साल में दो-चार बार मैं पास वाले मैकडॉनल्ड्स में जाता हूं और वहां आते युवाओं को एक ऑफर देता हूं. अगर वे कुछ सवालों के जवाब दें, तो बर्गर मेरी तरफ से फ्री. वे मेरे इरादों पर थोड़ा शक करते हैं, फिर कई मान जाते हैं क्योंकि उस उम्र में पॉकेट मनी बच जाए तो बढ़िया है. उस उम्र में जवाब भी बिना लाग-लपेट के देते हैं. होता ये है कि मैं कई कोल्ड कॉफी खत्म कर आखिर में उनसे कुछ सीख लेता हूं, जो कोई ओपिनियन पोल नहीं बता सकता.
पिछली बार, मैंने पूछा कि कौन से चैनल 'गोदी मीडिया' की कैटेगरी में आते हैं. लगभग सभी के जवाब एक समान थे, जैसे उन्होंने रट रखा हो. फिर मैंने पूछा कि उन्होंने आखिरी बार उन चैनलों में से किसी को कब देखा था. एक को भी याद नहीं था. आधे ग्रुप ने तो कभी टीवी न्यूज देखा ही नहीं था. उन्होंने सोशल मीडिया पर क्लिप देखे थे, जिनमें उन्हें बताया गया था कि गोदी मीडिया है ये. उनका नॉलेज वो सोशल मीडिया पोस्ट थीं, जिनके वीडियो में उन चैनलों को बुरा-भला कहा गया था. उन्होंने खुद उसे कभी नहीं परखा था.
मैंने बहस नहीं की. वे प्यारे बच्चे थे, वे जो कुछ भी कंज्यूम करते हैं, उसके बारे में वे उन चैनलों पर आने वाले प्रवक्ताओं से ज्यादा ईमानदार थे. उन्हें बस यह बता दिया गया था कि बर्गर का स्वाद कैसा होता है, ख़ुद बिना खाए उन्होंने मान भी लिया था.
हम जिस माहौल में रहते हैं और जिन लोगों के साथ उठते-बैठते हैं, उसी के मुताबिक हम किसी भी चीज का स्वाद डेवलप करते हैं. स्वाद एक अनुभव है और उसका हकीकत से लेना-देना भी है. महिला पत्रकारों को जिस तरह घेरा गया और परेशान किया गया, वह मुझे भी बुरा लगा. वह दृश्य भद्दा था. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती लेकिन मैं रिपोर्टर को डराने वाली भीड़ की निंदा करने में सीनियर संपादकों के साथ शामिल नहीं होऊंगा.
सीनियर संपादकों के बयान वैसे भी कभी उन तक नहीं पहुंचेंगे जिनसे वे मुखातिब होने का दावा करते हैं. वो भीड़ संपादकों के बयान नहीं पढ़ती. वह बमुश्किल ही कुछ पढ़ती है. वैसे, वे पढ़े-लिखे हैं और राजनीतिक रूप से जागरूक भी. और यह जागरूकता नमक, चीनी और थोड़े से नींबू-मिर्च मसाले के साथ तैयार मिली है. उन्हें किसी एजुकेशन की जरूरत नहीं है. वे पहले से ही गुस्से में हैं. और उनका गुस्सा रीयल है.
गुस्सा एक फीलिंग है, और आप किसी भावना से बहस नहीं कर सकते. ढेरों क्लिप्स ऐसे वायरल किए गए जिनमें ये दिखाया गया कि प्रदर्शनकारियों में से ज्यादातर यह नहीं बता सकते कि वे असल में किस बात पर इकट्ठा हुए हैं. उन क्लिप्स को लोग मजे लेकर शेयर करते हैं कि देखो इनको भारत के राष्ट्रपति का नाम नहीं मालूम और ये इस्तीफा लेने आए हैं. वे लोग आपको वो समझदार प्रदर्शनकारी नहीं दिखाएंगे जो दमदार और तार्किक बात रखता है. किसी शिकायत को ठीक से न समझा पाने का यह मतलब नहीं है कि वह शिकायत झूठी है.
युवाओं की बेचैनी भी असली है. वे एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं जहां से कोई भी रास्ता कहीं नहीं जाता. आज के समय में युवा होना बेहद भ्रमित करने वाला है, और ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं है.
