कठघरे से बाहर आईं जज... जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का आर्डर केजरीवाल केस से ज्यादा जुडिशरी के लिए अहम

दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की उस मांग को खारिज कर दिया है जिसमें दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस की सुनवाई से रिक्युज यानी अलग होने की गुजारिश की थी. हाई कोर्ट ने कहा कि महज आशंका या संदेह के आधार पर जज की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाए जा सकते.

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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा और अरविंद केजरीवाल. (Photo: ITG) जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा और अरविंद केजरीवाल. (Photo: ITG)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 21 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:32 PM IST

13 अप्रैल को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की दलीलों को बड़े इत्मीनान से सुना था. आखिर में बोलीं भी, आपने बड़े अच्छे अंदाज में अपनी दलीलें रखी हैं. आपको तो वकील होना चाहिए. और, अरविंद केजरीवाल का रिएक्शन था, मैं फिलहाल जो कर रहा हूं, उससे मैं बहुत खुश हूं.

20 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल तमिलनाडु में डीएमके नेता एमके स्टालिन के लिए चुनाव प्रचार करने पहुंचे थे, और तभी दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की रिक्युजल वाली याचिका पर अपना फैसला सुनाया. अरविंद केजरीवाल ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई में हिस्सा लिया.

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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की दलीलों पर सवाल उठाते हुए सभी का एक एक करके जवाब दिया, और याचिका खारिज करते हुए मामले की सुनवाई से रिक्यूज करने से भी इनकार कर दिया. अब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ही दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस की सुनवाई करेंगी. यह सुनवाई सीबीआई की उस अपील पर हो रही है, जिसमें जांच एजेंसी ने दिल्ली के स्पेशल कोर्ट के फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है. स्पेशल कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल सहित मामले के सभी आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया था. 

जज ने कहा कि केजरीवाल पर अभी तक कोई आरोप साबित नहीं हुआ है, वो केस से बाहर हो चुके हैं. ऐसे में क्या एक ऐसा इंसान जो डरा हुआ है कि फैसला उसके खिलाफ आ सकता है, कोर्ट को 'अग्नि परीक्षा' देने के लिए कह सकता है? अग्नि परीक्षा का मतलब यहां यह है कि जज से कहा जा रहा है कि पहले साबित करो कि तुम निष्पक्ष हो, तभी तुम यह केस सुन सकती हो. जज ने इसे गलत बताया और कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला नहीं देता, किसी के डर या शक के आधार पर जज की ईमानदारी को चुनौती नहीं दी जा सकती.
 
अरविंद केजरीवाल करीब डेढ़ घंटे की सुनवाई के दौरान अपनी दलीलों से समझाने की कोशिश की थी कि क्यों हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को मामले से खुद को अलग कर लेना चाहिए. कानूनी भाषा में खुद को रिक्यूज कर लेना चाहिए. अरविंद केजरीवाल ने अपनी तरफ से जज के रिक्युजल के लिए 10 कारण भी गिनाए थे.

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16 अप्रैल को दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करते हुए रिकॉर्ड पर लेने की गुजारिश की थी. हाई कोर्ट ने उसे रिकॉर्ड पर लिया, और रजिस्ट्री को भी रिकॉर्ड पर लेने की हिदायत दी थी.

अरविंद केजरीवाल के हलफनामे का हवाला देते हुए सीबीआई ने उसे पूरी न्यायिक संस्था को बदनाम करने का प्रयास बताया था. सीबीआई का कहना था, अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि मामले की सुनवाई कर रहीं जज जस्टिस स्वर्ण कांतशर्मा के बच्चों को सरकारी पैनल में वकील बनाया गया है. अपने काउंटर में सीबीआई ने कहा कि अरविंद केजरीवाल का नया हलफनामा न्यायपालिका की छवि खराब करने और उस पर दबाव बनाने की कोशिश है.

'अग्नि परीक्षा' नहीं चलेगी

अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि उन्हें एहसास हुआ कि एक जज के रूप में उनकी चुप्पी का ही इम्तिहान हो रहा था, और अब सवाल जज और जुडिशरी की निष्पक्षता पर था. बोलीं, जब मैंने यह फैसला लिखना शुरू किया, तो कोर्ट रूम में एकदम सन्नाटा था. मेरे कंधों पर जज होने का भारी बोझ और जिम्मेदारी थी, जिसने भारत के संविधान की शपथ ली है. 

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि अरविंद केजरीवाल पर अब तक कोई आरोप साबित नहीं हुआ है, वो केस से बाहर हो चुके हैं. ऐसे में क्या एक ऐसा इंसान, जो डरा हुआ है कि फैसला उसके खिलाफ आ सकता है, कोर्ट को 'अग्नि परीक्षा' देने के लिए कह सकता है? 

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कोर्ट ने कहा, अग्नि परीक्षा का मतलब यहां ये है कि जज से कहा जा रहा है कि पहले साबित करो कि तुम निष्पक्ष हो, तभी तुम ये केस सुन सकती हो. 

