राहुल गांधी का प्रोटेस्ट अब कांग्रेस से आगे, क्या पार्टी साथ चल पाएगी?

चुनाव आयोग के वोटर लिस्ट के विशेष संशोधन के खिलाफ कांग्रेस, छात्र संगठन, वकील और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आंदोलन जारी है. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में ये आंदोलन राजनीतिक रूप से अहम बन गया है. वहीं, आंदोलन ने लोकतांत्रिक भागीदारी और चुनाव प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं.

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SIR में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ राहुल गांधी का प्रदर्शन जारी है. (Photo- ITGD) SIR में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ राहुल गांधी का प्रदर्शन जारी है. (Photo- ITGD)

रशीद किदवई

  • नई दिल्ली,
  • 15 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:44 AM IST

नरेंद्र मोदी के दौर में कांग्रेस ने ज्यादातर समय ऐसे आंदोलन की तलाश में बिताया है जो उसे उसके चिर-परिचित राजनीतिक दायरे से बाहर ले जा सके. अब लगता है कि उसे ऐसा आंदोलन मिल गया है. 

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन (SIR) के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों के रूप में यह मौका सामने आया है, लेकिन इस पुरानी और बड़ी पार्टी के कुछ हिस्सों में एक बेचैनी भी पैदा होने लगी है: क्या होगा अगर यह आंदोलन पार्टी के संगठन से भी बड़ा हो जाए?

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ज्ञानेश कुमार और SIR के खिलाफ चल रहे इन प्रदर्शनों ने ऐसा रूप ले लिया है जो हाल के सालों में कांग्रेस के नेतृत्व या उसके समर्थन वाले आंदोलनों में कम ही देखने को मिला है. महिलाएं, छात्र, वकील, सिविल राइट्स एक्टिविस्ट, वामपंथी संगठन और किसी भी पार्टी से जुड़े न होने वाले युवा इस मुहिम में शामिल हो गए हैं. 

कुछ लोग राहुल गांधी के साथ मार्च कर रहे हैं. कुछ दूसरे लोग अपने दम पर प्रदर्शन कर रहे हैं, जो कभी-कभी कांग्रेस के अपने संगठनों से ज्यादा खुलकर और तेजी से सामने आते हैं. राहुल के लिए, यह बढ़ता दायरा एक बड़ी राजनीतिक सफलता है. लेकिन कुछ कांग्रेस नेताओं के लिए यह चिंता की बात भी है.

वोटर लिस्ट से लेकर सड़कों तक

ताजा विवाद चुनाव आयोग के उस देशव्यापी अभियान को लेकर है जिसके तहत वोटर लिस्ट की जांच की जा रही है. विपक्ष का आरोप है कि इसकी वजह से योग्य वोटरों के नाम गैरकानूनी तरीके से काट दिए गए हैं. करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने का यह मामला बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है, हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया बिल्कुल सही है और उसने गड़बड़ी के आरोपों से इनकार किया है.

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यह आंदोलन तब और तेज हो गया जब 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में सामने आया कि वोटर लिस्ट संशोधन से जुड़े फैसलों पर चुनाव आयोग के अंदर ही गंभीर मतभेद थे. यह विवाद अब वोटर रजिस्ट्रेशन की तकनीकी बातों से आगे बढ़कर संस्थाओं की आजादी और भारत के चुनाव तंत्र की साख पर एक बड़ी लड़ाई बन गया है.

इस माहौल में, अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों की घटनाएं बेहद खास रहीं. राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा ने 6 अक्टूबर से शुरू हुए प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. 10-11 अक्टूबर के वीकेंड में जब दिल्ली में सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे, तब हजारों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. 

12 अक्टूबर को राहुल, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विपक्ष (इंडिया ब्लॉक) के दूसरे नेता सुप्रीम कोर्ट की तरफ मार्च करने निकले, जबकि विपक्ष ने इस संशोधन के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी शुरू कर दी है.

पुलिस की कार्रवाई के बावजूद आंदोलन रुका नहीं है. 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर एक और हंगामे के बाद 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के नेताओं को हिरासत में ले लिया गया. पुलिस ने विपक्ष के प्रदर्शनों के सिलसिले में मामले भी दर्ज किए हैं.

सरकार का पक्ष यह है कि वोटर लिस्ट की समय-समय पर जांच होनी चाहिए और राजनीतिक दल एक संवैधानिक संस्था को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. बीजेपी ने राहुल गांधी पर तब लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया है जब चुनाव के नतीजे उनकी पार्टी के पक्ष में नहीं आते.

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फिर भी, इन प्रदर्शनों का राजनीतिक महत्व सिर्फ चुनाव आयोग पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं है. इसका असली महत्व उन लोगों के सामाजिक दायरे में है जो इन मुद्दों को उठा रहे हैं.

चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा यह विवाद अब लोकतांत्रिक भागीदारी, नागरिकता और सरकार और आम वोटर के रिश्ते को लेकर उठ रही चिंताओं का एक बड़ा केंद्र बन गया है.

