साल 2015 की बात है. मिडिल-ईस्ट की सियासत में एक नया नाम तेजी से उभर रहा था- मोहम्मद बिन सलमान (MBS). उम्र महज 29 साल, लेकिन इरादे आसमान छूते हुए. रक्षा मंत्री का ओहदा संभालते ही उन्होंने एक ऐसा साहसी और आक्रामक कदम उठाया, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया. उन्होंने यमन में हूती लड़ाकों के खिलाफ 'ऑपरेशन डिसाइसिव स्टॉर्म' (Operation Decisive Storm) का ऐलान कर दिया. मकसद साफ था- यमन में अपना दबदबा बनाना, ईरान के बढ़ते असर को रोकना और खुद को सऊदी शाही परिवार व मुस्लिम उम्मा के एक मजबूत, निडर रहनुमा के तौर पर पेश करना.
यमन की यही जंग मोहम्मद बिन सलमान की सत्ता पर मजबूत पकड़ का जरिया बनी. लेकिन आज, लगभग एक दशक बाद, वक्त ने ऐसा पासा पलटा है कि जिस यमन से MBS के एकछत्र राज का आगाज हुआ था, वही यमन आज उनकी पूरी रियासत, इकोनॉमिक ड्रीम और शाही हैसियत के लिए सबसे बड़ा नासूर बन चुका है. जिस यमन को वे हफ्ते-दो हफ्ते का खेल समझ रहे थे, आज वही दलदल बनकर सऊदी सत्ता को लाचार और बेबस खड़ा देख रहा है.
महत्वाकांक्षी शुरुआत: यमन पर हमला और सत्ता की सीढ़ियां
मोहम्मद बिन सलमान को हमेशा एक ऐसे हुक्मरान के रूप में देखा गया, जो हर चीज़ बहुत जल्द हासिल कर लेना चाहते हैं. जब 2015 में उनके पिता शाह सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ सऊदी अरब के बादशाह बने, तो MBS ने सत्ता के गलियारों में तेजी से कदम बढ़ाना शुरू कर दिया. रक्षा मंत्री बनते ही उन्होंने पुरानी, सुस्त सऊदी विदेश नीति को दरकिनार कर एक आक्रामक मिलिट्री पॉलिसी अपनाई.
यमन में जब हूती लड़ाकों ने राजधानी सना पर कब्जा जमाया और राष्ट्रपति हादी को भागने पर मजबूर कर दिया, तो MBS ने इसे एक मौके की तरह देखा. उन्होंने यमन पर हमले का हुक्म दिया. सऊदी अवाम में देशभक्ति का जज्बा जगाने और शाही परिवार के भीतर अपने विरोधियों को पछाड़कर क्राउन प्रिंस की गद्दी तक पहुंचने के लिए यह दांव बेहद कारगर साबित हुआ.
इस एक फैसले ने उन्हें रातों-रात एक ताकतवर लीडर के रूप में स्थापित कर दिया. विश्लेषकों का मानना है कि यमन युद्ध के जरिए ही उन्होंने अल-सऊद खानदान में अपना वर्चस्व कायम किया और अपने प्रतिद्वंद्वी मोहम्मद बिन नायफ जैसे वरिष्ठ राजकुमारों को दरकिनार कर 2017 में क्राउन प्रिंस का ताज पहन लिया.
दोहरी शख्सियत: क्रूर हुक्मरान और संवेदनशील रिफॉर्मर
मोहम्मद बिन सलमान की शख्सियत हमेशा दो अलग-अलग पहलुओं की नुमाइश करती रही है. एक तरफ उन्हें बेहद क्रूर, अड़ियल और निरंकुश शासक माना गया, तो दूसरी तरफ एक ऐसा संवेदनशील रिफॉर्मर, जो सऊदी समाज को सदियों पुरानी रूढ़िवादिता से निकालकर मॉडर्न दौर में लाना चाहता है.
