लोकतंत्र में हर चुनाव केवल जीत या हार का आंकड़ा नहीं होता, बल्कि वह जनता के मनोभाव का संकेत भी होता है. कुछ चुनाव ऐसे होते हैं जो भविष्य की बड़ी राजनीतिक तस्वीर का पूर्वाभास देते हैं. बांकीपुर और दतिया जैसे चुनाव परिणामों को भी भारतीय जनता पार्टी को केवल स्थानीय हार मानकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. यह परिणाम पार्टी के लिए एक राजनीतिक अपशकुन की तरह ऐसा संकेत हैं, जो समय रहते चेतावनी दे रहा है कि बहुत कुछ बदल रहा है.
भारतीय समाज में अपशकुन की अनेक मान्यताएं हैं. बिल्ली का रास्ता काटना, शुभ कार्य पर निकलते समय छींक आ जाना या इस तरह के कई अन्य संकेत. यह आवश्यक नहीं कि हर बार उनका परिणाम नकारात्मक ही निकले, लेकिन वे मानव मन में आशंका अवश्य पैदा करते हैं. राजनीति में भी ऐसे संकेत मिलते हैं. वे अंधविश्वास नहीं, बल्कि जनमत की बदलती दिशा के प्रतीक होते हैं. जो दल इन्हें समय रहते पढ़ लेते हैं, वे अपनी गलतियां सुधार लेते हैं. जो इन्हें अहंकार में अनदेखा करते हैं, उन्हें बाद में बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ती है.
भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है. 1971 में बांग्लादेश युद्ध की विजय के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी. उन्हें "दुर्गा" तक कहा गया. पाकिस्तान के 2 टुकड़े, प्रिविपर्स की समाप्ति, परमाणु परीक्षण आदि ऐसी उपलब्धियां थी कि ऐसा लगने लगा था कि उनके सामने कोई राजनीतिक चुनौती नहीं बची है. लेकिन कुछ ही वर्षों में परिस्थितियां बदलीं. असंतोष बढ़ा, आपातकाल लागू हुआ और 1977 में कांग्रेस को ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा.
इसी तरह 1984 में राजीव गांधी 400 से अधिक सीटों के साथ सत्ता में आए. उन्होंने कंप्यूटर क्रांति, पंचायती राज की स्थापना और नवोदय विद्यालय जैसी दूरगामी पहलें कीं और आधुनिक भारत की नई तस्वीर पेश करने का प्रयास किया. फिर भी बोफोर्स विवाद, बढ़ती राजनीतिक चुनौतियों और जन असंतोष ने कुछ ही वर्षों में उनकी लोकप्रियता को कमजोर कर दिया. मात्र 5 साल में ही (1989) कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. इतिहास का संदेश स्पष्ट है कि लोकप्रियता स्थायी नहीं होती और लोकतंत्र में मतदाता समय-समय पर सत्ता को आईना दिखाता है.
भाजपा भी पिछले कुछ वर्षों में लगातार चुनावी सफलताओं का आनंद लेती रही है. कई राज्यों में जीत, केंद्र में मजबूत सरकार और विपक्ष की कमजोरी ने उसे अभूतपूर्व आत्मविश्वास दिया है. लेकिन यही आत्मविश्वास यदि आत्ममुग्धता में बदल जाए तो खतरे की शुरुआत होती है. बांकीपुर और दतिया के परिणाम शायद इसी खतरे की पहली घंटी हैं. इन चुनावों ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है. क्या केवल संगठन की ताकत, हिंदुत्व का मुद्दा और जातीय समीकरण हर चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त हैं? क्या मतदाता स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और जनता से उसके जुड़ाव को महत्व नहीं देता? यदि पार्टी यह मानने लगे कि वह किसी भी व्यक्ति को टिकट दे सकती है, किसी को भी मुख्यमंत्री बना सकती है और केवल अपने चुनावी ब्रांड के भरोसे जीत जाएगी, तो यह सोच लंबे समय तक कारगर नहीं रह सकती. मध्य प्रदेश और बिहार में बनाए गए बीजेपी के सीएम पार्टी के कोर वोटर्स मध्यवर्ग की आशाओं और आकांक्षाओं पर कभी खरे नहीं उतरे.
भाजपा के सामने एक और चुनौती उसकी बदलती राजनीतिक संस्कृति भी है. हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में अन्य दलों, विशेषकर कांग्रेस के नेताओं को पार्टी में शामिल किया गया है. इससे संगठन का विस्तार तो हुआ है, लेकिन नए कार्यकर्ताओं के आने से पार्टी में नई संस्कृति भी आई है.भाजपा की पहचान लंबे समय तक वैचारिक प्रतिबद्धता और संगठनात्मक अनुशासन वाली पार्टी की रही है. यदि वही पार्टी अवसरवादी राजनीति का प्रतीक बनने लगे, तो उसकी विशिष्टता कमजोर पड़ती है. पार्टी का कांग्रेसीकरण केवल नेताओं के आने का प्रश्न नहीं, बल्कि राजनीतिक कार्यशैली बदलने का भी संकेत है.
निस्संदेह, किसी एक या दो चुनावी हार से किसी दल के भविष्य का फैसला नहीं हो जाता. भाजपा आज भी देश की सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति है. उसके पास मजबूत संगठन, लोकप्रिय नेतृत्व और व्यापक जनाधार है. लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा विपक्ष नहीं, बल्कि आत्मसंतोष होता है. छोटी हारों को यदि समय रहते चेतावनी मान लिया जाए, तो वे भविष्य की बड़ी हारों से बचा सकती हैं.
बांकीपुर और दतिया के परिणामों को भाजपा चाहे तो सामान्य उपचुनाव मानकर भूल सकती है, लेकिन चाहे तो इन्हें आत्ममंथन का अवसर भी बना सकती है. इतिहास बताता है कि राजनीति में वही दल लंबे समय तक टिकते हैं जो जनता के संकेतों को समझते हैं, अपनी रणनीति बदलते हैं और संगठन को निरंतर जीवंत बनाए रखते हैं. संभव है कि यह हार केवल एक छोटी-सी चूक हो, लेकिन यह भी संभव है कि यह बदलते जनमत की पहली दस्तक हो. समझदारी इसी में है कि इस दस्तक को समय रहते सुन लिया जाए.
संयम श्रीवास्तव