अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा के बाद अब उत्तर प्रदेश की राजनीतिक और धार्मिक धाराएं बहुत तेजी से ब्रजमंडल यानी मथुरा की तरफ मुड़ रही हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषणों में ‘जय श्रीराम’ के साथ अब ‘कृष्ण बिहारी’ और ‘राधे-राधे’ का उद्घोष भी पूरी मुखरता से जुड़ चुका है. योगी आदित्यनाथ कई मौकों पर कह चुके हैं, "अगर बांके बिहारी की कृपा हुई तो अयोध्या और काशी की तर्ज पर ही मथुरा में भी भव्य निर्माण की दिशा में काम आगे बढ़ेगा. अयोध्या और काशी ने अपना गौरव पा लिया है, अब हमारी ब्रजभूमि की बारी है."
राजनीतिक बयानबाजी से इतर, मथुरा विवाद का असली और निर्णायक रास्ता अब अदालतों के कमरों से होकर गुजर रहा है. कारसेवा के खतरे और सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए विवादित स्थल पर चौकसी कड़ी कर दी गई है और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा इंतज़ामों का ब्योरा हाईकोर्ट के सामने पेश किया है.
दूसरी तरफ, श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद से जुड़े कानूनी पचड़ों को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से मुख्य याचिका को लेकर जवाब मांगा है ताकि सभी मुकदमों की सुनवाई एक सही दिशा में बढ़ सके. पहली नजर में भले ही यह मामला अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन जैसा दिखे, लेकिन सियासत, कानूनी पेच और इतिहास के पन्नों में यह विवाद अयोध्या से काफी अलग है. आइए, सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं इस पूरे घटनाक्रम की एक-एक कड़ी को.
मुगलिया फरमान और केशवदेव मंदिर का अंत
मथुरा की इस कहानी की शुरुआत सदियों पुरानी है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कटरा केशव देव वही पवित्र स्थान है जहां द्वापर युग में राजा कंस का कारागार हुआ करता था और भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था. इतिहास के दर्ज पन्नों के मुताबिक, 1669-70 में मुगल शासक औरंगजेब ने मथुरा के प्रसिद्ध और भव्य केशवदेव मंदिर को तोड़ने का फरमान जारी किया था.
मंदिर को ध्वस्त करके उसी नींव और मलबे के इस्तेमाल से एक ढांचे का निर्माण कराया गया, जिसे आज शाही ईदगाह मस्जिद कहा जाता है. इतिहासकार बताते हैं कि बाद में मराठों के शासनकाल और ब्रिटिश दौर में भी इस जमीन का मालिकाना हक हिंदुओं के पास ही रहा. ब्रिटिश काल में 1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने 'कटरा केशव देव' की 13.37 एकड़ जमीन को नीलामी के जरिए बनारस के राजा पटनीमल को बेच दिया था.
मालवीय जी की पहल और ट्रस्ट की नींव
समय बीतता गया और 20वीं सदी के मध्य में इस जमीन का ऐतिहासिक पुनरुद्धार शुरू हुआ. महामना पंडित मदन मोहन मालवीय और उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला के प्रयासों से यह पूरी 13.37 एकड़ जमीन राजा पटनीमल के वंशजों से खरीद ली गई.
इस जमीन पर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित भव्य मंदिर का निर्माण कराने के उद्देश्य से 1951 में 'श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट' का गठन किया गया. विचार यह था कि पवित्र जन्मस्थान की जमीन का हर इंच इस्तेमाल कर दोबारा केशवदेव का भव्य मंदिर स्थापित किया जाए.
1968 का वह समझौता, जिस पर छिड़ गई नई जंग
अयोध्या और मथुरा के मामलों में सबसे बड़ा अंतर 1968 का समझौता ही है. 1958 में मंदिर प्रबंधन का काम देखने के लिए एक अलग संस्था बनी- ‘श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ’. जो बाद में 'सेवा संस्थान' कहा गया.
12 अक्टूबर 1968 को इस 'सेवा संघ' और 'शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट' के बीच एक लिखित समझौता (Compromise Agreement) हो गया. समझौते के तहत 13.37 एकड़ जमीन का बंटवारा कर दिया गया. तय हुआ कि मस्जिद जिस 2.37 एकड़ हिस्से पर बनी है, वह वहीं रहेगी और उसके बदले मुस्लिम पक्ष ने मंदिर की जमीन पर से अपना दावा छोड़ दिया. 1974 में सिविल कोर्ट ने भी इस समझौते को कानूनी रूप से मान्य कर दिया.
वर्षों बाद अब यही समझौता विवाद की सबसे बड़ी वजह बन गया है. मौजूदा हिंदू याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जिस 'सेवा संघ' ने समझौता किया, उसके पास जमीन का मालिकाना हक ही नहीं था. असली मालिकाना हक 'श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट' के पास था, इसलिए बिना अधिकार के किया गया वह समझौता धोखाधड़ी था और कानूनन शून्य (Null and Void) है.
मुकदमों की झड़ी और 1991 के कानून की दीवार
साल 2020 में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से उनके 'मित्र' बनकर अदालत में नई याचिका दायर की गई, जिसके बाद मुकदमों की झड़ी लग गई. आज इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुल 18 सिविल याचिकाएं एक साथ सुनी जा रही हैं.
