INDIA ब्लॉक की 8 जून को मीटिंग होने जा रही है. खास बात यह है कि मीटिंग में डीएमके का कोई प्रतिनिधि भी नहीं होगा, और उससे भी विशेष बात यह है कि ममता बनर्जी खुद भी शामिल हो सकती हैं. पश्चिम बंगाल की हार के बाद से ही ममता बनर्जी इंडिया ब्लॉक में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी दिखा रही हैं, और प्रस्तावित बैठक के लिए भी उनका उत्साह देखते बन रहा है.
कांग्रेस के साथ अब तक इंडिया ब्लॉक की सबसे मजबूत पार्टनर रही डीएमके ने आगामी बैठक में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है. डीएमके की तरफ से यहां तक कह दिया गया है कि पार्टी आगे से वैसी किसी भी बैठक में शामिल नहीं होने जा रही है, जिसमें कांग्रेस की मौजूदगी होगी.
डीएमके असल में थलपति विजय को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने में कांग्रेस के आगे बढ़कर भूमिका निभाने से नाराज है. कांग्रेस के विजय की पार्टी टीवीके को सपोर्ट देने को डीएमके ने धोखा करार दिया है. डीएमके ने कांग्रेस के धोखे को अपने कार्यकर्ताओं के सम्मान का अपमान बताया है.
सत्ता समीकरण और तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में एमके स्टालिन भले ही पीछे छूट गए हों, लेकिन अभी तक राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं. यह ठीक है कि ममता बनर्जी कांग्रेस के करीब आ गई हैं, लेकिन स्टालिन का राहुल गांधी से दूर होना भी नए राजनीतिक समीकरणों के संकेत देता है - और ये सब कांग्रेस के लिए काफी महंगा साबित हो सकता है.
अच्छे दोस्त बने जानी दुश्मन
डीएमके और कांग्रेस इस बार भी तमिलनाडु विधानसभा का चुनाव साथ लड़े थे. जब टीवीके की सीटें ज्यादा आ गईं तो कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़ दिया. सी. जोसेफ विजय के शपथग्रहण में भी पहुंचे थे, और वायरल वीडियो में दोनों की केमिस्ट्री ने भी लोगों का ध्यान खींचा. राहुल गांधी और स्टालिन का कभी ऐसा ही या इससे बढ़कर रिश्ता हुआ करता था. लेकिन, नए समीकरण में ये गुजरे जमाने की बातें हो चुकी हैं.
विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद 8 मई को ही डीएमके ने लोकसभा में अपने सांसदों के बैठने की व्यवस्था को बदलने की मांग की थी. डीएमके ने कहा था कि कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन पूरी तरह खत्म हो चुका है, और ऐसी सूरत में डीएमके सांसदों का कांग्रेस सदस्यों के साथ बैठना बिल्कुल भी ठीक नहीं है. डीएमके की तरफ से कनिमोझी ने सीटिंग अरेंजमेंट बदलने के लिए पत्र लिखा था. सूत्रों के अनुसार, संसदीय कार्य मंत्रालय ने डीएमके की डिमांड वाला पत्र लोकसभा स्पीकर के पास भेज दिया है.
देखा जाए तो इंडिया ब्लॉक पर सबसे ज्यादा असर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव नतीजों का ही हुआ है. सुनने में आया है कि डीएमके की जगह तमिलनाडु से मुख्यमंत्री विजय की पार्टी टीवीके को साथ लेने की कोशिश हो रही है. आम आदमी पार्टी ने तो पहले ही सार्वजनिक रूप से विपक्षी गठबंधन से दूरी बना ली थी, ऐसे में उसके भी बैठक में शामिल होने की संभावना नहीं है.
डीएमके की तरफ से बताया गया है कि उसे दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में होने वाली बैठक में शामिल होने का भी न्योता मिला है, लेकिन पार्टी ने बैठक का बहिष्कार करने का फैसला किया है. और, सिर्फ इसी बैठक का नहीं, बल्कि जहां भी कांग्रेस होगी, डीएमके वहां कदम नहीं रखेगी.
डीएमके मुख्यालय से जारी एक बयान में कहा गया है, 'कांग्रेस के धोखे से डीएमके के कार्यकर्ताओं की भावनाएं बुरी तरह आहत हुई हैं. उनकी भावनाओं का आदर करते हुए पार्टी 8 जून को नई दिल्ली में होने वाली इंडिया ब्लॉक की बैठक में हिस्सा नहीं लेगी. डीएमके उस किसी भी बैठक में शामिल नहीं होगी, जिसमें कांग्रेस पार्टी भाग ले रही होगी.'