एक पार्टी जिसने मार्च तो किया, पर भीड़ जुटाने में संघर्ष करती रही

कांग्रेस के लिए सड़क की राजनीति कोई नई बात नहीं है. 2014 से उसने मोदी सरकार की जमीन अधिग्रहण नीतियों, नोटबंदी, नागरिकता संशोधन कानून (CAA), कृषि कानूनों, बेरोजगारी, महंगाई और जांच एजेंसियों के कथित गलत इस्तेमाल के खिलाफ कई प्रदर्शन आयोजित किए हैं.

फिर भी, इनमें से ज्यादातर प्रदर्शन जाने-पहचाने कांग्रेसी आयोजन ही रहे, जिनमें पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं और पुराने संगठनों का बोलबाला रहा.

2022-23 की 'भारत जोड़ो यात्रा' एक बड़ा बदलाव थी. राहुल ने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की जो पार्टी की सीमाओं से बाहर निकलकर समाज के जानकारों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों से जुड़ने को तैयार है. 

इसके बाद 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' और 2024 के आम चुनाव के दौरान संविधान को बचाने पर कांग्रेस के जोर ने इसी सोच को आगे बढ़ाया. इसके राजनीतिक नतीजे भी सामने आए, भले ही कांग्रेस अपनी पुरानी ताकत वापस पाने से अभी दूर हो.

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हालांकि, मौजूदा आंदोलन एक अहम मामले में अलग है. कांग्रेस न तो इसकी इकलौती सूत्रधार है और न ही इसका केंद्र बिंदु.

नेहा बोरा, अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका का सामने आना इसी बदलाव को दिखाता है. वामपंथी छात्र संगठन 'AISA' की 29 साल की अध्यक्ष नेहा बोरा इन प्रदर्शनों का एक जाना-पहचाना चेहरा बन गई हैं. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े दिपके, दास और रांका ने पारंपरिक राजनीतिक दलों के ढांचे से बाहर आकर युवाओं को एकजुट करने की अपनी क्षमता दिखाई है.

उनकी लोकप्रियता चुनावी राजनीति से नहीं आती. यह विरोध की भाषा, डिजिटल माध्यमों से लोगों को जोड़ने और स्थापित राजनीतिक दलों की पाबंदियों की परवाह किए बिना सत्ता के सामने खड़े होने की हिम्मत से आती है. कांग्रेस के लिए, जो अपने दम पर असरदार युवा नेताओं की नई पीढ़ी तैयार करने में संघर्ष करती रही है, यह स्थिति एक मौका भी है और चेतावनी भी.

नेहा बोरा और कांग्रेस का असहज सवाल

इस आंदोलन की सबसे बड़ी तस्वीर शायद 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की तरफ मार्च के दौरान देखने को मिली. नेहा बोरा प्रियंका गांधी के साथ चल रही थीं, और राहुल उनके ठीक पीछे थे. इससे भी बड़ी बात यह हुई कि राहुल ने नेहा बोरा को विपक्ष के साझा मंच पर खड़े लोगों को संबोधित करने का मौका दिया.

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कांग्रेस की लंबे समय से चली आ रही परंपरा में ऐसे इशारे कभी अनसुने नहीं जाते. कांग्रेस के अंदरूनी लोग यह वाजिब सवाल पूछ सकते हैं कि जब भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) और युवा कांग्रेस का अपना नेतृत्व ढांचा है, तो वामपंथी छात्र संगठन की एक नेता को इतनी तवज्जो क्यों दी जानी चाहिए?

दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में NSUI की हालिया हार के बाद यह सवाल और भी चुभने वाला बन गया है. खबरों के मुताबिक, राहुल ने इस हार के बाद कन्हैया कुमार और एनएसयूआई अध्यक्ष विनोद जाखड़ से जवाब मांगा था.

यह कहना गलत होगा कि इस आंदोलन में कांग्रेस का छात्र संगठन मौजूद नहीं था. 13 अक्टूबर को जाखड़ ने राजीव चौक पर एनएसयूआई के प्रदर्शन की अगुवाई की, जहां प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी इसमें सक्रिय रूप से हिस्सा लिया है.

लेकिन राजनीतिक रूप से सामने आना हमेशा संगठन की मेहनत के अनुपात में नहीं होता.

नेहा बोरा को मिलने वाली यह प्रमुखता राहुल गांधी की नेतृत्व शैली पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है. वे अक्सर कांग्रेस के पुराने ढांचे के भीतर से आगे बढ़ने वाले लोगों के मुकाबले पारंपरिक पार्टी दायरे से बाहर के लोगों की बात सुनने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते नजर आते हैं.

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योगेंद्र यादव और भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ऐसे जाने-माने वैचारिक साथी और राजनीतिक सहयोगी हैं जिनका राहुल के राजनीतिक दायरे में काफी असर है, जिसे कांग्रेस की सदस्यता से नहीं मापा जा सकता. ये दोनों भी मौजूदा प्रदर्शनों में शामिल रहे हैं.

इन्हें औपचारिक सलाहकार बताना गलत होगा. इनका महत्व इस बात में है कि वे कांग्रेस की पारंपरिक भाषा से आगे बढ़कर लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और राजनीतिक गोलबंदी पर बातचीत की दिशा तय करते हैं.

