प्रशांत किशोर के बांकीपुर उपचुनाव जीतने से बिहार विधानसभा में क्या बदल जाएगा

प्रशांत किशोर की बांकीपुर से जीत सिर्फ एक उपचुनाव का नतीजा नहीं है. अब तक प्रशांत किशोर बाहर खड़े होकर सत्ता और विपक्ष, दोनों पर हमला करते थे. अब वो एनकाउंटर सदन के भीतर देखने को मिलेगा. पीके सिर्फ सम्राट चौधरी ही नहीं, तेजस्वी यादव के लिए भी सिरदर्द होने जा रहे हैं.

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बिहार विधानसभा में एंट्री लेने जा रहे प्रशांत किशोर को अपनी पार्टी का एजेंडा बढ़ाने के लिए जिस मौके की उम्मीद थी, वो मिल गया. (फोटो- PTI) बिहार विधानसभा में एंट्री लेने जा रहे प्रशांत किशोर को अपनी पार्टी का एजेंडा बढ़ाने के लिए जिस मौके की उम्मीद थी, वो मिल गया. (फोटो- PTI)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 03 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 5:10 PM IST

बिहार विधानसभा में अब तक तीन ऐसे विधायक थे, जो अपनी-अपनी पार्टियों के इकलौते नुमाइंदे थे. अब उनमें प्रशांत किशोर का नाम और जुड़ गया है. बांकीपुर उपचुनाव जीतने के बाद वे जब बिहार विधानसभा में एंट्री लेने जा रहे हैं, तो उनके सामने कई अवसर हैं और कुछ चुनौतियां भी. लेकिन, चुनाव रुझान अपने पक्ष में आने के बाद उन्होंने पहले बयान में अपना एजेंडा तय कर दिया है. प्रशांत किशोर कह रहे हैं-

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"सम्राट चौधरी का जो चाल-चरित्र-चेहरा है, वह पब्लिक डोमेन में है. यदि आप किसी अपराधी को बिहार का राजा बनाएंगे, तो बिहार की तरक्की नहीं हो सकती है. तो हम लोगों की लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं है. बहुमत भाजपा का है, एनडीए का है तो मुख्यमंत्री तो उन्हीं का बनेगा. हम लोग यही आग्रह कर रहे हैं, बिहार की जनता यही आग्रह कर रही है, बांकीपुर की जनता यही आग्रह कर रही है, मोदी जी से इतना ही आग्रह कर रही है कि किसी अच्छे, चरित्रवान और काबिल आदमी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाइये. ताकि हम लोगों को भी गौरव हो, बिहार के लोगों को भी गौरव हो. और यह सुनिश्चित हो कि पढ़ाई और रोजगार की सुविधा मिले. सिर्फ गुजरात के लोगों को ये फायदा न मिले. और यहां से होने वाला पलायन रुके."

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प्रशांत किशोर ने अपने उसी एजेंडे पर आगे बढ़ने का संकेत दिया है, जिस पर वे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले अग्रसर थे. प्रशांत किशोर ने शिक्षा, रोजगार, पलायन, भ्रष्टाचार और राजनीतिक सुधार जैसे मुद्दों पर लंबा अभियान चलाया. उन्होंने दावा किया था कि बिहार की राजनीति को जाति के पुराने घेरे से निकालकर विकास और सुशासन की बहस पर लाएंगे. लेकिन चुनाव नतीजे उनके दावों के उलट निकले. जनसुराज को एक भी सीट नहीं मिली और एनडीए सत्ता में लौट आया.

सिर्फ नौ महीने बाद तस्वीर बदल चुकी है. मुख्यमंत्री अब नीतीश कुमार नहीं हैं. उनकी जगह सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री हैं. यही सम्राट चौधरी, जिनकी शैक्षणिक योग्यता और पुराने आपराधिक मामलों को लेकर चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर लगातार सवाल उठाते रहे थे. अब दोनों पहली बार विधानसभा के भीतर आमने-सामने होंगे. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले पीके प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछते थे, अब सदन के रिकॉर्ड में सवाल दर्ज होंगे.

