मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के प्रदर्शन का मकसद भले ही चुनावी प्रक्रिया और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाना हो, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर मंगलवार और बुधवार को जो राजनीतिक तस्वीर बनी, उसने एक अलग बहस को जन्म दे दिया है. इस पूरे मार्च में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी मुख्य किरदार के तौर पर दिखाई दिए. इंडिया ब्लॉक के तमाम दलों के सांसद साथ थे और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी मंगलवार को मार्च में शामिल हुए. उन्हें हिरासत में भी लिया गया. लेकिन धरने की महफिल कांग्रेस पार्टी और राहुल-प्रियंका ने लूट ली. परिणाम यह हुआ कि बुधवार को सपा नेता न लंच में दिखे और न ही धरने में.
यह बदलाव महज संयोग है या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश है, इसे लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं. राजनीति में किसी बड़े कार्यक्रम में किसी नेता की मौजूदगी जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी अनुपस्थिति भी होती है. खासकर तब, जब वह नेता उस गठबंधन का एक प्रमुख घटक हो और उसी गठबंधन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में एक दिन पहले सक्रियता से हिस्सा ले चुका हो.
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कांग्रेस की ओर से कहा गया कि सभी सहयोगी दलों को कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया था और कार्यक्रम देर रात तय होने की वजह से कुछ दल शामिल नहीं हो सके. सपा की ओर से निमंत्रण को लेकर अलग बात सामने आई. पर बाद में अखिलेश यादव ने लंच में शामिल न होने पर कहा कि यह सिर्फ एक लंच की बात नहीं है और आगे चाय या समोसे पर मुलाकात हो सकती है. यानी सार्वजनिक रूप से इसे तत्काल किसी बड़े राजनीतिक टकराव के रूप में पेश नहीं किया गया, लेकिन सवाल अपनी जगह बना रहा.
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम को केवल दिल्ली के एक प्रदर्शन तक सीमित करके देखना मुश्किल है. उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है और कांग्रेस व समाजवादी पार्टी के बीच सीटों और गठबंधन की राजनीति का सवाल लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है. मंगलवार के प्रदर्शन में भी दोनों नेताओं की मौजूदगी के बावजूद उनकी राजनीतिक दूरी पर चर्चा हुई. कई रिपोर्ट में यह भी बात सामने आई कि अखिलेश यादव मार्च में राहुल गांधी से अलग पंक्ति में चलते दिखाई दिए और दोनों नेताओं के बीच पहले जैसी सार्वजनिक गर्मजोशी नजर नहीं आई.
इंडिया ब्लॉक की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर एकजुटता दिखाने और राज्यों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच तालमेल कैसे बनाया जाए. संसद के भीतर विपक्षी दल किसी मुद्दे पर साथ खड़े हो सकते हैं, लेकिन जब वही दल अलग-अलग राज्यों में चुनावी साझेदार या प्रतिद्वंद्वी हों तो समीकरण जटिल हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यहां समाजवादी पार्टी का अपना मजबूत राजनीतिक आधार है और कांग्रेस भी अपने संगठन तथा राजनीतिक विस्तार को लेकर सक्रिय है. ऐसे में दिल्ली के किसी संयुक्त प्रदर्शन की तस्वीर को लखनऊ के राजनीतिक समीकरणों से अलग रखना आसान नहीं है.
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इंडिया ब्लॉक के भीतर यह सवाल बहुत तेजी से उठ रहा है कि क्या साझा मुद्दे पर आंदोलन की रणनीति भी साझा है? मंगलवार को राहुल और प्रियंका गांधी का आकाशवाणी भवन में धरने पर बैठना विपक्षी प्रदर्शन का सबसे प्रमुख दृश्य बन गया.सहयोगी दलों के बीच इस बात को लेकर असहजता की खबर है कि संयुक्त विपक्ष का कार्यक्रम कांग्रेस-केंद्रित दिखाई देने लगा. बुधवार को सपा की अनुपस्थिति ने इस चर्चा को और हवा दे दी.
हालांकि किसी एक कार्यक्रम में किसी दल की गैरमौजूदगी को गठबंधन टूटने या रिश्ते खत्म होने का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी. राजनीति में कार्यक्रमों की समय-सारिणी, स्थानीय राजनीतिक प्राथमिकताएं और संगठनात्मक फैसले भी महत्वपूर्ण होते हैं. खुद समाजवादी पार्टी की ओर से ऐसे बयान सामने नहीं आ रहे हैं जिससे साफ लगता है कि पार्टी इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ एक जुट है. फिर भी संकेतों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता. इंडिया ब्लॉक की ताकत उसकी संख्या से ज्यादा उसके साझा राजनीतिक संदेश में है. अगर किसी बड़े मुद्दे पर एक दिन सभी दल साथ खड़े हों और अगले ही दिन प्रमुख सहयोगी अनुपस्थित हो जाए, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे. विपक्ष के लिए चुनौती केवल सरकार और चुनाव आयोग पर सवाल उठाना नहीं है; उसे अपने भीतर के मतभेदों को भी संभालना होगा.
संयम श्रीवास्तव