राहुल के लिए यह खुलापन एक खूबी हो सकता है. लेकिन उन पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए जो सालों से आपसी गुटबाजी और सांगठनिक सीढ़ियों पर चढ़ने की जद्दोजहद कर रहे हैं, यह ऐसा लग सकता है कि बाहरी लोगों को वो तवज्जो मिल रही है जिसके लिए अपनों को कड़ा संघर्ष करना पड़ता है.

एक बड़े आंदोलन की कीमत

राहुल का राजनीतिक हिसाब-किताब समझना मुश्किल नहीं है. अगर यह सिर्फ कांग्रेस का आंदोलन होता, तो बीजेपी के लिए इसे एक राजनीतिक दल की आपसी लड़ाई बताकर खारिज करना आसान होता. छात्रों, महिलाओं, वकीलों, मानवाधिकार संगठनों और स्वतंत्र कार्यकर्ताओं को शामिल करने वाला यह बड़ा आंदोलन उस दायरे में आसानी से फिट नहीं बैठता.

शायद खुद राहुल ने 12 अक्टूबर को इस अनोखे राजनीतिक आंदोलन की सबसे सटीक परिभाषा दी, जब उन्होंने इन प्रदर्शनों की तुलना भगवान शिव की बारात और उनके तांडव से की. उन्होंने इशारा किया कि ऐसा आंदोलन न तो किसी सख्त योजना से चलता है और न ही इसमें लोगों के शामिल होने पर कोई पाबंदी होती है.

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भगवान शिव के प्रति अपनी गहरी आस्था जताने वाले नेता के लिए यह रूपक बहुत खास था. लोकप्रिय कल्पना में शिव की बारात पारंपरिक और गैर-पारंपरिक, जाने-माने और हाशिए के लोगों का एक ऐसा मेल होती है जहां सामाजिक ऊंचाइयों का कोई खास बंधन नहीं होता. राहुल शायद यही राजनीतिक बात समझा रहे थे कि यह आंदोलन उन सबका है जो पार्टी या विचारधारा की परवाह किए बिना इसमें शामिल होना चाहते हैं.

बीजेपी ने इस धार्मिक तुलना पर तुरंत आपत्ति जताई, लेकिन इसके अंदरूनी असर कांग्रेस के भीतर ज्यादा चर्चा का विषय बन सकते हैं. अप्रत्याशित और सबको साथ लेकर चलने वाली इस राजनीतिक बारात को राहुल का अपनाना ही शायद इस बात की वजह है कि वे नेहा बोरा जैसे नए और बाहरी चेहरों को बढ़ावा दे रहे हैं, भले ही उनकी पार्टी का पुराना नेतृत्व इस बढ़ते कद के साथ तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रहा हो. 

इससे एक सवाल यह भी उठता है कि क्या अनुशासित और पदानुक्रम (पदानुसार) की आदी पार्टी ऐसे नेता को अपना सकती है जो इन दोनों ही चीजों के न होने का जश्न मनाता नजर आता है?

कांग्रेस की सांगठनिक कमजोरियों को सिर्फ स्वतंत्र कार्यकर्ताओं की साख उधार लेकर दूर नहीं किया जा सकता. न ही राहुल उन कार्यकर्ताओं को नाराज करने का जोखिम उठा सकते हैं जो यह मानते हैं कि हर विरोध मार्च का अंत कांग्रेस के राजनीतिक कब्जे पर ही होना चाहिए.

असली परीक्षा तब होगी जब प्रदर्शन शांत हो जाएंगे और राजनीतिक फायदों को बांटने का वक्त आएगा. क्या बोरा, दिपके और दास जैसे नेता एक बड़े लोकतांत्रिक गठबंधन के पक्के साथी बन पाएंगे? क्या एनएसयूआई और युवा कांग्रेस को अपनी नई मंजिल मिलेगी, या उन्हें सिर्फ यह अहसास होगा कि जिस राजनीतिक जगह पर उनका कब्जा होना चाहिए था, वहां कोई और आ गया है? और क्या राहुल पार्टी की सांगठनिक पहचान को कमजोर किए बिना शिकायतों के इस मेल को बीजेपी के खिलाफ एक टिकने वाली चुनौती में बदल पाएंगे?

यह भी पढ़ें: जंतर-मंतर को लेकर कानूनी जंग, प्रोटेस्ट साइट लिस्ट से हटाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो याचिका दायर

कांग्रेस लंबे समय से यह शिकायत करती रही है कि वह अपने पक्के समर्थकों से आगे बढ़कर ज्यादा लोगों को एकजुट नहीं कर पा रही है. आज एक बहुत बड़ा वर्ग सड़कों पर है. उसकी मुश्किल यह है कि उन सड़कों पर मौजूद हर शख्स नेतृत्व के लिए कांग्रेस की तरफ नहीं देख रहा है.

शायद राहुल गांधी इसे ऐसी कीमत मानते हैं जिसे चुकाना सही है. हो सकता है कि उनकी पार्टी इस बात को मानने में थोड़ा ज्यादा वक्त ले.

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