अदालत ने कहा, किसी जज की योग्यता का निर्धारण ऊपरी अदालत कर सकती है, वादी नहीं. एक नेता को इस बात की इजाजत नहीं दे सकते हैं कि सीमा लांघे. कोई नेता न्यायिक योग्यता का फैसला नहीं कर सकता. एक वादी हमेशा सफल नहीं हो सकता है, और केवल ऊपरी अदालत ही तय कर सकती है कि जज एक पक्षीय है. जिला अदालत के फैसले को हाई कोर्ट जारी रख सकता है, और ऐसा ही सुप्रीम कोर्ट कर सकता है हाई कोर्ट के लिए. मुकदमे में शामिल व्यक्ति की यह सामान्य चिंता कि न्यायालय उसे राहत नहीं दे सकता, न्यायाधीश के खिलाफ पूर्वाग्रह के आरोप का आधार नहीं हो सकती.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने इसे गलत बताया और साफ तौर पर कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला नहीं देता, किसी के डर या शक के आधार पर जज की ईमानदारी को चुनौती नहीं दी जा सकती. बोलीं, मुद्दा साफ था कि क्या मुझे खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिए. मेरी निष्पक्षता और गरिमा को चुनौती दी गई थी. आसान रास्ता यह होता कि बिना आवेदन सुने ही मैं खुद को अलग कर लेती. मैंने याचिका पर फैसला करने का निर्णय लिया क्योंकि ये संस्था की साख का सवाल था.

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जज ने कहा, मैंने तय किया कि मैं इस पर फैसला आरोपों से प्रभावित हुए बिना सुनाऊंगी, जैसा मैं अपने 34 साल के न्यायिक करियर करती आई हूं. जिस बात ने इस काम को कठिन बनाया है, यह है कि बहस के दौरान अलग-अलग और विरोधाभासी रुख अपनाए गए हैं. 

अरविंद केजरीवाल की बातें याद दिलाते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि उन्हें जज की ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं है, लेकिन वो केस का ट्रांसफर चाहते हैं... इसलिए नहीं कि मैं पक्षपाती हूं, बल्कि इसलिए कि उन्हें पक्षपात की आशंका है. 

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: तो आप राजनीतिक पक्षपात का इशारा कर रहे हैं, ठीक?

अरविंद केजरीवाल: नहीं, मैं ऐसा कोई इशारा नहीं कर रहा हूं, मैम.

जज ने कहा, वादी ने न्यायपालिका की संस्था को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है. मैंने विवाद को सुलझाने का रास्ता चुना. न्यायपालिका की ताकत आरोपों पर दृढ़ता से निर्णय लेने में होती है. मैंने यह आदेश बिना किसी बात से प्रभावित हुए लिखा है - और फिर, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने 13 अप्रैल को हुई सुनवाई में अरविंद केजरीवाल के लगाए आरोपों पर जवाब दिया.

जज के परिवार पर उठाए सवाल, और जवाब

13 अप्रैल, 2026

अरविंद केजरीवाल: सोशल मीडिया पर भी एक मुद्दा चल रहा है, मैम. पुरानी परंपरा थी कि अगर किसी जज के करीबी लोग किसी पक्ष या वकीलों से जुड़े होते थे, तो जज स्वयं को मामले से अलग कर लेते थे. 

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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: क्या आप यह अपनी शपथ पत्र वाली याचिका में लिख रहे हैं?

अरविंद केजरीवाल: मैं बोल देता हूं, मैम... उसी तरह के हितों का टकराव यहां दिखाई दे रहा है. मेरी माननीय अदालत से विनती है कि कृपया इस पर विचार किया जाए.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: (डिक्टेशन देती हैं) अदालत के समक्ष वह कहते हैं कि सोशल मीडिया सामग्री के कारण वह भी गहराई तक प्रभावित हैं, और उन्हें इस अदालत के प्रति पक्षपात की आशंका है, क्योंकि इस मामले में अदालत के हितों के टकराव का संकेत मिलता है. इसलिए उनके मन में, इन कारणों से अलग-अलग भी और सामूहिक रूप से भी, गहरा संदेह पैदा हुआ है कि उन्हें इस अदालत से न्याय नहीं मिलेगा. अतः यह अदालत खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर ले.

20 अप्रैल, 2026

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: अगर किसी नेता का बेटा नेता बन सकता है, किसी नेता की पत्नी बिना किसी अनुभव के नेता बन सकती है, तो एक जज के बच्चे को उसी फील्ड में काम करने से कैसे रोका जा सकता है? जब कोई जज पद की शपथ लेता है, तो उसके परिवार ने कोई शपथ नहीं ली होती कि वे इस पेशे में नहीं आएंगे. ऐसी दलीलें स्वीकार करना जज के परिवार के हक छीनने जैसा होगा.