वे निराश, असंतुष्ट और भटके हुए हैं. इन लड़के और लड़कियां ने वह सब किया जिसे लगन से मेहनत कहते हैं, फिर भी उनके हाथ कुछ नहीं आया. ये अपनी जिंदगी ऑनलाइन जीते हैं. जब वे अपनी ऑनलाइन आदतें, भाषा और तौर-तरीके सड़क पर ले आए, तो सब चौंक गए. असली दुनिया के नतीजे असली होते हैं और वहां कोई 'undo' बटन नहीं होता. जो सबकुछ पहले जैसा कर दे. उनकी ज़बान फिसली नहीं, बस सोशल मीडिया के कमेंट्स सेक्शन से कनॉट प्लेस के मिडिल सेक्शन आ गई. यहां कोई भी पूरी तरह पीड़ित नहीं है. और न ही कोई पूरी तरह कसूरवार. हम सब इस दलदल में साथ हैं. खामोशी है.
बेशक, मैं भीड़ का समर्थन नहीं करता. लेकिन उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे एक पत्रकार और दूसरे पत्रकार में अंतर कर पाएं. हर जेब में फोन होने के कारण, कोई भी शख्स पत्रकार होने का दावा कर सकता है. एक अच्छे पत्रकार और बुरे पत्रकार के बीच फर्क की बहस हमेशा से कहने-सुनने की बात ज्यादा है, हकीकत से ज्यादा लेना देना नहीं है इसका. एक की नज़र में अच्छा पत्रकार दूसरे की नज़र में निकृष्ट हो सकता है.
दूसरी दुनिया में इसी के समान एक ऐसा और बेतुका फर्क मौजूद है: गुड तालिबान बनाम बैड तालिबान. और हम सब जानते हैं कि जिन लोगों ने यह लकीर खींची थी, उनके साथ क्या हुआ. अगर इस तुलना से आपको गुस्सा आया, तो पढ़ना बंद करें और अपना गुस्सा सोशल मीडिया पर निकालें. वह चौबीसों घंटे ओपन है. जिन लोगों को इतनी जल्दी मिर्ची नहीं लगती, वे आगे पढ़ सकते हैं.
सीनियर संपादकों का गुस्सा सिलेक्टिव होता है, और वे बड़ी खूबी से चुनाव करते हैं. वे तभी जागते हैं जब उनके अपने किसी करीबी को, अपने जैसे को, घेरा जाता है. जब किसी दूसरे पत्रकार को वैसी ही सजा मिली, तब वे चुप रहे, और वह भी उसी चैनल की एक युवा महिला पत्रकार थी. वही चैनल. वही शहर. वही भीड़. वही बदसलूकी. लेकिन रिएक्शन अलग.
वे जो लकीर खींचते हैं, वह कंटेंट या रिपोर्टिंग की ईमानदारी को लेकर नहीं होती. वह वैचारिक नातेदारी को लेकर होती है. जैसे 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में सुल्तान ने कहा था, "हमें अपने में मत जोड़िए, हम अलग हैं." कुछ ने तो गलत तरह के पत्रकार की सरेआम बेइज्जती पर तालियां भी बजाई हैं. फिर चाहे वह राइट हो या लेफ्ट. निर्भर करता है कि उस दिन भीड़ किसकी थी. जब गली में लड़ाई होती है, तो आप सबसे पहले अपने भाई को ही बचाते हैं. लेकिन तब इसे उसूल मत कहिए. इसे परिवार कहिए. अपने जैसे लोग. भाईचारा.
चालाक नेताओं ने इस पत्रकारीय फूट को भांप लिया था, इसे बढ़ावा दिया, और इसका पूरा फायदा भी उठाया. और क्या गजब का फायदा उठाया. राजनेताओं को हमेशा से पब्लिसिटी पसंद रही है और वे मीडिया से हमेशा डरते रहे हैं क्योंकि मीडिया उनके कारनामों पर रोशनी डालता है. वे हमेशा से ऐसा मीडिया चाहते थे जो लाचार हो, जिसकी खिल्ली उड़ाई जा सके. सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष दोनों ने मीडिया का इस्तेमाल किया, और मीडिया ने भी मलाईदार खबरों की रेस में उतने ही उत्साह के साथ उनका साथ दिया. विपक्षी दल तो तोहफे बांटने में सबसे आगे रहे. बड़ी पार्टी के लिए यह और भी आसान था. वह सिर्फ फोटो खिंचवाने का मौका देती थी और पास होने का दिखावा करती थी. एक इंटरव्यू यहां, एक खबर लीक वहां, प्लेन में एक सीट, लुटियंस के किसी लॉन में चाय का एक कप. अब किसी भी दल के राजनेता अपने लिए अनचाही किसी भी रिपोर्ट को ‘राजनीतिक साजिश’ बताकर खारिज कर सकते हैं. पत्रकार की महीनों की मेहनत दो शब्दों में गायब. इस दिमागी खेल ने देश के ज्यादातर लोगों को उलझन में डाल दिया है. बिल्कुल वैसे ही जैसी योजना थी. प्लान सक्सेस.