इस मोड़ पर सबसे बड़ी कानूनी अड़चन बनकर सामने आया- 'पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991' (Places of Worship Act, 1991). यह कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 को जिस भी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता.
मुस्लिम पक्ष (शाही ईदगाह मस्जिद समिति और सुन्नी वक्फ बोर्ड) का मुख्य हथियार यही कानून है. उनका कहना है कि 1947 में वहां मस्जिद मौजूद थी, इसलिए यह मुकदमा चलने योग्य ही नहीं है. वहीं हिंदू पक्ष का तर्क है कि 1947 में भी असली स्वरूप मंदिर का ही था और एक अवैध कब्जे को धार्मिक स्वरूप नहीं माना जा सकता. हाईकोर्ट ने हिंदू पक्ष के तर्कों को सुनते हुए मुस्लिम पक्ष की शुरुआती अर्जियों (Order 7 Rule 11) को खारिज कर मुकदमों को सुनवाई योग्य मान लिया.
मस्जिद के सर्वे का आदेश और सुप्रीम कोर्ट का ब्रेक
दिसंबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाते हुए शाही ईदगाह मस्जिद परिसर के एडवोकेट कमिश्नर के जरिए सर्वे करने का आदेश दे दिया. हिंदू पक्ष का दावा था कि मस्जिद की दीवारों पर ओम, कलश, शेषनाग और कमल जैसे हिंदू स्थापत्य कला के अवशेष साफ दिखाई देते हैं, जिन्हें कोर्ट के रिकॉर्ड पर लाना जरूरी है.
लेकिन जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस सर्वे वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट का रुख यह रहा कि पहले मुकदमों की कानूनी वैधता और मुख्य मुद्दों पर फैसला होना चाहिए, उसके बाद ही सर्वे जैसी प्रक्रियाओं पर आगे बढ़ा जा सकता है.
इस बैकग्राउंड पर यूपी की राजनीति की दोनों धुरी पिछले कुछ वर्षों से गर्म होती रही है. विधानसभा सत्र और जनसभाओं के दौरान विपक्ष को घेरते हुए योगी कहते हैं, "जो लोग खुद को यदुवंशी कहते हैं, वे भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के मुद्दे पर अपना रुख साफ क्यों नहीं करते? आखिर वे इस मुद्दे पर मौन क्यों साध लेते हैं? अगर हिम्मत है, तो वोट बैंक की राजनीति छोड़कर इस पर अपनी बात रखिए."
इस पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पलटवार किया. शाही ईदगार मस्जिद के सर्वे की खबर के बाद उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि "हमारी पार्टी और देश संविधान, अदालती व्यवस्था और 1991 के 'पूजा स्थल कानून' (Places of Worship Act) के साथ मजबूती से खड़ी है. भारतीय जनता पार्टी जब भी महंगाई, बेरोजगारी और विकास के मोर्चे पर विफल होती है, तो चुनावों से ठीक पहले जनता का ध्यान भटकाने के लिए ऐसे धार्मिक विवादों को हवा देने लगती है."
श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद के मुकदमे पर अखिलशे यादव कहते हैं, "हम सभी भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं और सनातन परंपरा का सम्मान करते हैं, लेकिन धर्म की आड़ में नफरत फैलाना और राजनीति चमकाना गलत है. मामला अदालत में है, इसलिए कोर्ट को फैसला करने दीजिए, भारतीय जनता पार्टी को राजनीति का माहौल नहीं बिगाड़ना चाहिए."
राम मंदिर निर्माण के बाद कोशिशें हुईं, लेकिन...
राम मंदिर आंदोलन के दौरान एक नारा प्रबल था- ‘राम मंदिर झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है’. राम मंदिर बन गया. काशी विश्वनाथ मंदिर का उद्धार हुआ. ज्ञानवापी का मुकदमा चल रहा है. लेकिन मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि विवाद के निपटारे को लेकर काम उतना तेजी से नहीं हो पाया. हालांकि, योगी सरकार ने जन्मभूमि मंदिर के आसपास की भूमि का अधिग्रहण करके विवाद को काफी हद तक अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की. इस बीच वहां कुछ छुटपुट प्रदर्शन आदि भी हुए. और मामला फिर कोर्ट की तरफ ही चला गया.
कचहरी के गलियारे और भविष्य की धुंध
फिलहाल मस्जिद परिसर का सर्वे भले रुका हुआ है, लेकिन अदालत में कानूनी लड़ाई बिल्कुल नहीं रुकी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी 18 मुकदमों को एक साथ जोड़ दिया है और कोर्ट में मुख्य याचिका तय करने की प्रक्रिया चल रही है.
उत्तर प्रदेश के बदलते सियासी माहौल, नए राजनीतिक नारों और कारसेवा की आहट के बीच मथुरा का यह विवाद अब केवल आस्था का विषय नहीं रहा. यह मामला इतिहास को नए सिरे से देखने, 1968 के समझौते की कानूनी हैसियत और 1991 के कानून की संवैधानिक कसौटी का एक जटिल ताना-बाना बन चुका है, जिसका अंतिम फैसला आने तक काफी मंथन होना है. हिंदू और मुस्लिम पक्ष के दावे अपनी जगह हैं, और नेताओं के बीच रस्साकशी अपनी जगह.
धीरेंद्र राय