शाही परिवार के भीतर बगावत की हर गुंजाइश खत्म करने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. रियाद के मशहूर 'रिट्ज़-कार्लटन' होटल में सैकड़ों अमीर शहजादों, मंत्रियों और कारोबारियों को कैद कर उनसे अरबों डॉलर वसूलना हो, या फिर पत्रकार जमाल खशोगी के कत्ल से जुड़ा विवाद- MBS की छवि एक बेरहम तानाशाह की तरह उभरी.
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है. MBS ने 'विजन 2030' की नींव रखी. उनका मकसद सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को केवल क्रूड ऑयल (पेट्रोलियम) के निर्यात पर निर्भर रहने से बचाना और देश को ग्लोबल बिजनेस व टूरिज्म का हब बनाना था. उन्होंने महिलाओं को ड्राइविंग का हक दिया, सिनेमाघरों पर से बैन हटाया, म्यूज़िकल कॉन्सर्ट्स की इजाजत दी और सऊदी समाज में कट्टरपंथ की पकड़ ढीली की. वे खुद को मुस्लिम उम्मा के एक प्रोग्रेसिव सेंटर फिगर के तौर पर पेश करने में काफी हद तक कामयाब भी रहे.
विजन 2030 पर संकट: पेट्रो-डॉलर से बने सपने की नाकेबंदी
MBS का सबसे बड़ा सपना है सऊदी अरब को तेल की अर्थव्यवस्था से आजाद कराना. इसके लिए उन्होंने 'द लाइन' (The Line), 'नियॉम' (NEOM) शहर और 'मुकाब' जैसे खरबों डॉलर के मेगा-प्रोजेक्ट्स की घोषणा की. वे चाहते हैं कि दुनिया भर के इन्वेस्टर्स रियाद आएं. लेकिन इस पूरे विजन की सबसे बुनियादी शर्त थी रीजनल पीस और सिक्योरिटी.
यमन के हूती लड़ाकों ने MBS के इसी सबसे कमजोर पहलू पर चोट की है. यमन से होने वाले ड्रोन और मिसाइल हमलों ने सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे को हिलाकर रख दिया है. सऊदी अरामको के पेट्रोलियम प्लांट पर हमले हों या लाल सागर और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट पर हूती लड़ाकों की नाकेबंदी, इन सबने सऊदी अरब की आर्थिक रीढ़ पर सीधा प्रहार किया है.
लाल सागर जैसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्ग का असुरक्षित हो जाना MBS के विजन-2030 पर भी प्रहार है. यमन युद्ध पर हर साल पानी की तरह बहाए गए अरबों डॉलर ने सऊदी खजाने को भारी चपत लगाई है, जिससे कई मेगा-प्रोजेक्ट्स की रफ्तार धीमी पड़ गई है या उन्हें टालना पड़ा है.
यूएस-ईरान जंग में हूतियों का पलटवार: जब लाचार हुई सऊदी सत्ता
हाल के वर्षों में मिडिल-ईस्ट के हालात और ज्यादा पेचीदा हो गए हैं. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच सऊदी अरब खुद को दोतरफा आग में फंसा हुआ पा रहा है. ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने न सिर्फ अपनी सैन्य ताकत बढ़ाई है, बल्कि वे ड्रोन तकनीक और बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस होकर सऊदी सीमा के भीतर हमला करने में सक्षम हो चुके हैं.
सऊदी अरब ने अरबों डॉलर खर्च करके अमेरिका से आधुनिक रक्षा प्रणालियां और आधुनिक हथियार खरीदे, लेकिन यमन के गुरिल्ला लड़ाकों के सामने ये तमाम महंगे हथियार बेअसर साबित होने लगे.