बांकीपुर उपचुनाव ने यह भी दिखाया कि मतदाता कभी-कभी मुख्य चुनाव और उपचुनाव में अलग तरह से सोचता है. इस बार उसने सत्ता और मुख्य विपक्ष, दोनों को संदेश दिया. भाजपा अपनी सबसे प्रतिष्ठित सीट नहीं बचा सकी. यह वही सीट थी जो राज्यसभा जाने के बाद नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई थी. भाजपा के लिए यह सिर्फ एक सीट नहीं, प्रतिष्ठा का सवाल था.

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लेकिन चुनाव के दौरान भाजपा से कई ऐसी राजनीतिक गलतियां हुईं, जो अक्सर हार की वजह बनती हैं. उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष सामने आया. फिर यह भरोसा कि बांकीपुर भाजपा का अभेद्य गढ़ है. और आखिर में वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद का यह बयान कि भाजपा यहां "कुत्ता-बिल्ली को भी टिकट दे दे तो जीत जाएगा." राजनीति में कई बार विपक्ष नहीं, अपना अहंकार चुनाव हराता है. बांकीपुर में यही हुआ.

लेकिन सिर्फ भाजपा की हार से प्रशांत किशोर की जीत को नहीं समझा जा सकता. इस चुनाव ने उनकी अपनी राजनीति की एक कमजोरी भी दूर कर दी. 2025 के विधानसभा चुनाव में वे खुद मैदान में नहीं उतरे थे. बहुत से मतदाताओं को लगा कि जो नेता खुद चुनाव लड़ने का जोखिम नहीं उठा रहा, उसकी पार्टी पर भरोसा क्यों किया जाए. इस बार उन्होंने खुद चुनाव लड़ा, खुद प्रचार किया और खुद जीते. इससे जनसुराज की राजनीति को पहली बार एक निर्वाचित चेहरा मिला.

यही वजह है कि अब विधानसभा में उनकी मौजूदगी का असर उनकी संख्या से कहीं बड़ा होगा.

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में जनसुराज का सिर्फ एक विधायक होगा. नियमों के हिसाब से उन्हें उतना समय नहीं मिलेगा जितना भाजपा, राजद या जदयू को मिलता है. न ही उनके पास किसी बड़े दल जैसी संसदीय ताकत होगी. लेकिन लोकतंत्र में कई बार संख्या से ज्यादा महत्व उस व्यक्ति का होता है, जो बहस का विषय बदल दे.

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प्रशांत किशोर के साथ यही संभावना जुड़ी हुई है.

अब तक बिहार विधानसभा की बहसें अक्सर आरोप-प्रत्यारोप, जातीय समीकरण और राजनीतिक कटाक्ष के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं. प्रशांत किशोर की पूरी राजनीतिक पहचान डेटा आधारित दावों और प्रशासनिक प्रदर्शन की तुलना पर बनी है. चुनावी रणनीतिकार के रूप में उन्होंने अलग-अलग राज्यों में चुनाव लड़ाए हैं. सरकारी योजनाओं के असर, सामाजिक संकेतकों और चुनावी व्यवहार का वर्षों तक अध्ययन किया है. इसलिए संभावना है कि वे सदन में सिर्फ नारे नहीं, आंकड़े भी लेकर आएंगे.

यही बात सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है.

मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी को अब सिर्फ राजनीतिक भाषण नहीं देने होंगे. उन्हें हर उस सवाल का जवाब देना पड़ेगा जिसे लेकर प्रशांत किशोर पिछले कई वर्षों से अभियान चलाते रहे हैं. चाहे सरकारी स्कूलों की हालत हो, स्वास्थ्य सेवाएं हों, पलायन का मुद्दा हो, शराबबंदी की सफलता-असफलता हो या पंचायत स्तर तक सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन. पीके इन मुद्दों पर लगातार फील्ड सर्वे और आंकड़ों का हवाला देते रहे हैं. सदन में यदि यही शैली जारी रहती है तो सरकार को पारंपरिक राजनीतिक जवाबों से ज्यादा तैयारी करनी पड़ेगी.

