आखिरी में महात्मा गांधी की समदृष्टि इस विरासत के अलग-अलग रूप हैं.

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इसलिए धर्म की तमाम परतें हटाकर उसके भीतर रचे-बसे समाधान और संवाद की धाराओं को ऊपर लाने की कोशिश करनी चाहिए. इसे मंदिरों- मस्जिदों या चर्चों-गुरुद्वारों की बढ़ती-गिनती संख्या से नहीं नापना चाहिए, बल्कि इस संभावना के साथ देखना चाहिए कि यही वह तत्व है जो ऐसा समाज बना सकता है जहां आस्था गहरी हो, लेकिन पहचान की दीवारें आड़े न आती हों. बहुसंख्यक अपनी परंपरा पर गर्व करता हो तो अल्पसंख्यक को भी अपने मत के साथ उसी मजबूती के साथ खड़ा हो. जहां दूसरे की मान्यता और पंथ का सम्मान केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं हो, बल्कि भारतीय होने की, भारतीयता के धर्म की शर्त बन जाए. यही 'वसुधैव कुटुंबकम्' है, यही धर्म है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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