MBS ने पिछले कुछ वर्षों में यमन के दलदल से बाहर निकलने और हूतियों के साथ किसी तरह सीजफायर करने की भरपूर कोशिश की. लेकिन हूती अब सिर्फ डिफेंसिव मूड में नहीं हैं. वे शर्तें तय कर रहे हैं. हूतियों द्वारा लाल सागर में जहाजों की नाकेबंदी और सऊदी ठिकानों को निशाना बनाने की धमकियों ने क्राउन प्रिंस की नाक में दम कर दिया है. अमेरिका और पश्चिमी सहयोगियों से भी उन्हें वह सुरक्षा गारंटी नहीं मिल सकी, जिसकी रियाद को उम्मीद थी.
यूएई से दुश्मनी और यमन का दलदल
यमन संकट को और गहरा बनाने में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता ने भी अहम भूमिका निभाई. शुरुआती दिनों में अबू धाबी के शासक मोहम्मद बिन जायद (MBZ) और MBS के बीच गहरा दोस्ताना था, जिसने MBS की सोच पर काफी असर डाला. दोनों देशों ने मिलकर यमन में गठबंधन बनाया था.
लेकिन वक्त के साथ दोनों सहयोगियों के हित आपस में टकराने लगे. व्यापार, विमानन सेक्टर और क्षेत्रीय दबदबे की होड़ में MBS और यूएई के बीच खटास आ गई. यमन में भी दोनों के रास्ते अलग हो गए- रियाद एक यूनीफाइड यमन सरकार का समर्थक था, जबकि यूएई ने दक्षिण यमन के अलगाववादियों (STC) का समर्थन करना शुरू कर दिया.
विश्लेषकों का मानना है कि मोहम्मद बिन सलमान ने यूएई के साथ अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक मतभेदों को तरजीह दी, जिससे हूती विरोधी मोर्चा पूरी तरह कमजोर पड़ गया. इस आपसी फूट का सीधा फायदा हूती लड़ाकों को मिला और उन्होंने पश्चिमी तट तथा सामरिक दृष्टि से बेहद अहम इलाकों पर अपना शिकंजा और कस लिया.
दस साल की दास्तान: यमन से शुरू, यमन पर ही खत्म?
मोहम्मद बिन सलमान की सत्ता के 10 साल किसी रोलर-कोस्टर राइड की तरह रहे हैं. 2015 में यमन पर हमला उनका पहला बड़ा राजनीतिक और सैन्य दांव था, जिसने उन्हें सऊदी अरब का निर्विवाद नेता बनाया. उन्होंने अपनी ताकत के दम पर शाही घराने की बगावत को खामोश किया, समाज को बदला और खुद को एक ग्लोबल विजनरी के तौर पर पेश किया.
लेकिन दस साल बाद इतिहास खुद को दोहराता नजर आ रहा है, बस अंतर यह है कि इस बार पलड़ा बदला हुआ है. जिस यमन को वे अपनी ताकत का प्रदर्शन मान रहे थे, आज वही उनकी सबसे बड़ी विफलता और लाचारी की वजह बन चुका है.
हूतियों की नाकेबंदी, मक्का और पवित्र स्थलों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएं, और ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार मंडराता खतरा यह साबित करता है कि सिर्फ आधुनिक हथियार और आक्रामक बयानबाजी से युद्ध नहीं जीते जाते.
MBS आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां उनके महत्वाकांक्षी 'विजन 2030' का भविष्य यमन के शांति समझौते से जुड़ा है. अगर यमन का यह नासूर इसी तरह रिसता रहा, तो मोहम्मद बिन सलमान का वह सुनहरा सपना अधूरा ही रह जाएगा, जिसे बनाने के लिए उन्होंने अपनी सत्ता के पिछले दस साल दांव पर लगा दिए.
उन्हें जल्द ही कुछ फैसले लेने हैं, जिसमें एक अरबी कहावत उन्हें मदद करेगी - ‘बहादुरों की बहादुरी से पहले नंबर आता है उनकी समझदारी का.’
धीरेंद्र राय