युवाओं में से कई तो न्यूज फॉलो तक नहीं करते हैं. और वे ऐसे मीडिया से तो और भी दूर कोई कांस्पिरेसी थ्योरी नहीं परोसता. आम बोलचाल की भाषा में बात नहीं करता. सूचनाओं के इस अंबार और इनफ्लुएंसर्स के दौर में, वे ऐसे लोगों से प्रभावित होने में खुशी महसूस करता है, जो उनसे बिना किसी फिल्टर के उनकी अपनी भाषा में बात करते हैं. बिना सिर-पैर की बात. यह वह चीज है जिसे एक संस्था के रूप में मीडिया कभी कर नहीं पाया और ना कर पाएगा. जवाबदेही कम भले हो गई है, ग़ायब तो नहीं हुई.
मीडिया को जो लेबल दिए गये हैं, क्या आप उसके लिए किसी को दोषी ठहरा सकते हैं? पत्रकारों ने ही सबसे पहले एक-दूसरे को लेबल दिए. उनके लिए दूसरे का झुकाव एक पाप था, और उनका अपना झुकाव एक खूबी. प्राइम-टाइम डिबेट्स पत्रकारिता का चेहरा बन गईं, और डिबेट्स का काम ही बांटना होता है. दिन की जमीनी खबरें शाम को राजनीतिक बहस के अखाड़े में चित हो जातीं. युवाओं को यही बताया गया कि मीडिया का मतलब यही होता है. उन्होंने बिना पड़ताल के मीडिया के उन लेबल्स को अपना लिया, जो उनके पसंदीदा इनफ्लुएंसर्स ने पहले ही चिपका दिए थे. वाकई, गजब का खेल है. पर इसमें मात सबकी है.
लेबल सस्ते होते हैं. काले और सफेद. रेड लेबल और ब्लू लेबल. हरा, गुलाबी और गुलाबो. एक दिन आप कुछ और होते हैं, अगले दिन कुछ और, और उसके अगले दिन दोनों. जो लोग अभी भी मेनस्ट्रीम मीडिया में टिके हुए हैं, उनको रंगीन लेबल बहुत ही शानदार तरीके से बांट दिए गए हैं. नफरत और ध्रुवीकरण की राजनीति संस्थाओं को लेबल देना पसंद करती है ताकि लोग प्यार या नफरत में से चुनने को मजबूर हो जाएं. पत्रकार, राजनेता, उद्योगपति, कार्यकर्ता. हीरो और विलेन. हम और वे. यह मोदी है. वह लोधी है. यहां दरबारी है. वहां चमचा.
और फिर बिग टेक कंपनियों की लालच से जन्मे खतरनाक एल्गोरिदम ने कमाल दिखाया. पूर्वाग्रहों को पोसा, मोटा किया. स्वादानुसार राजनीतिक निवाले लोगों के गले उतारे. किसी के पास यह देखने का वक्त नहीं है कि क्या है और क्यों है. बनी बनाई भंग की गोली और अंग-अंग स्फूर्त. जिस लड़की की उसकी अंग्रेजी के लिए सुबह तारीफ की जा रही थी, शाम को वह गद्दार बन गई. क्योंकि उसका संस्थान संदिग्ध निकला. आप कौन हैं उससे ज्यादा जरूरी हो गया कि आप कहां काम करते हैं. क्योंकि ग़ुलाम ही तो होंगे, बस ये पता करो कि किसके हैं. सुबह नाश्ते के वक्त फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली लड़की रात के खाने तक पाकिस्तानी एजेंट बन गई. हर किसी का लेबल निकलेगा.
ये लेबल पत्रकारों द्वारा ही गढ़े गए. पत्रकारों द्वारा ही उन पर मोहर लगाई गई. पत्रकारों ने ही उन्हें बांटा. यह बात मैं थोड़े दुख के साथ कह रहा हूं. मैं उनमें से कुछ को जानता हूं. कुछ अच्छे लोग हैं जो बह गए, बयार के साथ. जरूरी नहीं कि उनसे ऐसा करने को किसी ने कहा या मजबूर किया. वे खुद ऐसा करना चाहते थे. ठंडी ठंडी पवन, अपना अपना वाद, किसे अच्छा नहीं लगता. सीनियर पत्रकारों ने भी ये मवाद हवा में फैलाई है कि कोई भी रिपोर्टर अपने दिमाग से नहीं सोचता. उसने तो जमीर का सौदा तनख्वाह के लिए किया ही होगा. रिपोर्टरों की अपनी कोई मर्जी नहीं होती. वे अपने मालिकों और संपादकों के गुलाम होते हैं.
मैंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा रिपोर्टरों के बीच बिताया है. मैंने उन्हें एक हेडलाइन के लिए लड़ते देखा है. एक कोट के लिए अस्पताल के बाहर पूरी रात इंतजार करते देखा है. एक झिड़की के बाद बाथरूम में चुपचाप रोते देखा है. कठपुतलियां रोती नहीं हैं. लेकिन यह सोच सड़कों तक फैला दी गई कि सब बिके हुए हैं. अगर वह अमुक बात करता है तो किसी से दाम लिया होगा. अपना कोई विचार नहीं उसका. सब कुछ उधार का है. यही कनॉट प्लेस की उस भीड़ ने भी सुन रखा था.
भीड़ के पास भी अपना कोई दिमाग नहीं होता. दिल्ली में उस रिपोर्टर को घेरने वाले ज्यादातर लोग भी मासूम ही हैं. वे इतनी इन्फॉर्मेशन से घिर गए हैं कि उन्हें छांटने के लिए उनके पास वक्त नहीं है. सुबह, दोपहर, शाम, रात. मोबाइल पर वैसी ही जानकारी परोसी जाती है जो वह ग्रहण करते हैं और शेयर करते हैं. जो शेयर करते हैं वह और ज्यादा परोसा जाता है. धीरे धीरे पूर्वाग्रह के बीज से लम्बे तन जाते हैं, और इतनी गहरी जड़ें जमा लेते हैं कि कोई ताजी हवा उस तिल के ताड़ का कुछ बिगाड़ नहीं सकती.
जैसे खाना पैकेज्ड मिलता है, सूचना भी पैकेज्ड. भगवा पैकेट, हरा पैकेट, नीला पैकेट, लाल पैकेट. वे इसका जितना सेवन करते हैं, उन्हें वही परोसा जाता है. वे टेलर स्विफ्ट के लिए लड़ते हैं. कोहली की महानता के लिए लड़ते हैं. खान बनाम खान में लड़ते हैं. ऐसे लड़ते हैं जैसे कभी पुश्तैनी जायदाद के लिए लड़ा जाता था. हर राय किसी थ्रेड या रील से बनाई जाती है. फिर बहुत सारी रील दिखाई जाती है. अपनी भी एक बनाई जाती है. रील बन गई, इट्स डन ब्रो.
कुंए में ही भंग है. किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. ऐसा अकसर होता है, जब समाज जब शब्दों की रफ्तार अनुभव से तेज हो जाए. जिन युवा पत्रकारों से मैं अक्सर मिलता हूं, वे भी इन लेबल्स को अंतिम सच मान लेते हैं. इस पेशे में आने से पहले ही उनके चश्मे पर एक लेंस लग चुका होता है कि किस सहकर्मी को नीची नजरों से देखना है और किसका सम्मान करना है. मैं एक दिन में उनके दिमाग से यह सब नहीं निकाल सकता. तो फिर मैं उस प्रदर्शनकारी पर कैसे शिकायत करूं जिसे यह भी नहीं पता कि मोदी देश का प्रधानमंत्री है या राष्ट्रपति? या जिसे यह नहीं पता कि कोई ज्ञान शास्त्र या ज्ञानेश गुप्ता चुनाव आयोग चला रहा है या कोई कोचिंग सेंटर. आपने उन बेखबर प्रदर्शनकारियों के ऐसे वीडियो देखे होंगे. विरोध प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए दूसरी तरफ के लोगों ने उन्हें वायरल किया. किसी ने भी इन बच्चों के अंदर जिज्ञासा पैदा नहीं की. उन्हें तो बस निशाने थमा दिए गए. धर्मेन्द्र प्रधान और अब ज्ञानेश. उन्हें पता है कि वे ही उनकी हर परेशानी के लिए जिम्मेदार हैं. नाम.
सिर्फ मीडिया ही मोदी को सत्ता में टिकाए हुए है. ये एक नारा है. दुहराया जा रहा है. वोटर तो जाहिर है एकदम दूध के धुले और बेकसूर हैं. वे इस जादू के खेल में सिर्फ तमाशबीन हैं. वो वोट ही नहीं देते, देते हैं तो चोरी हो जाती है. मीडिया जादूगर है. ये सब बता दो तो कोई यह नहीं पूछता कि कैसे. इससे सबको चुनाव के नतीजे क़रीब से पढ़ने की जहमत नहीं उठानी पड़ती.