लेकिन पीके सिर्फ सत्ता पक्ष के लिए मुश्किल नहीं बनने वाले हैं. तेजस्वी यादव के लिए भी उनकी मौजूदगी कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगी.

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पिछले कुछ वर्षों में बिहार में सरकार विरोधी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा तेजस्वी यादव रहे हैं. अगर विधानसभा में सरकार पर हमला करने वाले एक और प्रभावी वक्ता मौजूद होंगे तो विपक्ष के भीतर भी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी. मीडिया की नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार को ज्यादा असहज कौन कर रहा है. तेजस्वी या प्रशांत किशोर.

दोनों की राजनीति का आधार भी अलग है.

तेजस्वी यादव सामाजिक न्याय की राजनीति की विरासत लेकर चलते हैं. उनका बड़ा आधार यादव-मुस्लिम और महागठबंधन का पारंपरिक वोट बैंक है. दूसरी तरफ प्रशांत किशोर खुद को जातीय राजनीति से ऊपर विकास आधारित राजनीति का चेहरा बताने की कोशिश करते रहे हैं. वे बिहार की पूरी राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देने का दावा करते हैं, सिर्फ सरकार को नहीं.

यही वजह है कि विधानसभा में सरकार पर हमला करते समय कई बार उनका निशाना राजद भी होगा. वे यह सवाल भी उठा सकते हैं कि जिन समस्याओं की चर्चा आज हो रही है, उनमें पंद्रह साल के राजद शासन की क्या भूमिका थी. यानी सरकार और विपक्ष, दोनों को एक साथ कठघरे में खड़ा करने की उनकी पुरानी शैली अब सदन के भीतर भी दिखाई दे सकती है.

इसी कारण आने वाले महीनों में बिहार विधानसभा में एक दिलचस्प त्रिकोण बन सकता है. एक तरफ सरकार के नेता सम्राट चौधरी होंगे. दूसरी तरफ मुख्य विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव. और इनके बीच एक ऐसा विधायक, जो संख्या में अकेला है लेकिन राजनीतिक विमर्श में लगातार जगह बनाने की कोशिश करेगा.

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हालांकि प्रशांत किशोर के सामने चुनौती भी कम नहीं है.

अब तक वे रणनीतिकार थे. चुनाव जीतने और हराने का विश्लेषण करते थे. बाहर से सरकारों की आलोचना करना अपेक्षाकृत आसान होता है. लेकिन विधायक बनने के बाद राजनीति का पैमाना बदल जाता है.

अब बांकीपुर के लोग उनसे सड़क, नाली, बिजली, जलजमाव, पुलिस, अस्पताल और स्थानीय विकास जैसे रोजमर्रा के सवाल पूछेंगे. विधानसभा में उनकी हर बात को उनके अपने क्षेत्र के काम से जोड़कर देखा जाएगा. अब वे सिर्फ यह नहीं कह सकते कि व्यवस्था खराब है. उन्हें यह भी दिखाना होगा कि एक विधायक के तौर पर व्यवस्था में सुधार के लिए उन्होंने क्या किया.

यही उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी.

अगर वे सदन में तथ्यों के साथ सरकार को घेरते हैं, अपने क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं और विधानसभा की बहसों का स्तर बदलने में सफल होते हैं, तो जनसुराज को पहली बार एक गंभीर राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन अगर उनकी राजनीति सिर्फ सुर्खियों और बयानों तक सीमित रह गई, तो यही कहा जाएगा कि एक सफल चुनावी रणनीतिकार अच्छा विधायक नहीं बन पाया.

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