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बच्चों के सरकारी पैनल में होने के अरविंद केजरीवाल के दावों पर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि अगर रिश्तेदार सरकारी पैनल में हैं भी, तो वादी को केस पर असर दिखाना होगा... इसका कोई गठजोड़ नहीं दिखाया गया है. उनके पैनल में होने का इस विवाद से कोई लेनादेना नहीं है... नेता के बच्चे नेता बनते हैं तो जज के बच्चों के वकील बनने पर क्यों सवाल उठाया जा रहा है? 

चीफ गेस्ट बनने भर से वैचारिक प्रभाव कैसे

13 अप्रैल, 2026

अरविंद केजरीवाल: वकीलों की एक संस्था है - अधिवक्ता परिषद।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: यह बार नहीं है. बार एसोसिएशन की तरह, बार एसोसिएशन नहीं है. यह उनकी परिषद है.

अरविंद केजरीवाल: यह बीजेपी और आरएसएस की वैचारिक संस्था है. उस संस्था के कार्यक्रम में माननीय न्यायालय चार बार जा चुकी हैं. 26 दिसंबर 2022, 17 मार्च 2023, 30 अगस्त 2024 और 8 अगस्त 2025. उनकी विचारधारा के हम सख्त खिलाफ हैं. यह राजनीतिक मामला है, मैम. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धारणा भी मायने रखती है, जैसे सीजर की पत्नी के मामले में कहा जाता है. जांच एजेंसी हर संदेह से ऊपर होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की आलोचना करते हुए उसे 'पिंजरे का तोता' कहा था. अगर सीबीआई राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार है, और अगर माननीय न्यायालय किसी विशेष विचारधारा के कार्यक्रमों में जाती हैं, तो मेरे मन में पक्षपात की आशंका पैदा होती है.

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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: (पूछती हैं) मैं उनकी विचारधारा का पालन करती हूं?

अरविंद केजरीवाल: नहीं, मैं यह नहीं कह रहा... मैं कह रहा हूं कि संभव है आपकी उनके प्रति सहानुभूति हो. क्योंकि आप चार बार गई हैं.

20 अप्रैल, 2026

दिल्ली हाई कोर्ट का मानना है कि अरविंद केजरीवाल, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के किसी भी राजनीतिक बयान का उल्लेख करने में नाकाम रहे.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थे. बोलीं, वे नए आपराधिक कानूनों, महिला दिवस कार्यक्रमों या बार के युवा सदस्यों से बातचीत के लिए आयोजित कार्यक्रम थे. कई जज इन कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं. ऐसी भागीदारी को वैचारिक पक्षपात का संकेत देने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

कोर्ट का सवाल था, यह समझना मुश्किल है कि केवल मुख्य अतिथि या वक्ता के रूप में हिस्सा लेने भर से पक्षपात की आशंका कैसे पैदा हो सकती है? या इससे किसी जज की किसी मामले में निष्पक्ष फैसला करने की क्षमता कैसे खत्म हो सकती है?

किसी नेता के बयान पर कोर्ट का कंट्रोल नहीं

13 अप्रैल, 2026

अरविंद केजरीवाल: कुछ दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी ने बयान दिया था कि केजरीवाल जी को हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा. उनका कहने का मतलब था कि मैं हाई कोर्ट में हारूंगा.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: वह क्या कहते हैं, उस पर क्या मेरा नियंत्रण है?

अरविंद केजरीवाल: मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि इस देश के गृह मंत्री ने ऐसा बयान दिया है.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: (डिक्टेशन देती हैं) उनका कहना है देश के गृह मंत्री ने किसी टीवी कार्यक्रम में यह बयान दिया कि जब इस अदालत का फैसला आएगा, तो श्री केजरीवाल को उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा. उनका कहना है कि इससे उनके मन में यह आशंका पैदा हुई है कि इस अदालत से उन्हें न्याय नहीं मिलेगा.

20 अप्रैल, 2026

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: ऐसे आधार पर खुद को मामले से अलग करने की मांग करना केवल कल्पना के आधार पर आगे बढ़ने जैसा होगा. यह अदालत इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं रखती कि कोई राजनेता सार्वजनिक मंच पर क्या कहता है. इसी तरह, यह राजनेताओं के बयानों को नियंत्रित भी नहीं कर सकती.

दिल्ली हाई कोर्ट का मानना है कि अगर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा केस की सुनवाई से हट जाने और न हटने, दोनों की स्थितियो में जीत हासिल करने की कोशिश करते. 

जज के केस से रिक्यूज कर लेने की स्थिति में अरविंद केजरीवाल का स्टैंड होता, 'देखो, हमारे आरोपों में दम था.' 
और अगर जज के नहीं हटने पर फैसला उनके खिलाफ आता है तो वो कहेंगे, 'मैंने पहले ही कह दिया था कि यही होगा.'

दिल्ली एक्साइज केस की सुनवाई खुद करने का फैसला करते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा, 'मैं इस जाल में नहीं फंसूंगी.'

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