बचपन में हम किसी फूल को निहारते रहते थे. उसके गुलाबी शेड्स और नाजुक पंखुड़ियों में खो जाते थे. रंग, पंखुड़ियां, खुशबू, कांटे और पत्तियां जिसमें असंख्य धारियां होती हैं और नुकीले रीढ़. एक ओस की बूँद जो एक पंखुड़ी की पतली सतह पर चमकती नाचती फूल के गर्भ में समा जाती है. ये सब अपनी आंखों के सामने होते देख, हैरान हममें से एक पास ही खुरपी लिए मिट्टी कोड़ते चाचा से पूछता, "यह क्या है?" चाचा ने कहा, "गुलाब है." सारा रोमांच खत्म. गुलाब है. एक शब्द और अंदर की खोज खत्म. लाल गुलाब, काला गुलाब, सफेद गुलाब, पीला गुलाब, गुलाबी गुलाब, गुलाबी गुलाब. बात खत्म. गुलाब है. वो चाचा हमारी उत्सुकता की हत्यारे नहीं थे. उन्होंने जानबूझ कर हमें बरगलाया भी नहीं. वो तो हमारी मदद करना चाहते थे. एक शब्द ही था उनके पास. गुलाब. भीड़ में मौजूद लोग ऐसे शब्द पकड़े हुए हैं जिनका मतलब वे समझ जाते अगर वे खुद तलाश करते. तलाश करने का मौका ही नहीं मिलता, मोबाइल का स्क्रीन ऑटो स्क्रोल करता है. जो शब्द उन्हें थमा दिए जाते हैं, वे वही रटते हैं. बाइबिल कहता है सबसे पहले एक शब्द आया. शब्द.
अगर आपने यहां तक पढ़ लिया है, और अगर आपने गौर किया है कि मेरा लहजा कुछ ज्यादा ही उपदेशात्मक है. तुरंत गुस्से में मत आइये. सोशल मीडिया कहीं भागा नहीं जा रहा है. आप वहां जाएं उसके पहले कल के बारे में बस थोड़ी सी बात और.
कल कोई दूसरी भीड़ किसी और किस्म के पत्रकार को घेर लेगी. एक खेमे के संपादक इसकी निंदा करेंगे. दूसरे खेमे के संपादक एकजुटता दिखाने आ जाएंगे. एडिटर्स गिल्ट, माफ करना, एडिटर्स गिल्ड, इस पर एक नतातुला बयान जारी करेगा. यह तब होगा जब पत्रकार उनकी पसंदीदा खेमे का होगा. मैं ऐसा नहीं करूंगा. अब मुझे खुद यकीन नहीं है कि हम किससे बात कर रहे हैं. मुझे उम्मीद है कि वह रिपोर्टर ठीक होगी. वह अपने काम पर वापस लौट आई होगी. मुझे उम्मीद है कि जिन लड़कों ने उस पर चिल्लाया था, उन्हें कोई नौकरी मिल जाएगी. और थोड़ा चैन. जब उनके पास इस बात पर गौर करने का वक्त होगा कि वे क्या महसूस कर रहे हैं, तो वे इतने बेखबर नहीं लगेंगे कि वायरल हो जाएं. फिलहाल तो वे सिर्फ नारे दोहरा रहे हैं.
जो लोग पत्रकारों की भीड़ द्वारा ट्रोलिंग पर तालियां पीट रहे हैं, एक नाम काफ़ी है ये जानने के लिए कि भीड़ अच्छे और बुरे का फर्क नहीं करती. गणेश शंकर विद्यार्थी.
गुलाब को किसी भी नाम से बुलाओ, गुलाब ही रहेगा. चाचा को लगता था कि गुलाब बच्चों के सहज प्रश्न का सुलभ उत्तर है. उन्हें क्या मालूम कि वह उत्तर कई प्रश्नों को उगने ही नहीं देगा. कई उत्तर नहीं खिलेंगे बस शब्द की बरगद के नीचे. सब लोग बस बिना किसी सवाल के, बड़े उत्साह के साथ एक भावना से उद्वेलित हैं. मैं इस हफ्ते फिर मैकडॉनल्ड्स जाऊंगा. बच्चों से नए शब्दों के बारे में पूछने. उनका उत्तर शब्दों से बना होगा. बर्गर उदर की क्षुधा शांत करेगा. शब्द मन-मस्तिष्क की. अर्थ मर जाएंगे. अंत में शब्द ही बचेगा. शब्द.
कमलेश सिंह