कांग्रेस के पाला बदल लेने को डीएमके ने 'पीठ में छुरा घोंपना' और 'विश्वासघात' करार दिया है, जबकि कांग्रेस ने अपने फैसले को पूरी तरह सही ठहराया है. डीएमके गठबंधन के साथ चुनाव लड़ी कांग्रेस को तमिलनाडु में पांच सीटें मिली हैं.
द्रमुक युवा विंग के प्रमुख उदयनिधि स्टालिन ने कहा था कि कांग्रेस ने सत्ता के लिए बिना किसी शिष्टाचार के गठबंधन तोड़ दिया, और डीएमके कार्यकर्ताओं के खून-पसीने की मेहनत का अपमान किया. उदयनिधि स्टालिन ने कहा था, मैं पहले सोचता था कि बीजेपी की लगातार जीत के पीछे नरेंद्र मोदी और अमित शाह हैं, लेकिन अब साफ हुआ है कि असली वजह कांग्रेस है.
यह एमके स्टालिन ही हैं, जो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के कांग्रेस के दावे को लगातार सपोर्ट करते रहे हैं. 2024 से पहले एमके स्टालिन ने ही कन्याकुमारी से राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा शुरू कराई थी. ममता बनर्जी ने तो राहुल गांधी की न्याय यात्रा के बंगाल में दाखिल होने के ठीक पहले इंडिया ब्लॉक से अलग चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था.
खबर आ रही है कि केंद्र की बीजेपी सरकार महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन विधेयक के साथ साथ 'वन नेशन वन इलेक्शन' बिल पास कराने की जोरदार कोशिश कर रही है. टीएमसी में टूट के बाद बीजेपी की उम्मीदें बढ़ी हैं, और डीएमके से भी सपोर्ट की उम्मीद है. जरूरी नहीं कि स्टालिन सीधे सीधे बीजेपी के साथ चले जाएं. संभव है स्टालिन वैसा स्टैंड लें जैसे नवीन पटनायक और जगनमोहन रेड्डी मुख्यमंत्री रहते अलग रहकर बीजेपी सरकार को समर्थन दे ही रहे थे.
ममता बनर्जी का कांग्रेस के साथ आना
इंडिया ब्लॉक के साथ होना ममता बनर्जी की मजबूरी है. अगर पश्चिम बंगाल का चुनाव जीत गई होतीं, तो खुद नेता पद के लिए दावेदारी करतीं, या अभिषेक बनर्जी को नेता बनाने की डिमांड करतीं. चुनावों के पहले से ही ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को दिल्ली में स्थापित करने की कोशिश शुरू कर दी थी, लेकिन चुनाव आने पर काम के लिए साथ लेना पड़ा. और, अब तो यही लग रहा है कि टीएमसी में मचे बवंडर का क्रेडिट अभिषेक बनर्जी को ही जाता है.
वैसे डीएमके ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए वो उन सभी गैर-कांग्रेसी दलों को समर्थन देती रहेगी जो देश के अहम मुद्दे उठाएंगे. आम आदमी पार्टी का भी ऐसा ही स्टैंड रहा है. बीते दिनों की बात करें तो इंडिया ब्लॉक को लेकर ममता बनर्जी का स्टैंड अपने हितों के हिसाब से अक्सर बदलता रहा है.
स्टालिन का गुस्सा स्वाभाविक है. रिश्ता निभाने के मामले में भी स्टालिन और ममता बनर्जी में बहुत बड़ा फर्क है. ममता बनर्जी कब किस बात पर नाराज होकर रिश्ता तोड़ देंगी, कोई नहीं कह सकता. स्टालिन के साथ, कम से कम राहुल गांधी के मामले में तो अब तक ऐसा नहीं लगा है.
ममता बनर्जी विपक्ष की आक्रामक आवाज हैं, जो राहुल गांधी को काफी पसंद आता है. राहुल गांधी कांग्रेस में भी ऐसे नेताओं को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री अमित शाह के खिलाफ उनकी ही तरह लगतार हमलावर रहते हैं. ऐसे नेताओं में एक नाम पवन खेड़ा का भी है, जिनको राज्यसभा का टिकट दिया जाना उनकी 'तपस्या' पूरी मान लेने जैसा लगता है.
एमके स्टालिन को राहुल गांधी लंबे वक्त तक आजमा चुके हैं. कांग्रेस ने आजमाया तो ममता बनर्जी को भी है. यह ममता बनर्जी ही हैं जिन्होंने बंगाल में कांग्रेस को नेस्तनाबूद कर दिया है. जब तक ताकतवर थीं, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा रखा था. बदले राजनीतिक हालात में भी ममता बनर्जी कब तक कांग्रेस के साथ रहेंगी, किसी मालूम है.
मृगांक शेखर